Thursday, August 1, 2013

उन्माद में बदलता आनंद का खेल


अनुपमा 

गोलबंदी कर बैठे हुए लोग सिटी बजाना तेज कर देते हैं. तालियों की गड़गड़ाहट शोर में बदलने लगती है. उसी हो-हल्ले में सुभाष अपने मुंह से तरह-तरह की आवाज निकालनी शुरू कर देता है. देखते ही देखते रोमांच का रंग उन्माद में बदलने लगता है. करीब 15-20 फीट की गोलाई वाले आकार में दो मुर्गों के बीच लड़ाई तेज हो जाती है. चाकुओं से बंधे पैर के साथ दोनों मुर्गे इतने खतरनाक तरीके से पैंतरे लेते हैं, दांव बदल-बदलकर इतनी चतुराई और बिजली-सी तेज़ी से एक-दूसरे पर प्रहार करते हैं कि उस वक्त उनके रणक्षेत्र में जाने का साहस कोई भारी-भरकम शरीर वाला हट्ठा-कट्ठा व्यक्ति भी आसानी से नहीं कर सकता. युद्ध के करीब सातवें-आठवें मिनट में एक मुर्गा लहूलुहान होकर परास्त हो जाता है. उसके पेट में चाकू लगा है. उसे तुरंत उठाकर बाहर ले जाया जाता है, उसका इलाज शुरू हो जाता है. दूसरा मुर्गा, जो विजेता है, वह दर्शकों से घिरे गोलाकार मैदान में इस अंदाज में घुमाया जाता है, जैसे टीवी पर आनेवाले वर्ल्ड फाइट शो में एक मुक्केबाज दूसरे को परास्त कर अपनी भुजाओं और बाहों को दिखाता हुआ  घूमता है या फिर कुश्ती के अखाड़े में कोई पहलवान, दूसरे को चित्त करने के बाद छाती चौड़ी  कर खुले बदन खुद का बल प्रदर्शन करता है. और जब मुर्गों की जांबाजी खत्म हो जाती है, एक परास्त और दूसरा विजयी हो जाता है, उसके बाद पैसा बटोरने और बांटने का दूसरा खेल शुरू होता है. पांच मिनट के अंदर 20-30-40-50 हजार या फिर लाख-डेढ़ लाख तक बंटवारा या कलेक्शन हो जाता है. यह पैसा उन मुर्गों की जांबाजी पर खेल शुरू होने के पहले लगाये गये सट्टे का होता है. पैसे का खेल रफा-दफा होता है उसके तुरंत बाद फिर उसी मैदान में दो, दूसरे मुर्गे आमने-सामने हाजिर हो जाते हैं. फिर बोली लगनी शुरू हो जाती है. झारखंड की राजधानी रांची के प्रसिद्ध जगन्नापुर मंदिर के पास मुर्गों की जांबाजी के इस खेल को देखना रोमांचित या आनंदित कम और उन्माद का भाव ज्यादा पैदा करता है. लेकिन पीढि़यों से और पारंपरिक तौर पर झारखंड के आदिवासी इलाके में मनोरंजन के लिए बेहद लोकप्रिय रहे मुर्गा लड़ाई के इस खेल का वर्तमान स्वरूप ऐसा ही हो चुका है. कभी बिना चाकू के इस्तेमाल के, अहिंसक तरीके से मुर्गे को लड़वाकर आनंदित, रोमांचित होनेवाला आदिवासी समाज अपने ही इस खेल का तमाशबीन भर बनता जा रहा है और पैसे वाले लोग इसे सट्टे का खेल बनाने और परवान चढ़ाने में लगे हुए हैं. 
जगन्नाथपुर मंदिर के पास मुर्गे की जांबाजी का यह खेल देखने के बाद मन में दो सवाल उमड़ते हैं. पहला यह कि ये मुर्गे इतने खतरनाक खेल के लिए तैयार कैसे किये जाते होंगे, क्या इनकी कोई खास नस्ल होती है और दूसरा यह कि गरीबों के मनोरंजन का यह खेल पैसेवालों के शगल और सट्टे का खेल कैसे बन गया और बन ही गया है तो क्या मुर्गे की जांबाजी पर सट्टे का खेल बड़े कारोबार का रूप ले चुका है
हम पहले सवाल का जवाब भोला महली से पूछते हैं. भोला पहले रांची अवस्थित हैवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन लिमिटेड के कर्मी थे लेकिन 1962 से मुर्गेबाज भी हैं यानि मुर्गा लड़ाने का काम भी करते हैं. भोला बताते हैं, यह खेल झारखंड और दक्षिण भारत के इलाके में पीढ़ियों से मशहूर रहा है. दक्षिण में इसे कुडू पूंजू और राज पूंजू भी कहते हैं.यह खेल पहले दक्षिण में  चौबीसो घंटे चलता था लेकिन वहाँ मुर्गे के पैर में हथियार बांधने की जगह दूसरा तरीका अपनाया जाता था. चाकू की बजाए मुर्गे के पांव को ही धारदार बनाया जाता था. मुर्गे के पांव के पिछले वाले हिस्से (पंजों के ऊपर का हिस्सा) में सुअर की टट्टी और रीठे के छिलके को पिस कर उसे बांध दिया जाता था. यह पट्टी एक सप्ताह बाद खोली जाती थी लेकिन तब तक 24 घंटे उसपर पानी डालकर भिगोया जाता था. इस प्रक्रिया से वहाँ गाँठे कांटे की तरह बाहर निकल आती है. और इसी से एक मुर्गा, दूसरे मुर्गे पर वार कर घायल कर देता था. भोला बताते हैं कि जो भी व्यक्ति लड़ाने के उद्देश्य से अपने घरों में मुर्गा पालते हैं, वे उसे संतान की तरह पालते-पोसते हैं. मुर्गे को जरा भी चोट लगने पर खुद डॉक्टर की तरह इंजेक्शन देते हैं या उसे डॉक्टर के पास ले जाते हैं. मुर्गों को अंधेरे में रखकर उन्मादी बनाते हैं. उसे मुर्गियों से हमेशा दूर रखते हैं. यदि उनके पेट में कुछ परेशानी हुई या फिर पेट खराब हो तो पुदीन हरा देते हैं. मुर्गों को ताकतवर बनाने के लिए उनके खाने में सूखी मछली का घोल, किसमिस, मड़ुवा, उबला हुआ मक्का और समय-समय पर मल्टी विटामिन का इंजेक्शन भी देते हैं. बकौल भोला, मुर्गे के बारे में बस इतना जानिए वह ऊपरवाले की नियामत है और बहुत जांबाज प्राणी है. वह अपने मुर्गे को समय-समय पर लगी चोटों को दिखाते हुए कहते हैं कि अगर मुर्गा लड़ते-लड़ते घायल हो जाए, उसके शरीर का कोई हिस्सा फट कर बाहर आ जाए तो तुरंत उसकी सिलाई खुद से ही कर दीजिए, वह तुरंत फिर लड़ने को तैयार हो जाएगा. भोला एक और जानकारी देते हैं. कहते हैं कि सुनहले बालों वाले मुर्गे की लड़ाई में मांग ज्यादा होती है, क्योंकि वह ज्यादा मजबूत होता है और मुर्गा लड़वाने वाले लोग इसकी खरीदारी चटगांव और विजयनगरम से करवाते हैं. भोला कहते हैं, अब इन मुर्गों की कीमत मत पूछिएगा. लाख तक भी हो सकती है. 
भोला महली एक मुर्गे की कीमत जब लाख तक पहुंचाते हैं तो सुनकर बड़ी हैरत होती है कि आखिर एक मुर्गे के लिए इतनी बड़ी रकम कौन लगाता होगा और आखिर क्यों? इस जवाब को तलाशने के लिए हम जगन्नाथपुर मंदिर के बाद रांची के आसपास के इलाके में होनेवाले मुर्गे  की लड़ाई में अलग-अलग तय दिनों पर पहुंचते हैं. सोमवार और शुक्रवार को अनीटोला, बुधवार और गुरूवार को कटहल मोड़, शनिवार को रातू बगीचा... इन जगहों पर दूसरे कई तरह की नयी जानकारियां भी मिलती हैं. ओरमांझी के कुच्चू गांव के रहनेवाले मनराज बताते हैं कि  मुर्गे की लड़ाई में उसके पैरों में जो अंग्रेजी के यू आकार का हथियार देख रही हैं, उसे चाकू-तलवार नहीं उसे कत्थी कहा जाता है और उसे हर कोई भी नहीं बांध सकता. उसे बांधने की भी एक खास कला है और जो बांधना जानते हैं, उन्हें कातकीर कहा जाता है. एक कातकीर एक मुर्गे के पैर में कत्थी बांधने का तीन सौ रूपये लेता है और अगर वह मुर्गा जीत गया तो दो सौ रुपये ऊपर  से भी उसे मिल जाते हैं. मनराज कत्थी के प्रकार को भी बताते हैं. कहते हैं बांकी, बांकड़ी, सुल्फी, छुरिया चार तरह के हथियारों का इस्तेमाल मुर्गे के पांव में बांधने के लिए होता है, जिसमें बांकड़ी सबसे खतरनाक होती है. ये सब ठोस इस्पात के बने होते हैं, जिसे बनानेवाले कारीगर भी अलग होते हैं. अलग-अलग नामों वाले हथियारों का इस्तेमाल भी अलग-अलग मौके के हिसाब से किया जाता है. यानि खतरनाक तरीके से लड़ना है तो खतरनाक हथियार, सामान्य से लड़ना है तो सामान्य हथियार. मनराज नयी जानकारी देते हैं, जो पारंपरिक जानकारी के करीब होती है. इसी क्रम में यह जानकारी भी मिलती है कि सिर्फ रांची व इसके आसपास ही नहीं बल्कि पूरे झारखंड में मुर्गा लड़ाई का खेल होता है. कटहल मोड़ पर मुर्गा लड़ानेवाले विजय बताते हैं कि यह खेल पहले राजा-महाराजाओं के सौजन्य से लगनेवाले हाट-मेले में होता था, जहां गांव के आदिवासी लोग अपने-अपने मुर्गे को लेकर पहुंचते थे और फिर मनोरंजन के लिए ग्रामीण पसंद के मुर्गे पर कभी-कभार कुछ बोली भी लगा देते थे लेकिन अधिकांश बार बाजी सिर्फ मुर्गे की जीत हार पर ही लगती थी. यानि जो मुर्गा हार जाएगा, उस मुर्गे को जीतनेवाले मुर्गे का मालिक लेकर चला जाएगा. अब उसकी मर्जी पर है कि वह उस मुर्गे को पाले-पोसे या फिर खा जाए. 
मुर्गा लड़ाई में वर्षों से दिलचस्पी रखनेवाले विजय टेटे हमें कुछ मुर्गे की लड़ाई के आर्थिक समीकरण को समझाने की कोशिश करते हैं. बकौल विजय, गांव से तो मुर्गा पालनेवाले अब भी मुर्गा लड़ाई के दौरान अपने-अपने मुर्गे को लेकर आते हैं लेकिन मैदान में पहुंचने के पहले ही उस पर सट्टेबाजों का कब्जा हो जाता है. जिसके पास हाजरा मुर्गा (मुर्गे का एक प्रकार) होता है, उसके पीछे सट्टेबाज सबसे ज्यादा चलते हैं. टेटे कहते हैं, पहले हो सकता है कि सप्ताह में एक दिन यह खेल मनोरंजन के लिए होता होगा और घंटे-दो घंटे में सब समाप्त हो जाता होगा लेकिन अब तो सिर्फ रांची में ही हर रोज किसी न किसी इलाके में यह खेल होता है और एक-एक दिन में 40-50 लड़ाइयां हो जाती हैं. एक लड़ाई पर कम से कम 20-25 हजार से लेकर लाख-दो लाख तक की बोली चली जाती है. बकौल विजय, इन मुर्गों को पहले मैदान में उतारकर देख लिया जाता है, चोंच आपस में लड़ाकर भी देख लिया जाता है. फिर उन्हें मैदान में उतार दिया जाता है. जो मैदान देखते ही पीछे की ओर मुड़कर चलता है, उस दिन उसे या तो नहीं लड़ाया जाता या अगर लड़ता है तो उस पर बोलियां नहीं लगती. उसके पहले मुरगे को आपस में आमने-सामने कर भी देख लिया जाता है. यानि पूरी तैयारी और ठोक-बजाकर मुर्गेबाज सट्टोरियों को दिखा देते हैं, तब दांव लगने का खेल शुरू होता है. विजय कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि सिर्फ सट्टेबाज ही इसमें कमाई करते हैं. सट्टेबाज तो खैर लाखों में खेलते हैं लेकिन मुर्गा लड़ाई का यह खेल एक धंधे की तरह होता है. आप सोचिए कि एक बार हथियार बांधने वाला कम से कम 300 रुपये  लेता है. अगर उसने दिन भर में 20-30 के हथियार भी बांध दिये तो पांच-छह हजार तो उसकी जेब में आ ही जाते हैं. इसी तरह मुर्गा के डॉक्टर अलग होते हैं, जो मौके पर इलाज भी करते हैं. उनकी कमाई भी अलग होती है और गांव के जो लोग अपने घरों में मुर्गा पालते हैं, उनकी आमदनी भी अब इतनी होने लगी है कि वे घर बना लें, गाड़ी खरीद लें. कई मुर्गेबाज़ अब इस स्थिति में दिखते हैं. मुर्गे के खेल का समाजशास्त्र, राजनीतिशास़्त्र कम लोग समझाते हैं, उसके अर्थशास्त्र को समझानेवाले बहुतेरे मिलते हैं. हमें उसका एक अपराधशास्त्र भी दिखायी पड़ता है. प्रायः जहां अब मुर्गा लड़ाई का खेल होता हैं, वहां दारू के अड्डे भी चोरी-छुपे चलाये जाते हैं और मटका का खेल यानि लोकल लॉटरी (जुआ) भी जमकर होता है. इतनी जानकारियां लेने के बाद मशहूर पत्रकार पी साइंनाथ की किताब तीसरी फसल में भी मलकानगिरी में मुर्गे की लड़ाई पर लिखी एक रपट पढ़ने को मिलती है. साईंनाथ लिखते हैं- जब से हथियारों का इस्तेमाल मुर्गे के पैर में खेल के लिए होने लगा है, तब से यह परंपरागत खेल खतरनाक हो गया है और पहले जो खेल आनंद के लिए घंटों चलता था, वह चंद मिनटों में खत्म हो जाता है, क्योंकि इतनी ही देर में बिजली की तरह झपटकर एक दूसरे पर वार करनेवाले दो मुर्गों में से कोई एक घायल हो जाता है. साईंनाथ को पढ़ते हुए और कई जगहों पर मुर्गा लड़ाई देखने के बाद यह साफ हो जाता है कि हथियारों का चलन भी सट्टेबाजों ने ही बढ़ाया होगा, क्योंकि मुर्गे जब हथियार से लड़ेंगे तो खेल जल्द खत्म होगा. अगर एक खेल जल्द खत्म होगा तब तो दूसरे, तीसरे,चौथे... यानि एक दिन में 40-50 खेल की गुंजाइश बनेगी. और ये  फंडा तो आईने की तरह साफ है कि जितने ज्यादा खेल होंगे, जितनी ज्यादा लड़ाइयां, उतना ही ज्यादा पैसों का दांव.


Sunday, July 7, 2013

बालक की प्रेरणा से बह रही बड़े बदलाव की बयार



अनुपमा

झारखंड की राजधानी रांची से करीब 25 किलोमीटर दूर ओरमांझी प्रखंड के धुपाई गांव के रहनेवाले किसान बालक महतो अब सालों भर किसी बडे व्यवसायी या अन्य व्यस्ततम पेशेवर की तरह व्यस्त रहते हैं. उनसे हमारी मुलाकात उनके गांव में ही होती है. बालक विस्तार से अपनी किसानी कथा बताने के पहले अपने घर को दिखाते हैं जो पारंपरिकता और आधुनिकता के घालमेल से बना है और गांव के उस घर में जरूरत के हर जरूरी आधुनिक उपकरण दिखते हैं. बालक घर से लेकर खेतों तक किसानी के करिश्मे को दिखाते हैं. वह बताते हैं कि कैसे 16 एकड जमीन रहने के बावजूद कुछ साल पहले तक वे जिंदगी के तीन अहम फेज यानि भोजन, वस्त्र और आवास के फेरे में ही सालों भर लगे रह जाते थे और ठीक ढंग से उसकी भरपाई भी नहीं हो पाती थी  लेकिन अब उनके पांचों बच्चे रांची के हॉस्टल में रहकर मजे से पढाई कर रहे हैं और बालक महतो खुद नित नये ख्वाब बुनने की स्थिति में हैं. बालक कहते हैं कि इतने ही जमीन में अब सालाना 20-25 लाख रुपये का कारोबार हो जाता है और सब काट-कूट भी दिया तो पांच लाख तो बचत हो ही जाती है. इतने ही जमीन में बालक महतो खाने के लिए चावल-गेहूं तो उपजाते ही हैं, लेकिन कमाई के लिए ओल, अदरख, टमाटर, बैंगन, शिमला मिर्च, गोभी आदि जमकर पैदा करते हैं. उन्होंने खुद का ग्रीन हाउस भी बना रखा है, जहां वे नर्सरी संचालित करते हैं. गाय, बकरी, मुर्गी पालन के साथ-साथ पेशेवर तरीके से डेयरी के कारोबारी भी अब हो गये हैं. सागवान-शिशम जैसे कीमती वृक्षों को भी लगाये हुए हैं. पपीता की खेती भी करते हैं. फलदार पेंडों का बाग भी लगा चुके हैं. और इतने के बाद अब शीघ्र ही बीज उत्पादन केंद्र भी शुरू करनेवाले हैं.
बालक कहते हैं कि खेती की एक तकनीक ने किसानी और जीवन में इतने बदलाव, इतनी तेजी से कर दिये हैं. वह तकनीक है ड्रिफ्ट एरिगेशन यानि टपक सिंचाई का. यानि बूंद-बूंद सिंचाई की तकनीक, जिसके जरिये एक-एक बूंद पानी सीधे फसलों की जडों में समाता है और फसल का उत्पादन और उसकी गुणवत्ता, दोनों में करिश्माई ढंग से इजाफा करता है. बालक दिखाते हैं कि अब हम इसके जरिये सिर्फ पानी ही नहीं पहुंचाते बल्कि पानी के साथ ही खाद वगैरह भी पहुंचा देते हैं, जिससे पूरे खेत में खाद छिंटकर बर्बाद करने से मुक्ति मिल गयी है. खाद-पानी का खर्च भी कम हो गया है और आमदनी भी ज्यादा..! खेतीहर दुनिया में बूंद-बूंद वाली सिंचाई की इस तकनीक के करिश्मे को बालक के खेतों में और खेतों के जरिये घरों में पहुंची समृद्धि को देख साफ लगा है कि यदि यह सफल हुआ तो आनेवाले दिनों में कई किसान स्वरोजगार, उद्यमिता और खेती करे सो मरेकी बजाय खेती करे सो बढे का फॉरमूला अपनाकर नयी इबारतें लिखेंगे.
ऐसा भी नहीं कि यह बदलाव सिर्फ एक बालक के घर जाकर देखा जा सकता है. या यह भी नहीं कि सिर्फ एक तकनीक ने ही ये सारे बदलाव कर दिये. तकनीक तो सहारा भर बनी, असल बात रही बालक जैसे किसानों का नये विज्ञानी प्रयोग को आजमाने का साहस जुटाना, जिससे संभावनाओं के नये द्वार खुले और उसका असर यह हुआ है कि अब रांची के आसपास के कई किसान बालक महतो की राह पर चलते हुए उनकी तरह बन जाना चाहते हैं. रांची जिले के ही गांेदलीपोखर के रहनेवाले किसान दिनेश महतो तो और भी करिश्माई किसान बनते जा रहे हैं अब. मात्र डेढ एकड जमीन रखनेवाले किसान दिनेश ने इस तकनीक की वजह से अपनी इतनी-सी जमीन से ही सालाना डेढ-दो लाख तक की बचत करने लगे हैं. खेती के अर्थशास्त्र ने उनका परिवारशास्त्र और समाजशास्त्र बदला तो उनका उत्साह भी परवान चढा है. दिनेश कहते हैं, अब मैंने 15 एकड जमीन लीज पर लेकर खेती का पेशा शुरू किया है, जिसमें तरह-तरह की सब्जियों कीखेती करेंगे. खेती के तमाम प्रयोग करेंगे. दिनेश के इलाके के ही अनगडा के गोवर्धन मुंडा भी  डेढ एकड जमीन के साथ ही व्यस्ततम किसान हो गये हैं.
बालक, दिनेश या गोवर्धन की सफलता की कहानी सिर्फ बानगी भर है. जो झारखंड के भूगोल से परिचित हैं, वे जानते हैं कि इसकी पहचान कभी मूल रूप से खेतीहर राज्य के रूप में नहीं रही है. खान-खदान को लेकर ही यह ज्यादातर विख्यात और अब कुख्यात राज्य माना जाता रहा है. लेकिन धीरे-धीरे ही सही, इस राज्य के सुदूरवर्ती इलाके से लेकर राजधानी से सटे इलाके में खेती की दुनिया में एक खामोश क्रांति भी हो रही है. इसका नतीजा आनेवाले दिनों में व्यापक स्तर पर दिखेगा. यह भी संभव है कि खान-खनिज के लिए विख्यात और कुख्यात यह राज्य खेतीहर राज्य के रूप में भी अपनी पहचान बना ले.
जैसा कि कृषि वैज्ञानिक डॉ सुप्रिया सिंह कहती हैं, झारखंड में सिर्फ 20-22 प्रतिशत जमीन ही सिंचित हैं. 70 प्रतिशत से अधिक जमीन की सिंचाई बारिश पर ही निर्भर रहती है. ऐसे में टपक सिंचाई यहां के लिए वरदान साबित हो रहा है. ऐसा नहीं है कि टपक सिंचाई खेतीहर दुनिया में कोई बहुत नयी तकनीक है लेकिन झारखंड जैसे राज्य में अब जाकर यह किसानों की समझ में आना शुरू हुआ है. सरकार की ओर से जब इस पर 90 प्रतिशत तक सब्सिडी मिलनी शुरु हुई तो किसानों का आकर्षण अब इसमें धीरे-धीरे बढना शुरू हुआ है और अब नतीजे भी दिखने लगे हैं. यहां हम बताते चलें कि टपक सिंचाई के तहत पाईप पानी के स्नेत से पाईप वगैरह के जरिये खेतों में सीधे फसलों की जड तक पानी पहुंचाया जाता है, जहां बूंद-बूंद पानी सीधे जड में गिरता है और उसी से सिंचाई होती है. आधे एकड जमीन में टपक सिंचाई संयत्र लगाने का खर्च अनुमानतरू 30-36 हजार रुपये के बीच आता है, जिसमें सरकार 24,905 रुपये का सहयोग करती है. इस योजना के सफल होने की एक बडी वजह यह रही है कि इसके तहत किसानों को सब्सिडी की राशि सीधे उनके बैंक खाते में दे दी जाती है, जिससे बिचैलिया तंत्र पनप नहीं पा रहा है और दूसरी बड़ी वजह तो पहले ही बतायी कि बालक जैसे किसानों ने साहस दिखाया तो इस तकनीक को पनपने और पांव पसारकर किसानों की जिंदगी में बदलाव लाने का मौका मिला.
झारखंड जैसे बंजर, पहाडी, पठारी और रेनशैडो जोन में आनेवाले राज्य में खेती की इस तकनीक का आगामी दिनों में कितना जोर बढेगा, इसका अंदाजा इस राज्य में इस तकनीक के संयत्र बेचने और सेवा मुहैया कराने पहुंची कंपनियों की संख्या से भी लगाया जा सकता है. बकौल निदेशक एपी सिंह, फिलहाल झारखंड में 28 कंपनियां ड्रिफ एरिगेशन के क्षेत्र में निबंधित हो चुकी हैं, जिनमें पांच-छह कंपनियां सक्रिय हैं और तीन कंपनियों का काम तेजी से बडे दायरे तक फैल गया है. उन तीन कंपनियों में जैन, प्रीमियर अैर मेटाफर कंपनी के नाम शामिल हैं. जैन एरिगेशन से जुडे कृषि अभियंता ओपी गुप्ता कहते हैं कि हमने इस साल पूरे झारखंड में 100  हेक्टेयर जमीन में ड्रिफ एरिगेशन सिस्टम को लागू करवाया है. चालू वर्ष में127 हेक्टेयर का लक्ष्य रखा है. बकौल गुप्ता, हमेशा पानी की समस्या से जुझते रहनेवाले झारखंड के किसानों को बात समझ में आ गयी है कि यह एक ऐसी तकनीक है, जिससे वे बगैर कहीं हाथ फैलाये अपनी उद्यमिता के बुते सुखी जिंदगी गुजार सकते हैं.
हालांकि अभी यह तकनीक वहीं तेजी से पहुंच रहा है, जहां कुआं, तालाब आदि की सुविधा उपब्ध है और बिजली है. वहां के किसान आसानी से अपने खेत तक इस तकनीक के जरिये पानी पहुंचा पा रहे हैं और इसका पूरा लाभ उठा रहे हैं. कृषि वैज्ञानिक डॉ सुप्रिया सिंह कहती हंै कि अब किसानों को अगर इसका फायदा सच में समझ में आ गया है तो उन्हे ंएक दूसरे को सहयोग देने का रूख अपनाते हुए समझदारी से काम लेना होगा. झारखंड में सभी जगह कुआं खोद लेना इतना आसान नहीं है, इसलिए किसानों को चाहिए कि वे सामूहिक तौर पर खेतों में छोटे-छोटे जल संग्रहण केंद्र बनाये और उसे प्लास्टिक से कोटेड कर दे ताकि जो पानी आये, उसे जमीन सोख न सके और फिर उसी पानी को अपने खेतों तक पहुंचाकर इसका अधिक से अधिक लाभ उठाये. डॉ सुप्रिया सिंह की बातों को आगे बढाते हुए कृषि अभियंता डॉ आरके रूसिया कहते हैं कि यही तो खासियत इस तकनीक की है कि इसमें पानी की ज्यादा जरूरत नहीं पडती. यदि जल का संग्रहण कहीं कर लिया गया तो उसके एक-एक बूंद का उपयोग फायदे के लिए किया जा सकता है.
झारखंड जैसे राज्य में इस योजना की सफलता के पीछे एक बडी वजह यहां की जमीनों का बंजर, पथरीला होना और सिंचाई की सुविधा नहीं होना तो है ही, दूसरी बडी बात यह भी है कि अनेकानेक कंपनियों के आने से और सब्सिडी के कारण किसानों का झुकाव तेजी से इस ओर बढने से स्थानीय युवकों को इसमें रोजगार भी मिलने लगा है. कंपनियां जहां भी काम करवा रही हैं, वहां स्थानीय युवक ही  प्रशिक्षण प्राप्त इसे कर रहे हैं. इससे एक तो उन्हें काम के दौरान रोजगार मिल रहा है और उसके बाद के लिए भी वे एक हुनर में माहिर हो जा रहे हैं, इसलिए ग्रामीण युवकों का रुझान भी इस ओर ज्यादा दिख रहा है.