Wednesday, November 3, 2010

भूखे-सूखे छतरपुर में टीबी की छतरी




♦ अनुपमा

यूं तो पलामू ही झारखंड का अभिशप्त इलाका है, उसमें भी उसका छतरपुर इलाका विचित्र विडंबनाओं से भरा हुआ है। उसे झारखंड का विदर्भ भी कहा जाता है। पिछले साल जब सुखाड़ और उससे उपजी भुखमरी के कारण वहां के 13,400 किसानों ने हस्ताक्षर कर सामूहिक रूप से इच्छामृत्यु का संकल्प लिया था, तो अचानक से यह इलाका सुर्खियों में आ गया था। हर साल यहां भूख से लोग मरते हैं। इतना ही नहीं, यहां लोग जान-पहचान वाली बीमारी से भी हमेशा मौत के आगोश में समाते रहते हैं, कहीं कोई चर्चा नहीं होती। छतरपुर के लुतियाहीटोला में पहुंचने पर ऐसी ही परिस्थितियों से हमारा सामना हुआ, जहां रोजमर्रा की जिंदगी में बेमौत मर जाना किसी को हैरत में नहीं डालता।

लुतियाहीटोला एक छोटा-सा गांव है। वहां करीब 100-200 मीटर की दूरी पर नौ क्रशर मशीनें लगी हुई हैं। बच्चों और महिलाओं की फौज दिन-रात वहां काम में लगी हुई रहती हैं। पत्थरों की पिसाई से निकले डस्ट उनकी जिंदगी को मौत की तरफ ले जाते हैं। पुरुष वहां काम न कर, बिहार के करवंदियों में पहाड़ों से पत्थर तोड़ने चले जाते हैं। करवंदिया क्रशरों के लिए मशहूर जगह है। जब करवंदिया से काम कर मर्द लौटते हैं, तो हाथ में थोड़ी सी रकम होती है और साथ में बड़ी बीमारी। एड्स जैसी बीमारी। कई बार तो इन्हें पता ही नहीं चलता बीमारी का, कुछेक को जब तक पता चलता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है या पता चलने पर भी समाज के डर से छुपा कर रखा जाता है।

लुतियाहीटोला के बगल में ही एक गांव है बरडीहा। वहां हमारी मुलाकात कई लोगों से होती है। बताया जाता है कि अभी हाल ही में सूरजदेव एड्स से मर गया है। एड्स का पता चलने से पहले वह टीबी की खुराक खा चुका था। उसी गांव का गोपी भी है। गोपी भी हमेशा खांसता रहता था। सामाजिक कार्यकर्ता सुनीता उसे जबर्दस्‍ती अस्‍पताल ले गयी, तो पता चला कि गोपी को टीबी है। टीबी का इलाज चला। ठीक नहीं हुआ तो सुनीता चंदा कर उसे जिला मुख्यालय डालटनगंज ले गयी। इलाज के लिए। वहां पता चला कि गोपी को एड्स है। फिलहाल गोपी टीबी सेनेटोरियम में भरती है। सूरजदेव की पत्नी कुंती की कहानी भी गोपी की तरह ही है। कुंती भी टीबी की दवा खाती रही। ठीक नहीं हुआ, प्राइवेट अस्पताल में गयी तो पता चला कि उसे भी एड्स है। इन दो गांवों की कहानी ऐसी ही है। या तो अधिकांश लोगों को टीबी है या एड्स।

यूं भी यहां जिस माहौल में लोग रहते हैं, टीबी की संभावना हमेशा बनी रहती है। प्रदूषण, डस्ट और कुपोषण के कारण टीबी का खतरा बढ़ा ही रहता है और वैसे में मजबूरी में क्रशर पर काम करते रहना जानलेवा साबित होता है। टीबी की मरीज मीना और महेश हमें क्रशर प्लांट में काम करते हुए ही मिले। वे कहते हैं कि हमें भी मालूम है कि टीबी है तो हमें यहां काम नहीं करना चाहिए लेकिन करें तो क्या करें!

छतरपुर के एक हिस्से के कई गांव ऐसी ही विडंबनाओं में घिरे हुए हैं। वह तो भला है कि सुनीता या उमेश जैसे सामाजिक कार्यकर्ता उनके बीच होते हैं। सुनीता या उमेश इस इलाके में घूम-घूमकर लोगों को डॉट् प्रोवाइड करवाते हैं। इलाज के लिए चंदा कर भी उनकी जांच करवाते हैं। लोगों को जागरूक करते हैं। जैसा कि परमेश्वर भुइयां बताते हैं – मेरा शरीर लगातार कमजोर होता जा रहा था। इलाज के लिए पैसा नहीं था… तब जाकर सुनीता जी और उमेश जी से मुलाकात हुई। इन लोगों ने न सिर्फ इलाज करवाया बल्कि घर लाकर दवा भी दे गये। कारू राम, सोनवा देवी भी ऐसी ही बात बताती हैं।

आगे बढ़ने पर एक गांव मिलता है हुटुकदाग। यहां मिलते हैं निरंजन मिस्त्री। जर्जर काया, सूखे होठ, निस्‍तेज आंखों वाले निरंजन हुटुकदाग में अपनी पत्नी के घर यानी ससुराल में रह रहे हैं। पिछले आठ माह से वे वहीं हैं। शादी के बाद इनकी तबीयत खराब हुई तो लोगों ने कहा कि जादू-टोना कर दिया गया है। कई माह तक झाड़-फूंक करवाने में ही लगे रहे। उमेश कहते हैं – काफी समझाने-बुझाने के बाद जांच के लिए तैयार हुए। जांच के बाद पता चला कि इन्हें टीबी है। तब जाकर इलाज शुरू हो सका। खैरादोहर, बरमनवा, तुकतुका, चेराई, डागरा, चुरुआ जैसे गांवों में भी हालात ऐसे ही हैं।

डॉट प्रोवाइडर मुनेश्वर सिंह बताते हैं कि प्राइवेट प्रैक्टिशनर डॉक्टर और झोलाछाप ओझा यह जानते हुए भी कि लोगों को टीबी की दवाएं मुफ्त में मिल जाती हैं, वहां तक नहीं पहुंचने देते। ग्रामीण जागरूकता के अभाव में इसे अपनी नियति मान बैठते हैं। फिजिशियन डॉक्टर मुकेश कुमार कहते हैं कि सरकार दवाई तो मुफ्त में दे रही है लेकिन जिन्हें इन दवाइयों की जरूरत है, उन्हें इसके बारे में अच्छे से मालूम ही नहीं है। जागरूकता अभियान को और तेज किये जाने की जरूरत है। उन गांवों में, जहां टीबी मरीजों की संख्या ज्यादा है, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर दवा उपलब्ध किये जाने की जरूरत है। डॉट प्रोवाइडर जहां नहीं हैं, वहां इसके लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

हालांकि दूसरी ओर स्टेट टीबी ऑफिसर राकेश दयाल कहते हैं – लोगों में जागरूकता आयी है। अस्पताल में मरीजों की संख्या बढ़ रही है। लोग सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए आने लगे हैं। यह अच्छा संकेत है। बेहतर परिणाम के लिए पारा मेडिकल और डॉक्टरों की ट्रेनिंग भी करायी जा रही है। सब ठीक रहा तो शीध्र ही अत्याधुनिक सुविधा भी झारखंड में उपलब्ध हो जाएगी। लेकिन डॉक्टर आइबी प्रसाद कहते हैं कि गरीबी का इस बीमारी से सीधा वास्ता है। यह तो बढ़ेगा ही। जरूरी है कि लोगों को बताया जाए कि जब आपको टीबी हो तो मुंह पर कपड़ा रखकर दूसरों से बात करे। और तमाम उपायों के बीच छतरपुर की सुनीता और उमेश जैसे लोगों की जरूरत हर इलाके में हैं। तभी इससे मुकाबला संभव है।

नापो को नापो तो जानें


♦ अनुपमा

यह असम का माजुली गांव नहीं है, जिसका अस्तित्व दांव पर लगा हुआ है और मिटता जा रहा है तो उस मिटते हुए गांव को, दांव पर लगी जिंदगियों को देखने हजारों सैलानी देश के कोने-कोने से पहुंचते हैं। यह एक झारखंडी गांव है, जिसका अस्तित्व दांव पर लगा हुआ है, जिंदगियां तिल-तिल मौत के आगोश में समा रही हैं लेकिन इस गुमनाम गांव को देखने-सुनने कोई नहीं आता। गांव का नाम है नापो। हजारीबाग जिले में पड़ता है। उसी हजारीबाग जिले में, जो मिथ और लोकमानस में हजार बागों के इलाके के रूप में मशहूर रहा है। अब इसकी नयी पहचान है। बाग की जगह यहां जानलेवा धुआं उगलती हुई चिमनियां दिखती हैं और इन चिमनियों ने हजारीबाग को राज्य में सबसे ज्यादा स्पंज आयरन फैक्ट्री वाले जिले के रूप पहचान दिलायी है।

इस जिले में करीबन 35 स्पंज आयरन फैक्ट्रियां हैं। इन्हीं में से दो फैक्ट्रियों के बीच नापो गांव पड़ता है। हेसालौंग पंचायत में। 40 घरों की बसावट और आबादी करीब 200, सारे हरिजन। अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी की हालत झारखंड के अन्य दर्जनों विवश गांव की तरह ही। बड़ा फर्क यह है कि यह गांव हर रोज, पल-पल काल के गाल में समा रहा है। औसत तौर पर देखें तो हर घर में टीबी के मरीज मिलेंगे।

गांव में पहुंचते ही सबसे पहला सामना होता है मैनवा देवी से। अपढ़ मैनवा के पास सवालों का ढेर है। वह पूछती हैं कि क्या देखने आये हैं यहां। देख लीजिए काली घास, काले पेड़, मरे हुए लोग, मुरझायी हुई जवानी, बीमार बचपन, बंजर जमीन, अंधकारमय भविष्य। मैनवा को टीबी है। वह डेढ़ साल से प्राइवेट डॉक्टरों से इलाज करवा रही हैं। पैसे का अभाव होता है तो इलाज छोड़ देती है। सरकार के डॉट्स प्रोग्राम की कोई जानकारी मैनवा को नहीं है। मैनवा से बातचीत के क्रम में ही वहां तिलवा देवी, दीना भुइयां, कमल भुइयां, किता भुइयां, सावित्री देवी, कुंती देवी, लछवा देवी, गोहरी देवी आदि की भीड़ जुटती है। यह संख्या देखते ही देखते 25 की हो जाती है। सब के सब टीबी मरीज। किसी ने आज तक सरकारी प्रोग्राम यानी डॉट्स, आरएनटीसीपी या एमडीआर के बारे नहीं जाना-सुना। न कभी कोई समझानेवाला आया, सरकारी दवा देने आया। ये वैसे मरीज हैं, जो खाने-पीने से थोड़ा पैसा बचा तो जान बचाने की ललक में टीबी की थोड़ी दवाई खरीद लाते हैं। थोड़ा ठीक महसूस हुआ तो फिर टीबी हब में काम करने निकल पड़ते हैं।

किता भुइयां कहते हैं, हमारी मजबूरी है कि हम चाहे मर जाएं, मिट जाएं, ज्यादा दिनों तक घर में नहीं रह सकते। हमें बच्चों का पेट भरने के लिए, खुद का पेट भरने के लिए कमाने जाना ही होगा। पहले तो खेती भी एक सहारा था लेकिन 2003-2004 के बाद से अनाज देनेवाले खेत, बंजर होकर बीमारियां ही देते हैं। इन 25 टीबी मरीजों में से मात्र दो ही ऐसे मिलें, जो यह मानते हैं कि सरकार दवाई तो देती है लेकिन उनका सवाल है कि यहां से सरकारी अस्पताल दस किलोमीटर की दूरी पर है। हम वहां हर खुराक लेने नहीं जा सकते। आवाजाही की परेशानियां, पैसे की किल्लत सबसे बड़ी समस्या है।

दरअसल इस गांव में 2003-04 के बाद से भविष्य पर ग्रहण लगना शुरू हुआ। उन वर्षों में दो स्पंज आयरन फैक्ट्रियां इस गांव के दोनों ओर महज डेढ़ किलोमीटर के फासले पर लगी जबकि सरकारी कायदे-कानून के अनुसार कम से कम दो फैक्ट्रियों के बीच पांच किलोमीटर की दूरी होनी चाहिए। फिर क्या था, धीरे-धीरे उपजाऊ जमीन भी लोगों को दाने-दाने के लिए तड़पाने लगा। स्पंज आयरन फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं, डस्ट खेत में पड़कर उसे बंजर बनाने लगे। लोगों ने खेती-बारी का काम-काज छोड़कर कोयले के अवैध कारोबार में कदम रखा। कारोबार नहीं, मजदूरी में। अहले सुबह ही यहां के लोग कई-कई किलोमीटर की यात्रा तय कर कोयला निकालते हैं और फिर इन्हीं फैक्ट्रियों तक कोयले को पहुंचाते हैं। एक बोरे में लगभग 180-200 किलो कोयला लाते हैं, और इस हाड़तोड़ काम के एवज में कीमत मिलती है 80 रुपये।

इसी गांव में मिले दशरथ अपनी पीड़ादायी कहानी को इस तरह बयां करते हैं, ‘मेरे पिता चौधरी भुइयां ने सारी जमीन बेच दी। कोई विकल्प नहीं।’ वहीं की मंजू देवी कहती हैं, पति की मौत हो गयी। छह बच्चे हैं, जमीन से कुछ होता नहीं, मुझे खुद टीबी है लेकिन मेरे पास मजदूरी के अलावा कोई विकल्प नहीं। जिस रोज टीबी की परेशानी की वजह से काम नहीं कर पाती, उस रोज बच्चों को भी भूखे पेट सोना पड़ता है।

जानकारों के अनुसार गरीबी और प्रदूषण, दोनों ने ही इस गांव को टीबी गांव के रूप में स्थापित किया है। इस गांव में इतने टीबी मरीज होने के बावजूद डॉट्स प्रोवाइडर का नहीं होना आश्चर्यचकित करता है। मजबूरी में ग्रामीणों को झोला छाप डॉक्टरों पर निर्भर रहना पड़ता है। कभी किसी गैर सरकारी संस्थानों ने भी नापो की सुध नहीं ली। गांव में कुछेक के पास लाल कार्ड है तो कुछेक के घर बिजली भी पहुंच गयी है लेकिन बिजली बिल भरने को पैसा नहीं, सो…! बांधनी कहती हैं कि यहां सिर्फ 25 लोगों ने स्वीकार किया कि टीबी है जबकि सच यह है कि यहां सबको खांसी है और यदि जांच हो तो हर घर में टीबी निकले। डॉ अरुण कहते हैं – यह हो सकता है क्योंकि टीबी के मरीजों के साथ रहने से इसका खतरा वैसे ही बढ़ा रहता है। टीबी का एक बड़ा कारण कुपोषण, गरीबी और भुखमरी तो है ही। हेसालौंग के रहनेवाले मानवाधिकार कार्यकर्ता कृष्णा कहते हैं – इस गांव के लोगों से तो जीने का भी अधिकार छीन लिया गया है।

यह कहानी सिर्फ नापो की नहीं है। झारखंड में कई-कई नापो हैं। स्वास्थ्य विभाग के यक्ष्मा नियंत्रण कार्यालय संभाग के अनुसार झारखंड में हर 35वें मिनट एक व्यक्ति की मौत टीबी से होती है। जबकि आश्चर्यजनक भी है कि झारखंड देश का एक ऐसा राज्य है, जहां सबसे अधिक एमडीआर के मामले सामने आये हैं। पूर्व जिला यक्ष्मा पदाधिकारी डॉ प्रसाद कहते हैं – राज्य में करीब 45 हजार मरीज ऐसे हैं, जिनका इलाज जिला यक्ष्मा नियंत्रण केंद्र में हो रहा है। सरकार अपने स्तर से हर संभव सुविधा उपलब्ध कराती है। लेकिन नापो को देखने, समझने के बाद स्पष्ट होता है कि डॉ प्रसाद की बात सैद्धांतिक तौर पर तो सही है, व्यावहारिक तौर पर यह हजम होनेवाली बात नहीं।

Friday, October 29, 2010

सुनिए बहलेनियों, भिनसरियों की व्‍यथा

♦ अनुपमा

झारखंड में एक जगह है तोरपा। वहीं की रहनेवाली है बहलेन कोनगाड़ी। बहलेन से पिछले दिनों इटकी टीबी अस्पताल में मुलाकात हुई। रांची से सटे इटकी का टीबी अस्पताल अंग्रेजों के जमाने से ही बड़ा मशहूर अस्पताल है। वहीं जेनरल वार्ड के एक बेड पर पड़ी हुई मिली बहलेन। पीला चेहरा, मरमराई हुई आंखें, खामोश बहलेन के चेहरे पर एक अजीब सी उदासी छायी हुई थी। बस यूं ही बातों-बातों में पूछा, कुछ उसके बारे में जानने के लिहाज से। एक बड़ी लड़की बहलेन, बच्‍चों की तरह सिसकने लगी। रोते-रोते उसने जो दास्तान सुनायी, वह बेहद दर्दनाक है। जिस रोज हम बहलेन से मिल रहे थे, ठीक उसके दो दिन पहले ही उसका छह माह का बच्‍चा अबॉर्ट हो गया था। डॉट्स की दवाई में जो गरमी होती है, उसके कारण गिर गया था बच्‍चा। वहां मिली एक नर्स बताती है कि यह दवा होती है इतनी गरमीवाली कि ऐसा होना स्वाभाविक था। पर बहलेन उस बच्‍चे को जन्‍म देना चाहती थी। उसे पालना चाहती थी। प्रेम के प्रतीक के रूप में रखना चाहती थी। वह प्रेम पूरी तरह से फ्रॉड ही था, फिर भी। लेकिन वह ऐसा कुछ भी न कर सकी।

बहलेन एक साल पहले दिल्‍ली गयी थी। झारखंड से जानेवाली और सैकड़ों लड़कियों की तरह। अपने परिवार की आर्थिक दशा को सुधारने के लिए, कुछ हसीन ख्‍वाबों के साथ। दलालों द्वारा दिखाये गये सुनहरे सपनों के साथ। बहलेन को अपने ही गांव का एक दलाल ले गया था। वहां उसे एक घर में दाई (मेड) का काम मिल गया। तय हुआ कि उसे तीन हजार रुपये हर माह मिलेंगे। पर रात-दिन खटने के बाद भी सारा पैसा दलाल ले उड़ा। दिल्‍ली के पश्चिम विहार में काम करने के दौरान ही उसे एक मुसलिम लड़के नासिर से प्‍यार हो गया। शादी का झांसा देकर वह उसका शारीरिक शोषण करता रहा। जब पता चला कि बहलेन पेट से है, तो वह भाग गया। बहलेन यह सब जानते हुए भी अपने बच्‍चे को जन्म देना चाहती थी, पर अब वह इसे नियति मान बैठी है। रात दिन खटने और ठीक से भोजन न मिलने के कारण बेहद कमजोर हो गयी। इसी बीच उसे टीबी हो गया। वह लौटकर अपने गांव आ गयी। लगातार खांसी होने पर गांव के लोगों ने उसे टीबी सेनेटोरियम में जांच के लिए भेजा तो पता चला कि उसे टीबी है। पिछले दो माह से उसका इलाज यहां चल रहा है और वह पहले से बेहतर महसूस कर रही है।

बहलेन से मिलने के बाद हम जैसे ही आगे बढ़े, हमारी नजर एक छोटी-सी बच्‍ची पर पड़ी। नाम है भिनसरिया कोरबा। भिनसरिया बिशुनपुर, गुमला की है। आज ही अस्पताल में भर्ती हुई है। पर हालत बिल्‍कुल गंभीर। पूछने पर कुछ भी नहीं बोलती। उसे अस्पताल में भर्ती करवाने के लिए लायी शिक्षिका बताती हैं कि वह अनाथ है और उसके माता-पिता (महाबीर कोरबा और चैती कोरबा) की मौत भी टीबी के कारण ही हो गयी थी। कोरबा प्रजाति विलुप्‍त होने के कगार पर है और उनके इलाज के लिए अब भी कोई विशेष उपाय नहीं किये गये हैं। सोमरी कच्‍छप भी इसी अस्पताल में भर्ती है। उसका पिछले चार महीनों से इलाज चल रहा है। इसके पहले उन्होंने दो महीने तक प्राइवेट में इलाज कराया था। लेकिन जब हालत बदतर हो गयी और इलाज के पैसे नहीं बचे, तो टीबी सेनेटोरियम में आयी है।

अस्पताल में ऐसे कुल 217 मरीज हैं और सबकी कहानी मार्मिक व बेहद संवेदनशील है। इसमें हर कटेगरी के मरीज शामिल हैं। इटकी सेनेटोरिम के अधीक्षक आरजेपी सिंह कहते हैं कि कटेगरी 1, 2 और 3 में सभी के मरीज आते हैं। अस्पताल में 415 लोगों के रखने की व्‍यवस्था है परंतु हमारी कोशिश होती है कि कॉम्‍प्‍लीकेटेड केसेज को छोड़कर बाकी मरीजों को उनके नजदीक के सेंटर पर इलाज के लिए भेज दिया जाए। रेसीस्टेंट केस को डॉट्स प्‍लस प्रोवाइड किया जाता है। झारखंड में एसटीडीसी और एलपीए की ट्रेनिंग हो चुकी है और बहुत जल्‍द ही यहां एडवांस टेस्ट की सुविधा भी उपलब्‍ध होगी। एसटीएस के रूप में काम करनेवाले हिमांशु कहते हैं कि इलाज का समय पूरा होने से पहले ही मरीज कभी-कभी दवा लेना छोड़ देते हैं। ऐसे में उन्हें काउंसलिंग देना और समझाना एक टेढ़ी खीर साबित होता है। आंगनबाड़ी सेविका या एएनएम भी इस काम में मदद करते हैं। पर पिछले वर्ष 2009 में 939 और इस वर्ष अब तक 600 लोगों का इलाज यहां हो चुका है। झारखंड में हर वर्ष टीबी मरिजों की संख्‍या बढ़ती जा रही है। यदि अस्पताल के मरिजों की संख्‍या देखें तो 2005 में जहां 659, 2006 में 683, 2007 में 815, 2008 में 879 मरीजों का इलाज सिर्फ इटकी टीबी सेनेटोरियम में हुआ। जो बाहर गये, उनकी बात अलग। प्राइवेट प्रैक्टिशनर के पास अलग। झारखंड अन्य कई चीजों का हब रहा है। अब टीबी का भी हब है। भारत में सबसे तेजी से टीबी मरीजों की संख्‍या यहां बढ़ रही हैं। इसमें धनबाद नंबर वन पर है। कोयले की कमाई में टीबी की बात कौन करेगा। सभी माइनिंग एरिया में कमोबेश स्थिति बदतर ही है।

Thursday, September 30, 2010

अपेक्षाओं और उपेक्षाओं की मायानगरी- ‘झॉलीवुड’

अनुपमा

मोरहाबादी मैदान के पास हम ऐक्शन, कैमरा, कट और शॉट जैसे शब्द सुनकर रुक जाते हैं. किसी गाने की शूटिंग चल रही है बिना किसी मेकअप रूम के. कोई एयरकंडीशनर नहीं, न ही कोई और ताम-झाम. मौजूद लोगों में से एक चिल्लाता है- जल्दी करो, ट्रैफिक का टाइम हो रहा है. तकनीक के नाम पर इनके पास सामान्य वीडियो कैमरे हैं और एडिटिंग के लिए भाड़े पर ली गई बुनियादी-सी मशीनें. स्टूडियो के नाम पर मुफ्त की पहाड़ियां, मैदान, नदियां और सड़कें.

आम-से वीडियो कैमरे से ‘बुद्धा वीप्स इन जादूगोड़ा’ सरीखी डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाकर राष्ट्रीय पुरस्कार पा चुके निर्माता-निर्देशक श्रीप्रकाश ने पहली बार झॉलीवुड के लिए फीचर फिल्म बनाई थी. नागपुरी और सादरी भाषा में बनी इस फिल्म का नाम था ‘बाहा’. झॉलीवुड की मायानगरी में संघर्ष कर रहे कलाकारों पर आधारित इस फिल्म ने झारखंड में बहुत नाम कमाया, लेकिन कमाई के नाम पर बस लाख-सवा लाख रुपए ही जुटा पाई जो इसकी लागत का एक मामूली-सा हिस्सा भर था. गौरतलब है कि यहां एक फिल्म करीब 6 से 7 लाख रुपए में बनती है, जो हिंदी फिल्मों के चरित्र कलाकार के मेहनताने से भी काफी कम है.

फिल्म निर्माता कमाई न कर पाने की दो मुख्य वजहें बताते हैं. एक- झारखंड के सारे सिनेमाहॉल बहुत बुरी हालत में हैं जहां कुछ गिने-चुने दर्शक ही जुटते हैं (कुछ हॉलवाले डिजिटल फिल्मों को दिखाने में आनाकानी भी करते हैं). टिकटों की कीमत छोटे शहरों में 8 से 14 रुपए और रांची जैसे शहरों में 20 से 60 रुपए तक है. रांची जैसे शहरों में इन फिल्मों को बस मॉर्निंग शो में ही दिखाते हैं, इसलिए व्यवसाय की ज्यादा गुंजाइश नहीं रह जाती. इसके अलावा ज्यादातर घरों में इन फिल्मों की पायरेटेड डीवीडी पहले-दूसरे दिन ही पहुंच जाती हैं
चूंकि झॉलीवुड कमाई के मामले में बहुत पीछे है लिहाजा इसके सितारे भी ज्यादा पैसा नहीं कमा पाते. झॉलीवुड के एंग्री यंग मैन दीपक लोहार के अलावा यहां कोई अन्य हीरो या हीरोइन आर्थिक दृष्टि से बहुत मजबूत नहीं हैं. ‘बाहा’ की 29 वर्षीया हीरोइन शीतल सुगंधिनी मुंडा समुदाय से हैं. एक इतनी नामी फिल्म में काम भी उनकी जिंदगी में कोई बड़ा बदलाव नहीं ला पाया है. वे एक एनजीओ में नौकरी करती हैं. ‘झारखंड का छैला’ के निर्देशक अनिल सिकदर के लाइटिंग इंजीनियर ऋषिकेश के मुताबिक इन फिल्मों में हीरो को तकरीबन 20 और हीरोइन को 15 हजार रुपए मिलते हैं. कुछ तो अपने घर का भी पैसा लगा देते हैं, इस उम्मीद में कि एक बार जम गए तो आगे उनकी पूछ बढ़ेगी. सपनों के बनने और बिखरने का खेल बॉलीवुड की तर्ज पर यहां भी कम नहीं होता.

एनएफडीसी (राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम) की जिम्मेदारी भले ही भारत की क्षेत्रीय बोलियों में बनने वाली फिल्मों को बढ़ावा देना है पर शायद झॉलीवुड उनकी नजरों के दायरे से बाहर की चीज है. यह बात और है कि इन फिल्मों को भी केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के उन्हीं मानकों पर परखा जाता है जिन पर अन्य स्थापित भारतीय फिल्म उद्योगों की फिल्मों का परीक्षण होता है. पर क्या सरकारी तंत्र इनके प्रति जरा भी जवाबदेह नहीं है?

फिल्म निर्माताओं का मानना है कि यदि सरकार उन्हें थोड़ी-सी टैक्स में सब्सिडी दे, सिनेमाहॉलों के लिए साल में छह सप्ताह इन क्षेत्रीय फिल्मों को दिखाना अनिवार्य कर दे और गांव-गुरबों के छोटे-छोटे सिनेमाहॉलों को बढ़ावा दे तो झॉलीवुड की भी किस्मत बदल जाएगी. 2008 में गठित अखिल भारतीय संथाली फिल्म समिति (एआईएसएफए) के अध्यक्ष रमेश हांसदा कहते हैं, ‘बिना किसी सरकारी सहयोग के हमने झारखंड में स्थानीय बोली और लोगों को लेकर फिल्में बनाई और दिखाई हैं. लोगों ने इन्हें खूब सराहा लेकिन सरकार हमें नजरअंदाज करती है, अगर वह हमारी ओर ध्यान दे तो कोई कारण नहीं कि हम अच्छा नहीं कर पाएं.’

हालांकि झॉलीवुड में बनने वाली ज्यादातर फिल्में डिजिटल कैमरों की सहायता से बनाई जाती हैं, मगर यहां अब तक 9 सेल्यूलाइड फिल्में भी बन चुकी हैं. समुदाय की आवाज को सेल्यूलाइड का माध्यम देने वाले ऐसे लोगोंं में करनडीह के रहने वाले दशरथ हांसदा (रमेश हांसदा के भाई) और प्रेम मार्डी का नाम पहले आता है. इन दो कलाकारों ने ही सबसे पहले 'चांदो लिखोन' (झारखंड की पहली जनजातीय फिल्म) बनाकर संथाली (आदिवासी) चलचित्र के सपने को साकार किया था. युगल किशोर मिश्र और रवि चौधरी ने भी कुछ सेल्यूलाइड फिल्में बनाई हैं. हालांकि महंगी होने की वजह से इन्हें वापस डिजिटल तकनीक का सहारा लेना पड़ रहा है.

‘अमू’ फिल्म को संगीत देने वाले और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पैठ बना चुके नंदलाल नायक भी अमेरिका छोड़-छाड़कर एक साल पहले झारखंड आ बसे हैं. वे एक महत्वाकांक्षी फिल्म बनाने में लगे हैं. यह फिल्म झारखंड से लड़कियों के पलायन और माओवाद के इर्द-गिर्द घूमती है. इसी तरह पत्रकार और संस्कृतिकर्मी मनोज चंचल भी पलायन को केंद्र में रखकर ‘बीरची’ नामक फिल्म बना रहे हैं. बिरसा मुंडा और आदिवासी आंदोलनों को केंद्र में रखकर भी कई फिल्में बनी हैं.

इसका यह मतलब कतई नहीं है कि यहां की फिल्में डॉक्यूमेंट्री फिल्मों कजैसी होती हैं. झॉलीवुड अपने दर्शकों की जरूरतों का पूरा खयाल रखता है. यहां की लगभग सभी फिल्मों में गाने, रोमांस, ऐक्शन और मार-धाड़ वाले दृश्यों का अच्छा तालमेल होता है.

अनिल सिकदर के मुताबिक झॉलीवुड का सालाना कारोबार दो से ढाई करोड़ रुपए का है और यह अब झारखंड के अलावा पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और बिहार तक फैलने लगा है. यहां की इकलौती इंफोटेनमेंट पत्रिका ‘जोहार सहिया’ के संपादक अश्विनी कुमार पंकज के मुताबिक आने वाले समय में झॉलीवुड में काफी संभावनाएं हैं.

त्रासदी यह है कि दर्शकों की अपेक्षाओं और सरकारी उपेक्षाओं के बीच फंसे झॉलीवुड की भिड़ंत उच्च तकनीक और तामझाम से लैस हिंदी फिल्मों से है, लेकिन झारखंड की मायानगरी अपने स्तर पर अपने अस्तित्व को बनाए रखने के संघर्ष में जुटी है और यह एक शुभ संकेत है

अजब कारनामों से भरे गजब प्रदेश में फिर सरकार

अनुपमा
और अंततः अजब कारनामों से भरे गजब प्रदेश झारखंड में फिर से सरकार बन ही गई. फिर वही गठबंधन, वही कुनबा, जो इसके पहले भी सरकार चला रहा था. भारतीय जनता पार्टी, आजसू और झारखंड मुक्ति मोर्चा. फर्क सिर्फ इतना रहा कि इस बार मुखिया बदला है, पहले शिबू सोरेन मुख्यमंत्री थे, अब अर्जुन मुंडा. सरकार कितने दिन चलेगी यह कोई नहीं बता सकता.

झारखंड में सरकारों के भविष्य को लेकर कोई कुछ बता भी नहीं सकता. इस मामले में यह अनोखा प्रदेश है. राज्य गठन के दसवें साल में है, आठवीं बार मुख्यमंत्री के पद पर शासक का बदलाव हो रहा है. किसी और की बात क्या की जाए, खुद झारखंड के सबसे बड़े नेता और इस सरकार की स्टीयरिंग अपने हाथ में रखने वाले पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन तहलका से बातचीत में कहते हैं, 'यहां कोई सरकार कभी अपना कार्यकाल पूरा नहींे कर सकती.' अब शिबू की बात मान लें तो इस सरकार का भी हश्र वैसा ही होने वाला है, जैसा कि पहले एक-एक कर सभी सरकारों का होता रहा है. शिबू की बात छोड़ भी दंे तो आजसू के दूसरे नंबर के नेता और फिर से मंत्री पद पर विराजमान होने की कतार में लगे चंद्रप्रकाश चौधरी भी सरकार के भविष्य पर बहुत विश्वास के साथ कुछ नहीं कहते. हंसते हुए कहते हैं, 'देखिए, पूरा होइए जाएगा कार्यकाल...!'

लगभग तीन माह पहले तक इसी गठबंधन के सहारे शिबू की सरकार चल रही थी. कथित मान-सम्मान और विश्वास को झटका लगने की दुहाई देते हुए भाजपा ने शिबू को दगाबाज, धोखेबाज नेता करार दिया जिसके बाद सरकार गिर गई. लेकिन अब अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनाने अथवा बनवाने के लिए 'पार्टी विद ए डिफरेंस' यानी भाजपा ने सारे नियम, आदर्श, सिद्धांत ताक पर रख दिए. भाजपा के कई दिग्गज दिल्ली में छटपटाते रहे लेकिन अध्यक्ष नितिन गडकरी ने विदेश से ही सरकार बनाने के लिए हरी झंडी दे दी. भाजपा संसदीय बोर्ड ने जिस शिबू के पाला बदलने के बाद उनकी सरकार को हटाने का निर्णय लिया था, उस संसदीय बोर्ड का फैसला धरा का धरा रह गया.

बकौल शिबू वे आज भी केंद्र में यूपीए के साथ हैं. केंद्र मंे यूपीए के साथ होने की बात कहने वाली पार्टी के साथ मिलकर राज्य में भाजपा द्वारा सरकार बनाने की हड़बड़ी ही वह अकेली चीज है जो इस बार की सरकार के लिए नई है. ऐसा क्यों, यह सवाल आजकल प्रदेश में अहम बना हुआ है. हर जगह एक ही चर्चा है कि यदि सरकार के लिए इन्हीं दलों का कॉकटेल बनना था तो फिर उस वक्त नौटंकी की जरूरत ही क्या थी! और फिर इस दरम्यान ऐसा क्या हो गया कि जिससे शिकायत थी, उसी से मोहब्बत हो गई.

राज्य के पहले मुख्यमंत्री और झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी कहते हैं, 'छह माह पहले भी इसी गठबंधन की सरकार बनी थी, चार माह तक ही चल सकी. ढाई माह से राष्ट्रपति शासन है. अब फिर वही गठजोड़ सत्ता में है. वह सरकार क्यों गिरी थी और ढाई माह में कैसे सारे मनमुटाव दूर हो गए, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.' मरांडी आगे कहते हैं कि औद्योगिक घरानों ने सरकार बनवाने में कीमत लगाई है, खरीद-फरोख्त की भी राजनीति हुई है. मैं खरीद-फरोख्त की राजनीति नहीं कर सकता था, इसलिए मौका आने पर भी 25 विधायकों के होते हुए भी मैंने सरकार बनाने की पहल नहीं की.

लेकिन राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के विधायक दल की नेता अन्नपूर्णा देवी इस सरकार के गठन के लिए मरांडी को ही कटघरे में खड़ा करती हैं. वे कहती हैं, 'कांग्रेस और झाविमो चाहते तो सरकार पहले ही बन सकती थी. यदि कांग्रेस के नेतृत्व में ही सरकार बन जाती तो क्या हो जाता? वे बाबूलाल पर परोक्ष तरीके से निशाना साधते हुए कहती हैं, ' कहने को तो यहां कुछ साफ-सुथरी छवि वाले नेता भी हैं लेकिन मौका मिलने पर सबका स्वार्थ नजर आने लगता है.'

जाहिर-सी बात है कि इस नए ढांचे को सरकार की बजाय अपने-अपने स्वार्थों और मजबूरियों में जुटी एक भीड़ कह सकते हैं. झारखंड सरकार के एक बड़े अधिकारी कहते हैं, 'चूंकि राष्ट्रपति शासन में काम तेजी से हो रहा था, भ्रष्टाचार पर शिकंजा कसने का सिलसिला शुरू हो चुका था और कई चीजें पटरी पर आने लगी थीं, इसलिए गैरकांग्रेसी दलों में छटपटाहट होना स्वाभाविक था. पूर्व मुख्यमंत्रियों की सुविधा का छिन जाना और विधायकों के फंड के उपयोग पर रोक लग जाना सभी को परेशान कर रहा था. ऐसे में दलगत भावनाओं से परे जाकर हर छटपटाता हुआ विधायक बस किसी तरह, किसी भी सरकार के बनने की बाट जोह रहा था. इसलिए इस बार अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में सरकार बनने में न कोई हंगामा हुआ, न विरोधी गुटों के नेताओं की ओर से ही रटे-रटाए वाक्य दुहराए गए. वरना तीन माह पहले तक झामुमो के नेता भाजपाइयों के खिलाफ आग उगल रहे थे तो भाजपा के नेता झामुमोवालों को पानी पी-पीकर कोस रहे थे.'

झामुमो से राजनीतिक जीवन की शुरुआत करके भाजपा में कद्दावर नेता बनने वाले अर्जुन मुंडा को चालाक नेता और शासक माना जाता है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रघुवर दास को किनारे लगाकर जब से अर्जुन मुंडा ने सरकार बनाने की कमान अपने हाथों में ली थी, तभी से यह तय माना जा रहा था कि सरकार बनेगी. अब यह भी माना जा रहा है कि अर्जुन मुंडा हैं तो वे इस भानुमति के कुनबे को चला भी लेंगे. लेकिन चुनौतियां इतनी हैं कि उनके लिए भी ऐसा करना आसान नहीं होने वाला है. इस अजीबोगरीब गठबंधन के पेंच उन्हें हर समय परेशान करते रहेंगे.

फिलहाल यह सरकार भाजपा के 18, जदयू के दो, झामुमो के 18, आजसू के पांच और दो निर्दलीय विधायकों के गणित से चलने को तैयार है. दूसरी ओर शासन की चुनौतियां सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी हैं. पूरा राज्य सूखे की चपेट में है. केंद्र से पैसा लेकर राहत कार्य सही ढंग से पहुंचवाना बड़ा काम माना जाएगा. राज्य में विकास योजनाओं पर ब्रेक लगा हुआ है. सालाना बजट की चौथाई राशि भी अब तक खर्च नहीं की जा सकी है जबकि वित्तीय वर्ष के छह माह गुजर चुके हैं. पेसा कानून के तहत पंचायत चुनाव करा लेना मुंडा के सामने बड़ी चुनौती है. इन सबके साथ नक्सलवाद शाश्वत समस्या के तौर पर रहेगा ही.

झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन के पुत्र और राज्य के नए उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कहते हैं कि हमारी प्राथमिकता पंचायत चुनाव कराने की ही है, हम इसे अच्छे से कराएंगे. इस सरकार के गठन पर हेमंत कहते हैं कि जनता नहीं चाहती कि एक बार फिर चुनाव का बोझ उसके माथे पर पड़े, इसके लिए सरकार का बनना बहुत जरूरी था. 'हम भाजपा के साथ फिर से सरकार बना रहे हैं तो इस पर बहुत सवाल उठाने की जरूरत नहीं क्योंकि हमारे लिए दोनों राष्ट्रीय दल यानी भाजपा और कांग्रेस एक ही तरह की पार्टी हैं' भाजपा के साथ मिलकर फिर से सरकार बनाने पर सोरेन कहते हैं.

चुनौतियों से निपटना और विकास को गति देना अलग मसला है. झारखंड में फिर से वही बड़ा सवाल सामने है कि बकरे की मां आखिर कब तक खैर मनाएगी. यानी कि सरकार कितने दिन और चलेगी?

सदन में विपक्षी नेता कांग्रेस के विधायक राजेंद्र सिंह कहते हैं कि अभी हम छह माह तक अविश्वास प्रस्ताव पेश नहीं कर सकते लेकिन इन दलों के गठबंधन में ही इतने कलह हैं कि इसका भविष्य बेहतर नहीं कहा जा सकता.

क्या होगा, यह आने वाला समय बताएगा, फिलहाल राज्य अपने स्थापना के दशक वर्ष में आठवें मुख्यमंत्री का आश्वासन सुनने को तैयार है, काम को परखने को तैयार है और बदलाव को देखने के लिए बेताब है

Thursday, June 17, 2010

डोमटोली में रोज लगने वाला एक स्कूल


रांची में कुल 1391 सरकारी प्राथमिक विद्यालय हैं. गली-मुहल्लों में खुले हुये निजी प्राईमरी स्कूलों की संख्या निकाली जाये तो यह आंकड़ा दुगुने के आसपास पहुंचता है. लेकिन शहर के डोमटोली इलाके में चलने वाला एक स्कूल इन सबों से अलग है. इसे न तो सरकार चलाती है और ना ही शिक्षा को उद्योग मानने वाले धनपति. कोई ट्रस्ट और एनजीओ भी नहीं.

टीवी मिस्त्री मो. एजाज कहते हैं- “इसे रोज मज़दूरी करने वाले हमारे जैसे लोग चलाते हैं. ”

करबला चौक के पास डोमटोली में रोज लगने वाला यह स्कूल दिहाड़ी मजदूरी करने वाले अभिभावकों के बच्चों के लिए आशा की किरण है. डोमटोली स्कूल के नाम से पुकारा जाने वाला प्रेरणा सामाजिक विद्यालय कहने को तो स्कूल ही है लेकिन है दूसरे सभी स्कूलों से अलग.

अब स्कूल की हालत को ही लें. भीषण गर्मी में स्कूल की खुली छत पर धूप का एक बड़ा हिस्सा रोके नहीं रूक रहा है. हालांकि इसे रोकने के लिए टाट-टप्पर के साथ ही स्कूल की टूटी-फूटी छत पर किसी ने अपने घर की चादर लाकर भी टांग दी है. बच्चे और उन्हें पढ़ाने वाली शिक्षिकायें पसीने से तरबतर हैं लेकिन कतारबद्ध बद्ध अलग-अलग कक्षाओं में बैठे बच्चे मौसम की मार को जैसे मात दे रहे हों.

ऐसे रखी नींव
तीन साल पहले इस स्कूल की नींव ऐसे लोगों ने रखी, जिनका शिक्षा से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था. रोज-रोज कमाने-खाने वालों के लिये यह दुखद था कि उनके बच्चे आवारा घूमते रहें या बेटियां घरों में चुल्हा-बरतन करती रहें. मजदूरों के बच्चे पढ़-लिख कर क्या करेंगे, जैसे ताने तो थे ही.

इलाके के मजदूरों ने बैठक की और फिर शुरु हुआ तिहाड़ी मजदूरों के सपनों का स्कूल. पहले आपस में ही चंदा किया गया और बच्चों की पढ़ाई का सिलसिला शुरु हुआ. स्कूल खुला टीवी मिस्त्री मोहम्मद एजाज की छत पर, जहां शुरुवात में 10 बच्चे पढ़ने के लिये आये.

एजाज मुस्कराते हुए बताते हैं- “ आज इस स्कूल में 160 बच्चे हैं. इनमें से अधिकांशत: दाई, रिक्शाचालक, मिस्त्री या ऐसे ही छोटे काम करनेवाले लोगों के बच्चे हैं. स्कूल में नर्सरी, केजी, कक्षा एक व दो तक की पढ़ाई सीबीएस ई पैटर्न में होती है.”

शुरुवात में स्कूल चलाने के लिये 10-10 रुपये का चंदा इकट्ठा किया गया था लेकिन बाद में स्कूल के बाहर ही एक दानपेटी लगा दी गई, जिसमें लोग स्वेच्छा से पैसे डालने लगे. हालांकि स्कूल चलाने के लिये पैसों की तंगी हमेशा बनी रहती है लेकिन इलाके के लोग आश्वस्त हैं कि यह तंगी धीरे-धीरे जरुर दूर हो जाएगी.

बुलंद हौसले
स्कूल की शुरुवात करने वाले टीवी मिस्त्री मो. एजाज, बक्सा मिस्त्री मो. इकबाल, बिजली मिस्त्री मो. इरफान, सरस्वती चौरिया, बीएसएनल में कैजुअल बेसिस पर कार्यरत मो. जावेद, राजमिस्त्री शाहिद आलम जैसे लोगों से आप बात करें तो लगता है कि उन्होंने स्कूल चलाने को एक चुनौती की तरह लिया है. जाहिर है, स्कूल चलाने वालों के हौसले अभिभावकों को भी प्रेरित करते ही हैं.

अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने आये मो. आलम कहते हैं- “हमारे बच्चे भी पैसेवालों के बच्चों की तरह कुछ बड़ा काम करें. हालांकि स्कूल के पास फंड की कमी है पर हम आधे पेट खाकर भी इसे बंद नहीं होने देंगे.”

यहां पढऩे के लिए आने वाले बच्चों का उत्साह भी देखते ही बनता है. वे जानते है कि चार पंक्तियों में चार कक्षाएं लगती हैं. ऐसे में वे खुद ही इतने अनुशासित हो गये हैं कि पहली पंक्ति वाले बच्चे दूसरी पंक्ति वाले बच्चे की ओर पीठ करके बैठते है ताकि आवाज ज्यादा न गूंजे और कोई परेशानी न हो.

सबसे अलग

अपनी ही कक्षा के दूसरे साथियों को ब्लैकबोर्ड पर पहाड़े और गिनती का सबक याद कराकर आया एक बच्चा कहता है- “ सरकारी स्कूल से तो यह अच्छा है. कम से कम होमवर्क तो मिलता है. रोज स्कूल न आने पर टीचर की डांट का डर भी रहता है.”

वैसे यह डर स्वाभाविक भी है क्योंकि स्कूल के बाद कभी-कभार स्कूल के टीचर या संचालक बच्चों के घर तक पहुंच जाते हैं. यह देखने कि उनके इस अनोखे स्कूल का विद्यार्थी आखिर कर क्या रहा है !यहां पढ़ने वाले बच्चे सुविधाओं से कहीं अधिक अनुशासनात्मक और गुणात्मक शिक्षा को महत्व देते हैं. ऐसे में इनके सपनों को पूरा करने से कोई नहीं रोक सकता.

12 वर्षीय शगुफ्ता परवीन कक्षा दो में पढ़ती हैं. शगुफ्ता बताती हैं –“ पहले सरकारी स्कूल में मैं पांचवीं की छात्रा थी, पर मैं न एक पंक्ति पढ़ पाती थी न लिख पाती थी. सरकारी स्कूल में जाकर बस बोर्ड से देखकर नकल उतारती थी. पर यहां के बच्चों को अंग्रेजी बोलते देखकर मैंने अपना नामांकन यहां करा लिया और आज मैं भी अंग्रजी में कुछ-कुछ बोल पाती हूं.”

15 वर्षीय कक्षा दो की छात्रा हिना शरमाते हुये बताती हैं- “ मेरे घरवालों ने तो अब तक मेरी शादी कर दी होती, यदि दो साल पहले एजाज सर मेरे घरवालों को समझाकर यहां पढ़ाई के लिये प्रेरित नहीं करते.”

अभिभावक भी मानते हैं कि इस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे दूसरों से अलग हैं. शगुफ्ता के तीन बच्चे सरकारी स्कूल में और तीन इस स्कूल में पढ़ते हैं. वे बताती हैं कि सरकारी स्कूल में हर दिन बच्चों को खाना मिलता है और महीने के सौ रुपये भी लेकिन वे चाहती हैं कि सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले उनके बच्चे भी यहीं पढ़ें. वे कहती हैं- “यहां पढ़नेवाले मेरे बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि और प्रेम है. वे मन लगा कर पढ़ते हैं.”

अभिभावकों की खुशी के दूसरे कारण भी हैं. साजिया और मुन्नी के पिता शराब में डूबे रहते थे, पर स्कूल में शराब से होनेवाले नुकसान के बारे में जानकर बच्चों ने अपने अब्बू से पूछा कि अब्बा अगर आप मर गये तो हम कहां जायेंगे. आप शराब मत पीया कीजिए. और यकीन मानिए कि यह बात उन्हें इस कदर छू गयी कि अब वे उसे हाथ तक नहीं लगाते.

स्कूल की शिक्षिका बेनाडेल्ट मिंज कहती है कि इन बच्चों की आंखों में भी डॉक्टर, इंजीनियर और शिक्षक बनने के सपने तैर रहे हैं. वे दृढ़ता के साथ कहती हैं- “यहां पढ़ने वाले बच्चे सुविधाओं से कहीं अधिक अनुशासनात्मक और गुणात्मक शिक्षा को महत्व देते हैं. ऐसे में इनके सपनों को पूरा करने से कोई नहीं रोक सकता.”

एक औऱ शिक्षिका अंबरी भी मानती हैं कि इस स्कूल के बच्चे बहुत गंभीरता से पढ़ाई कर रहे हैं और उन्हें इस बात का अहसास है कि उन्हें मां-बाप के सपनों को पूरा करना है. ज़ाहिर है, इस बस्ती की प्रार्थनाओं में यह दुआ भी शामिल रहती है कि उपरवाला इस स्कूल को और बुलंदी दे.

Saturday, June 5, 2010

हौसला देता हेसालौंग


एक लड़की है सीमा. झारखंड या देश की अन्य हजारों-लाखों लड़कियों की तरह. बिल्कुल सामान्य-सी लड़की. दैनिक मजदूरी करने वाली हेसालौंग के दलित परिवार से है. झारखंड के हजारीबाग जिले में. दलितों व पिछड़ी जातियों का गांव. झारखंड के सैकड़ों गांवों की तरह. सीमा हेसालौंग गांव की ही है. सीमा की खास बात यह है कि वह दो बार मैट्रिक फेल हुई लेकिन धैर्य बनाये रखा, मेहनत जारी रखी और तीसरी बार में पास कर गयी. अब इंटर में पढ़ रही है. अपने गांव की पहली दलित लड़की बनी, जो मैट्रिक पास हुई.

इलाके में चर्चे हुए. और सीमा के गांव हेसालौंग की चर्चा सिर्फ इसलिए, योंकि वह गांव अन्य सामान्य गांवों से ज्यादा मुश्किलों में है. अगल-बगल में खुले स्पंज आयरन फैट्रियों ने गांव की जमीन को बंजर कर दिया है. पीने का पानी मयस्सर नहीं होता लोगों को तो एक-एक बालटी पानी के लिए या तो एक किलोमीटर दूर चलकर चुआं पर जाते हैं या इकलौते चापाकल पर गर्मी की रातों में आठ-आठ घंटे लाइन में लगे रहते हैं. सीमा से यह पूछने पर कि तुमने तो इतिहास रच दिया. वह तुरंत अपने घर के बगल में एक छोटे से भवन की ओर इशारा करते हुए कहती है. इतिहास मैं क्या रचती, मेहनत-मजदूरी से फुर्सत कहां है, सब उसने करवा दिया. उस भवन ने. सीमा जिस भवन की ओर इशारा किया, वही एक चीज इस गांव में है, जो तमाम मुश्किल हालातों, चुनौतियों व परेशानियों के बावजूद हेसालौंग को एक ऐसे गांव के रूप में स्थापित करता है, जिसकी मिसाल देश भर में कहीं दी जा सकती है.

वह जिस भवन की ओर इशारा की वह पंचायत का सामुदायिक भवन है, जिसके बाहर दीवार पर आड़े-तीरछे शब्दों में लिखा हुआ है- मुंशी प्रेमचंद पुस्तकालय. पुस्तकालय के नाम पर चंद किताबें, एक टेबल, जिस पर सजाने-संवारने के लिए फटी-पुरानी धोती बिछी हुई है और कुछ बोरे, जिस पर बैठकर पढ़ाई होती है. किताबों के नाम पर अधिकतर टैस्ट कि किताबें, प्रेमचंद का मानसरोवर, कुछ उपन्यास, कुछ साहित्यिक पत्रिकाएं और कुछेक बच्चों की किताबें. संसाधन भले ही कुछ न हो लेकिन इस लाइब्रेरी ने इलाके की तसवीर और तकदीर, दोनों बदल दी है.अभी झारखंड में मैट्रिक और इंटर की परीक्षा ली जा रही है. इस परीक्षा के पहले इस लाइब्रेरी में गांव के चंद युवाओं ने कई-कई बार प्रैटिस टेस्ट लेकर उनमें इतना आत्मविश्वास भर दिया है कि कोई सेेकंड डिविजन की बात नहीं करता. गांव के चंद पढ़े-लिखे नौजवान खुद से अध्ययन कर परीक्षा का मॉडल प्रश्न पत्र तैयार करते हैं. निर्धारित समय में टेस्ट लेते हैं और फिर परीक्षा परिणाम भी जारी करते हैं. पिछले पांच सालों से यही सिलसिला चल रहा है और अब नतीजा यह है कि इस एक गंवई लाइब्रेरी के टेस्ट में शामिल होने के लिए उस इलाके के परीक्षार्थी वाहन रिजर्व कर निर्धारित तिथि पर पहुंचते हैं. सरस्वती विद्या मंदिर और डीएवी जैसे स्कूलों के छात्र भी, जो उस इलाके का सबसे प्रतिष्ठित स्कूलों में है.

उसी लाइब्रेरी में मिली ममता, प्रभा, सीता, दीपिका जो इस बार इंटर की परीक्षा दे रही हैं. उनसे यह पूछने पर कि सामने परीक्षा है तो तनाव है कि नहीं. सबका जवाब प्राय: एक सा- काहे का टेंशन, साल भर यहां आकर पढ़ते हैं, जमकर टेस्ट देते हैं, तो टेंशन या? जिस दिन मैं वहां पहुंची, वहां कुछ लड़कियां डीबेट में भाग लेने आयी थी तो कुछेक को संगीत लास करना था. कुछ विज प्रतियोगिता में हिस्सा लेती, कुछेक को राइटिंग प्रतियोगिता में बाजी मारने की हड़बड़ी थी और शाम को सबको कराटे और स्पोकेन इंग्लिश लास जरूरी करना था. इतना सब कुछ उस एक छोटे से भवन में होता है. और एक खास बात यह कि यह लाइब्रेरी न तो किसी एनजीओ या ट्रस्ट का है और न ही किसी कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी की मेहरबानी की उपज. बस पांच साल पहले गांव के ही लालदीप, मनोज, कैलाश, मंतोष, नवीन, कृष्णा आदि चंद नौजवानों ने गांव में चंदा शुरू किया. 667 रुपये जमा हुए, 500 की किताबें आयी, 167 में मुंशी प्रेमचंद की जयंती मनी और लाइब्रेरी शुरू. अब उस गांव का सबसे बड़ा सालाना आयोजन मुंशी प्रेमचंद जयंती ही है और चंदा तीन हजार के करीब हो जाता है. और हां, यह जान लेना भी जरूरी है, यहां सारी गतिविधियां नि:शुल्क है. कोई शुल्क नहीं, बल्कि यदि कोई विद्यार्थी अपने घर किताब ले गया और समय पर वापस नहीं कर सका तो अगले दिन कपिल उसके घर पहुंचकर कहता है-कितबवा लौटा दो, दूसरे को भी चाहिए होगा...इस लाइब्रेरी की देखरेख अब कपिल ही करता है. कपिल इसी लाइब्रेरी के सौजन्य से मैट्रिक की परीक्षा तो पास कर गया लेकिन आर्थिक तंगी के कारण फिलहाल उसकी आगे की पढ़ाई बंद है.

उस लाइब्रेरी में चलने वाली इन गतिविधियों के संचालन के बारे में जानना भी दिलचस्प है. कैलाश खुद इंटर पास हैं. अंग्रेजी स्कूल में पढ़े हैं, अंग्रेजी बोल लेते हैं तो वे गांव के छात्र-छात्राओं को हर शाम अंग्रेजी बोलना सिखाते हैं. कृष्णा मनोविज्ञान से स्नातक कर शिक्षक बन गये हैं. दिनभर सरकारी स्कूल में पढ़ाकर आते हैं तो शाम को लाइब्रेरी में बैठकर खुद पढ़ते हैं ताकि मॉडल टेस्ट पेपर तैयार किया जा सके. कृष्णा के साथ पारा शिक्षक नवीन पांडेय, मंतोष कुमार होते हैं. उसी गांव के एक नौजवान अरविंद हैं जो कराटे में ब्लैक बेल्ट धारी हैं. अरविंद गांव के 45 लड़के-लड़कियों को कराटे सीखाते हैं. और इसकी बुनियाद रखनेवालों में प्रमुख लालदीप गोप, जो नागपुर में विज्ञान अनुसंधान सहायक हैं, जब घर आते हैं तो लगातार कैरियर काउंसेलिंग का दौर चलता है.