अनुपमा
मोरहाबादी मैदान के पास हम ऐक्शन, कैमरा, कट और शॉट जैसे शब्द सुनकर रुक जाते हैं. किसी गाने की शूटिंग चल रही है बिना किसी मेकअप रूम के. कोई एयरकंडीशनर नहीं, न ही कोई और ताम-झाम. मौजूद लोगों में से एक चिल्लाता है- जल्दी करो, ट्रैफिक का टाइम हो रहा है. तकनीक के नाम पर इनके पास सामान्य वीडियो कैमरे हैं और एडिटिंग के लिए भाड़े पर ली गई बुनियादी-सी मशीनें. स्टूडियो के नाम पर मुफ्त की पहाड़ियां, मैदान, नदियां और सड़कें.
आम-से वीडियो कैमरे से ‘बुद्धा वीप्स इन जादूगोड़ा’ सरीखी डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाकर राष्ट्रीय पुरस्कार पा चुके निर्माता-निर्देशक श्रीप्रकाश ने पहली बार झॉलीवुड के लिए फीचर फिल्म बनाई थी. नागपुरी और सादरी भाषा में बनी इस फिल्म का नाम था ‘बाहा’. झॉलीवुड की मायानगरी में संघर्ष कर रहे कलाकारों पर आधारित इस फिल्म ने झारखंड में बहुत नाम कमाया, लेकिन कमाई के नाम पर बस लाख-सवा लाख रुपए ही जुटा पाई जो इसकी लागत का एक मामूली-सा हिस्सा भर था. गौरतलब है कि यहां एक फिल्म करीब 6 से 7 लाख रुपए में बनती है, जो हिंदी फिल्मों के चरित्र कलाकार के मेहनताने से भी काफी कम है.
फिल्म निर्माता कमाई न कर पाने की दो मुख्य वजहें बताते हैं. एक- झारखंड के सारे सिनेमाहॉल बहुत बुरी हालत में हैं जहां कुछ गिने-चुने दर्शक ही जुटते हैं (कुछ हॉलवाले डिजिटल फिल्मों को दिखाने में आनाकानी भी करते हैं). टिकटों की कीमत छोटे शहरों में 8 से 14 रुपए और रांची जैसे शहरों में 20 से 60 रुपए तक है. रांची जैसे शहरों में इन फिल्मों को बस मॉर्निंग शो में ही दिखाते हैं, इसलिए व्यवसाय की ज्यादा गुंजाइश नहीं रह जाती. इसके अलावा ज्यादातर घरों में इन फिल्मों की पायरेटेड डीवीडी पहले-दूसरे दिन ही पहुंच जाती हैं
चूंकि झॉलीवुड कमाई के मामले में बहुत पीछे है लिहाजा इसके सितारे भी ज्यादा पैसा नहीं कमा पाते. झॉलीवुड के एंग्री यंग मैन दीपक लोहार के अलावा यहां कोई अन्य हीरो या हीरोइन आर्थिक दृष्टि से बहुत मजबूत नहीं हैं. ‘बाहा’ की 29 वर्षीया हीरोइन शीतल सुगंधिनी मुंडा समुदाय से हैं. एक इतनी नामी फिल्म में काम भी उनकी जिंदगी में कोई बड़ा बदलाव नहीं ला पाया है. वे एक एनजीओ में नौकरी करती हैं. ‘झारखंड का छैला’ के निर्देशक अनिल सिकदर के लाइटिंग इंजीनियर ऋषिकेश के मुताबिक इन फिल्मों में हीरो को तकरीबन 20 और हीरोइन को 15 हजार रुपए मिलते हैं. कुछ तो अपने घर का भी पैसा लगा देते हैं, इस उम्मीद में कि एक बार जम गए तो आगे उनकी पूछ बढ़ेगी. सपनों के बनने और बिखरने का खेल बॉलीवुड की तर्ज पर यहां भी कम नहीं होता.
एनएफडीसी (राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम) की जिम्मेदारी भले ही भारत की क्षेत्रीय बोलियों में बनने वाली फिल्मों को बढ़ावा देना है पर शायद झॉलीवुड उनकी नजरों के दायरे से बाहर की चीज है. यह बात और है कि इन फिल्मों को भी केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के उन्हीं मानकों पर परखा जाता है जिन पर अन्य स्थापित भारतीय फिल्म उद्योगों की फिल्मों का परीक्षण होता है. पर क्या सरकारी तंत्र इनके प्रति जरा भी जवाबदेह नहीं है?
फिल्म निर्माताओं का मानना है कि यदि सरकार उन्हें थोड़ी-सी टैक्स में सब्सिडी दे, सिनेमाहॉलों के लिए साल में छह सप्ताह इन क्षेत्रीय फिल्मों को दिखाना अनिवार्य कर दे और गांव-गुरबों के छोटे-छोटे सिनेमाहॉलों को बढ़ावा दे तो झॉलीवुड की भी किस्मत बदल जाएगी. 2008 में गठित अखिल भारतीय संथाली फिल्म समिति (एआईएसएफए) के अध्यक्ष रमेश हांसदा कहते हैं, ‘बिना किसी सरकारी सहयोग के हमने झारखंड में स्थानीय बोली और लोगों को लेकर फिल्में बनाई और दिखाई हैं. लोगों ने इन्हें खूब सराहा लेकिन सरकार हमें नजरअंदाज करती है, अगर वह हमारी ओर ध्यान दे तो कोई कारण नहीं कि हम अच्छा नहीं कर पाएं.’
हालांकि झॉलीवुड में बनने वाली ज्यादातर फिल्में डिजिटल कैमरों की सहायता से बनाई जाती हैं, मगर यहां अब तक 9 सेल्यूलाइड फिल्में भी बन चुकी हैं. समुदाय की आवाज को सेल्यूलाइड का माध्यम देने वाले ऐसे लोगोंं में करनडीह के रहने वाले दशरथ हांसदा (रमेश हांसदा के भाई) और प्रेम मार्डी का नाम पहले आता है. इन दो कलाकारों ने ही सबसे पहले 'चांदो लिखोन' (झारखंड की पहली जनजातीय फिल्म) बनाकर संथाली (आदिवासी) चलचित्र के सपने को साकार किया था. युगल किशोर मिश्र और रवि चौधरी ने भी कुछ सेल्यूलाइड फिल्में बनाई हैं. हालांकि महंगी होने की वजह से इन्हें वापस डिजिटल तकनीक का सहारा लेना पड़ रहा है.
‘अमू’ फिल्म को संगीत देने वाले और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पैठ बना चुके नंदलाल नायक भी अमेरिका छोड़-छाड़कर एक साल पहले झारखंड आ बसे हैं. वे एक महत्वाकांक्षी फिल्म बनाने में लगे हैं. यह फिल्म झारखंड से लड़कियों के पलायन और माओवाद के इर्द-गिर्द घूमती है. इसी तरह पत्रकार और संस्कृतिकर्मी मनोज चंचल भी पलायन को केंद्र में रखकर ‘बीरची’ नामक फिल्म बना रहे हैं. बिरसा मुंडा और आदिवासी आंदोलनों को केंद्र में रखकर भी कई फिल्में बनी हैं.
इसका यह मतलब कतई नहीं है कि यहां की फिल्में डॉक्यूमेंट्री फिल्मों कजैसी होती हैं. झॉलीवुड अपने दर्शकों की जरूरतों का पूरा खयाल रखता है. यहां की लगभग सभी फिल्मों में गाने, रोमांस, ऐक्शन और मार-धाड़ वाले दृश्यों का अच्छा तालमेल होता है.
अनिल सिकदर के मुताबिक झॉलीवुड का सालाना कारोबार दो से ढाई करोड़ रुपए का है और यह अब झारखंड के अलावा पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और बिहार तक फैलने लगा है. यहां की इकलौती इंफोटेनमेंट पत्रिका ‘जोहार सहिया’ के संपादक अश्विनी कुमार पंकज के मुताबिक आने वाले समय में झॉलीवुड में काफी संभावनाएं हैं.
त्रासदी यह है कि दर्शकों की अपेक्षाओं और सरकारी उपेक्षाओं के बीच फंसे झॉलीवुड की भिड़ंत उच्च तकनीक और तामझाम से लैस हिंदी फिल्मों से है, लेकिन झारखंड की मायानगरी अपने स्तर पर अपने अस्तित्व को बनाए रखने के संघर्ष में जुटी है और यह एक शुभ संकेत है
Thursday, September 30, 2010
अजब कारनामों से भरे गजब प्रदेश में फिर सरकार
अनुपमा
और अंततः अजब कारनामों से भरे गजब प्रदेश झारखंड में फिर से सरकार बन ही गई. फिर वही गठबंधन, वही कुनबा, जो इसके पहले भी सरकार चला रहा था. भारतीय जनता पार्टी, आजसू और झारखंड मुक्ति मोर्चा. फर्क सिर्फ इतना रहा कि इस बार मुखिया बदला है, पहले शिबू सोरेन मुख्यमंत्री थे, अब अर्जुन मुंडा. सरकार कितने दिन चलेगी यह कोई नहीं बता सकता.
झारखंड में सरकारों के भविष्य को लेकर कोई कुछ बता भी नहीं सकता. इस मामले में यह अनोखा प्रदेश है. राज्य गठन के दसवें साल में है, आठवीं बार मुख्यमंत्री के पद पर शासक का बदलाव हो रहा है. किसी और की बात क्या की जाए, खुद झारखंड के सबसे बड़े नेता और इस सरकार की स्टीयरिंग अपने हाथ में रखने वाले पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन तहलका से बातचीत में कहते हैं, 'यहां कोई सरकार कभी अपना कार्यकाल पूरा नहींे कर सकती.' अब शिबू की बात मान लें तो इस सरकार का भी हश्र वैसा ही होने वाला है, जैसा कि पहले एक-एक कर सभी सरकारों का होता रहा है. शिबू की बात छोड़ भी दंे तो आजसू के दूसरे नंबर के नेता और फिर से मंत्री पद पर विराजमान होने की कतार में लगे चंद्रप्रकाश चौधरी भी सरकार के भविष्य पर बहुत विश्वास के साथ कुछ नहीं कहते. हंसते हुए कहते हैं, 'देखिए, पूरा होइए जाएगा कार्यकाल...!'
लगभग तीन माह पहले तक इसी गठबंधन के सहारे शिबू की सरकार चल रही थी. कथित मान-सम्मान और विश्वास को झटका लगने की दुहाई देते हुए भाजपा ने शिबू को दगाबाज, धोखेबाज नेता करार दिया जिसके बाद सरकार गिर गई. लेकिन अब अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनाने अथवा बनवाने के लिए 'पार्टी विद ए डिफरेंस' यानी भाजपा ने सारे नियम, आदर्श, सिद्धांत ताक पर रख दिए. भाजपा के कई दिग्गज दिल्ली में छटपटाते रहे लेकिन अध्यक्ष नितिन गडकरी ने विदेश से ही सरकार बनाने के लिए हरी झंडी दे दी. भाजपा संसदीय बोर्ड ने जिस शिबू के पाला बदलने के बाद उनकी सरकार को हटाने का निर्णय लिया था, उस संसदीय बोर्ड का फैसला धरा का धरा रह गया.
बकौल शिबू वे आज भी केंद्र में यूपीए के साथ हैं. केंद्र मंे यूपीए के साथ होने की बात कहने वाली पार्टी के साथ मिलकर राज्य में भाजपा द्वारा सरकार बनाने की हड़बड़ी ही वह अकेली चीज है जो इस बार की सरकार के लिए नई है. ऐसा क्यों, यह सवाल आजकल प्रदेश में अहम बना हुआ है. हर जगह एक ही चर्चा है कि यदि सरकार के लिए इन्हीं दलों का कॉकटेल बनना था तो फिर उस वक्त नौटंकी की जरूरत ही क्या थी! और फिर इस दरम्यान ऐसा क्या हो गया कि जिससे शिकायत थी, उसी से मोहब्बत हो गई.
राज्य के पहले मुख्यमंत्री और झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी कहते हैं, 'छह माह पहले भी इसी गठबंधन की सरकार बनी थी, चार माह तक ही चल सकी. ढाई माह से राष्ट्रपति शासन है. अब फिर वही गठजोड़ सत्ता में है. वह सरकार क्यों गिरी थी और ढाई माह में कैसे सारे मनमुटाव दूर हो गए, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.' मरांडी आगे कहते हैं कि औद्योगिक घरानों ने सरकार बनवाने में कीमत लगाई है, खरीद-फरोख्त की भी राजनीति हुई है. मैं खरीद-फरोख्त की राजनीति नहीं कर सकता था, इसलिए मौका आने पर भी 25 विधायकों के होते हुए भी मैंने सरकार बनाने की पहल नहीं की.
लेकिन राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के विधायक दल की नेता अन्नपूर्णा देवी इस सरकार के गठन के लिए मरांडी को ही कटघरे में खड़ा करती हैं. वे कहती हैं, 'कांग्रेस और झाविमो चाहते तो सरकार पहले ही बन सकती थी. यदि कांग्रेस के नेतृत्व में ही सरकार बन जाती तो क्या हो जाता? वे बाबूलाल पर परोक्ष तरीके से निशाना साधते हुए कहती हैं, ' कहने को तो यहां कुछ साफ-सुथरी छवि वाले नेता भी हैं लेकिन मौका मिलने पर सबका स्वार्थ नजर आने लगता है.'
जाहिर-सी बात है कि इस नए ढांचे को सरकार की बजाय अपने-अपने स्वार्थों और मजबूरियों में जुटी एक भीड़ कह सकते हैं. झारखंड सरकार के एक बड़े अधिकारी कहते हैं, 'चूंकि राष्ट्रपति शासन में काम तेजी से हो रहा था, भ्रष्टाचार पर शिकंजा कसने का सिलसिला शुरू हो चुका था और कई चीजें पटरी पर आने लगी थीं, इसलिए गैरकांग्रेसी दलों में छटपटाहट होना स्वाभाविक था. पूर्व मुख्यमंत्रियों की सुविधा का छिन जाना और विधायकों के फंड के उपयोग पर रोक लग जाना सभी को परेशान कर रहा था. ऐसे में दलगत भावनाओं से परे जाकर हर छटपटाता हुआ विधायक बस किसी तरह, किसी भी सरकार के बनने की बाट जोह रहा था. इसलिए इस बार अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में सरकार बनने में न कोई हंगामा हुआ, न विरोधी गुटों के नेताओं की ओर से ही रटे-रटाए वाक्य दुहराए गए. वरना तीन माह पहले तक झामुमो के नेता भाजपाइयों के खिलाफ आग उगल रहे थे तो भाजपा के नेता झामुमोवालों को पानी पी-पीकर कोस रहे थे.'
झामुमो से राजनीतिक जीवन की शुरुआत करके भाजपा में कद्दावर नेता बनने वाले अर्जुन मुंडा को चालाक नेता और शासक माना जाता है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रघुवर दास को किनारे लगाकर जब से अर्जुन मुंडा ने सरकार बनाने की कमान अपने हाथों में ली थी, तभी से यह तय माना जा रहा था कि सरकार बनेगी. अब यह भी माना जा रहा है कि अर्जुन मुंडा हैं तो वे इस भानुमति के कुनबे को चला भी लेंगे. लेकिन चुनौतियां इतनी हैं कि उनके लिए भी ऐसा करना आसान नहीं होने वाला है. इस अजीबोगरीब गठबंधन के पेंच उन्हें हर समय परेशान करते रहेंगे.
फिलहाल यह सरकार भाजपा के 18, जदयू के दो, झामुमो के 18, आजसू के पांच और दो निर्दलीय विधायकों के गणित से चलने को तैयार है. दूसरी ओर शासन की चुनौतियां सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी हैं. पूरा राज्य सूखे की चपेट में है. केंद्र से पैसा लेकर राहत कार्य सही ढंग से पहुंचवाना बड़ा काम माना जाएगा. राज्य में विकास योजनाओं पर ब्रेक लगा हुआ है. सालाना बजट की चौथाई राशि भी अब तक खर्च नहीं की जा सकी है जबकि वित्तीय वर्ष के छह माह गुजर चुके हैं. पेसा कानून के तहत पंचायत चुनाव करा लेना मुंडा के सामने बड़ी चुनौती है. इन सबके साथ नक्सलवाद शाश्वत समस्या के तौर पर रहेगा ही.
झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन के पुत्र और राज्य के नए उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कहते हैं कि हमारी प्राथमिकता पंचायत चुनाव कराने की ही है, हम इसे अच्छे से कराएंगे. इस सरकार के गठन पर हेमंत कहते हैं कि जनता नहीं चाहती कि एक बार फिर चुनाव का बोझ उसके माथे पर पड़े, इसके लिए सरकार का बनना बहुत जरूरी था. 'हम भाजपा के साथ फिर से सरकार बना रहे हैं तो इस पर बहुत सवाल उठाने की जरूरत नहीं क्योंकि हमारे लिए दोनों राष्ट्रीय दल यानी भाजपा और कांग्रेस एक ही तरह की पार्टी हैं' भाजपा के साथ मिलकर फिर से सरकार बनाने पर सोरेन कहते हैं.
चुनौतियों से निपटना और विकास को गति देना अलग मसला है. झारखंड में फिर से वही बड़ा सवाल सामने है कि बकरे की मां आखिर कब तक खैर मनाएगी. यानी कि सरकार कितने दिन और चलेगी?
सदन में विपक्षी नेता कांग्रेस के विधायक राजेंद्र सिंह कहते हैं कि अभी हम छह माह तक अविश्वास प्रस्ताव पेश नहीं कर सकते लेकिन इन दलों के गठबंधन में ही इतने कलह हैं कि इसका भविष्य बेहतर नहीं कहा जा सकता.
क्या होगा, यह आने वाला समय बताएगा, फिलहाल राज्य अपने स्थापना के दशक वर्ष में आठवें मुख्यमंत्री का आश्वासन सुनने को तैयार है, काम को परखने को तैयार है और बदलाव को देखने के लिए बेताब है
और अंततः अजब कारनामों से भरे गजब प्रदेश झारखंड में फिर से सरकार बन ही गई. फिर वही गठबंधन, वही कुनबा, जो इसके पहले भी सरकार चला रहा था. भारतीय जनता पार्टी, आजसू और झारखंड मुक्ति मोर्चा. फर्क सिर्फ इतना रहा कि इस बार मुखिया बदला है, पहले शिबू सोरेन मुख्यमंत्री थे, अब अर्जुन मुंडा. सरकार कितने दिन चलेगी यह कोई नहीं बता सकता.
झारखंड में सरकारों के भविष्य को लेकर कोई कुछ बता भी नहीं सकता. इस मामले में यह अनोखा प्रदेश है. राज्य गठन के दसवें साल में है, आठवीं बार मुख्यमंत्री के पद पर शासक का बदलाव हो रहा है. किसी और की बात क्या की जाए, खुद झारखंड के सबसे बड़े नेता और इस सरकार की स्टीयरिंग अपने हाथ में रखने वाले पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन तहलका से बातचीत में कहते हैं, 'यहां कोई सरकार कभी अपना कार्यकाल पूरा नहींे कर सकती.' अब शिबू की बात मान लें तो इस सरकार का भी हश्र वैसा ही होने वाला है, जैसा कि पहले एक-एक कर सभी सरकारों का होता रहा है. शिबू की बात छोड़ भी दंे तो आजसू के दूसरे नंबर के नेता और फिर से मंत्री पद पर विराजमान होने की कतार में लगे चंद्रप्रकाश चौधरी भी सरकार के भविष्य पर बहुत विश्वास के साथ कुछ नहीं कहते. हंसते हुए कहते हैं, 'देखिए, पूरा होइए जाएगा कार्यकाल...!'
लगभग तीन माह पहले तक इसी गठबंधन के सहारे शिबू की सरकार चल रही थी. कथित मान-सम्मान और विश्वास को झटका लगने की दुहाई देते हुए भाजपा ने शिबू को दगाबाज, धोखेबाज नेता करार दिया जिसके बाद सरकार गिर गई. लेकिन अब अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनाने अथवा बनवाने के लिए 'पार्टी विद ए डिफरेंस' यानी भाजपा ने सारे नियम, आदर्श, सिद्धांत ताक पर रख दिए. भाजपा के कई दिग्गज दिल्ली में छटपटाते रहे लेकिन अध्यक्ष नितिन गडकरी ने विदेश से ही सरकार बनाने के लिए हरी झंडी दे दी. भाजपा संसदीय बोर्ड ने जिस शिबू के पाला बदलने के बाद उनकी सरकार को हटाने का निर्णय लिया था, उस संसदीय बोर्ड का फैसला धरा का धरा रह गया.
बकौल शिबू वे आज भी केंद्र में यूपीए के साथ हैं. केंद्र मंे यूपीए के साथ होने की बात कहने वाली पार्टी के साथ मिलकर राज्य में भाजपा द्वारा सरकार बनाने की हड़बड़ी ही वह अकेली चीज है जो इस बार की सरकार के लिए नई है. ऐसा क्यों, यह सवाल आजकल प्रदेश में अहम बना हुआ है. हर जगह एक ही चर्चा है कि यदि सरकार के लिए इन्हीं दलों का कॉकटेल बनना था तो फिर उस वक्त नौटंकी की जरूरत ही क्या थी! और फिर इस दरम्यान ऐसा क्या हो गया कि जिससे शिकायत थी, उसी से मोहब्बत हो गई.
राज्य के पहले मुख्यमंत्री और झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी कहते हैं, 'छह माह पहले भी इसी गठबंधन की सरकार बनी थी, चार माह तक ही चल सकी. ढाई माह से राष्ट्रपति शासन है. अब फिर वही गठजोड़ सत्ता में है. वह सरकार क्यों गिरी थी और ढाई माह में कैसे सारे मनमुटाव दूर हो गए, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.' मरांडी आगे कहते हैं कि औद्योगिक घरानों ने सरकार बनवाने में कीमत लगाई है, खरीद-फरोख्त की भी राजनीति हुई है. मैं खरीद-फरोख्त की राजनीति नहीं कर सकता था, इसलिए मौका आने पर भी 25 विधायकों के होते हुए भी मैंने सरकार बनाने की पहल नहीं की.
लेकिन राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के विधायक दल की नेता अन्नपूर्णा देवी इस सरकार के गठन के लिए मरांडी को ही कटघरे में खड़ा करती हैं. वे कहती हैं, 'कांग्रेस और झाविमो चाहते तो सरकार पहले ही बन सकती थी. यदि कांग्रेस के नेतृत्व में ही सरकार बन जाती तो क्या हो जाता? वे बाबूलाल पर परोक्ष तरीके से निशाना साधते हुए कहती हैं, ' कहने को तो यहां कुछ साफ-सुथरी छवि वाले नेता भी हैं लेकिन मौका मिलने पर सबका स्वार्थ नजर आने लगता है.'
जाहिर-सी बात है कि इस नए ढांचे को सरकार की बजाय अपने-अपने स्वार्थों और मजबूरियों में जुटी एक भीड़ कह सकते हैं. झारखंड सरकार के एक बड़े अधिकारी कहते हैं, 'चूंकि राष्ट्रपति शासन में काम तेजी से हो रहा था, भ्रष्टाचार पर शिकंजा कसने का सिलसिला शुरू हो चुका था और कई चीजें पटरी पर आने लगी थीं, इसलिए गैरकांग्रेसी दलों में छटपटाहट होना स्वाभाविक था. पूर्व मुख्यमंत्रियों की सुविधा का छिन जाना और विधायकों के फंड के उपयोग पर रोक लग जाना सभी को परेशान कर रहा था. ऐसे में दलगत भावनाओं से परे जाकर हर छटपटाता हुआ विधायक बस किसी तरह, किसी भी सरकार के बनने की बाट जोह रहा था. इसलिए इस बार अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में सरकार बनने में न कोई हंगामा हुआ, न विरोधी गुटों के नेताओं की ओर से ही रटे-रटाए वाक्य दुहराए गए. वरना तीन माह पहले तक झामुमो के नेता भाजपाइयों के खिलाफ आग उगल रहे थे तो भाजपा के नेता झामुमोवालों को पानी पी-पीकर कोस रहे थे.'
झामुमो से राजनीतिक जीवन की शुरुआत करके भाजपा में कद्दावर नेता बनने वाले अर्जुन मुंडा को चालाक नेता और शासक माना जाता है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रघुवर दास को किनारे लगाकर जब से अर्जुन मुंडा ने सरकार बनाने की कमान अपने हाथों में ली थी, तभी से यह तय माना जा रहा था कि सरकार बनेगी. अब यह भी माना जा रहा है कि अर्जुन मुंडा हैं तो वे इस भानुमति के कुनबे को चला भी लेंगे. लेकिन चुनौतियां इतनी हैं कि उनके लिए भी ऐसा करना आसान नहीं होने वाला है. इस अजीबोगरीब गठबंधन के पेंच उन्हें हर समय परेशान करते रहेंगे.
फिलहाल यह सरकार भाजपा के 18, जदयू के दो, झामुमो के 18, आजसू के पांच और दो निर्दलीय विधायकों के गणित से चलने को तैयार है. दूसरी ओर शासन की चुनौतियां सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी हैं. पूरा राज्य सूखे की चपेट में है. केंद्र से पैसा लेकर राहत कार्य सही ढंग से पहुंचवाना बड़ा काम माना जाएगा. राज्य में विकास योजनाओं पर ब्रेक लगा हुआ है. सालाना बजट की चौथाई राशि भी अब तक खर्च नहीं की जा सकी है जबकि वित्तीय वर्ष के छह माह गुजर चुके हैं. पेसा कानून के तहत पंचायत चुनाव करा लेना मुंडा के सामने बड़ी चुनौती है. इन सबके साथ नक्सलवाद शाश्वत समस्या के तौर पर रहेगा ही.
झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन के पुत्र और राज्य के नए उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कहते हैं कि हमारी प्राथमिकता पंचायत चुनाव कराने की ही है, हम इसे अच्छे से कराएंगे. इस सरकार के गठन पर हेमंत कहते हैं कि जनता नहीं चाहती कि एक बार फिर चुनाव का बोझ उसके माथे पर पड़े, इसके लिए सरकार का बनना बहुत जरूरी था. 'हम भाजपा के साथ फिर से सरकार बना रहे हैं तो इस पर बहुत सवाल उठाने की जरूरत नहीं क्योंकि हमारे लिए दोनों राष्ट्रीय दल यानी भाजपा और कांग्रेस एक ही तरह की पार्टी हैं' भाजपा के साथ मिलकर फिर से सरकार बनाने पर सोरेन कहते हैं.
चुनौतियों से निपटना और विकास को गति देना अलग मसला है. झारखंड में फिर से वही बड़ा सवाल सामने है कि बकरे की मां आखिर कब तक खैर मनाएगी. यानी कि सरकार कितने दिन और चलेगी?
सदन में विपक्षी नेता कांग्रेस के विधायक राजेंद्र सिंह कहते हैं कि अभी हम छह माह तक अविश्वास प्रस्ताव पेश नहीं कर सकते लेकिन इन दलों के गठबंधन में ही इतने कलह हैं कि इसका भविष्य बेहतर नहीं कहा जा सकता.
क्या होगा, यह आने वाला समय बताएगा, फिलहाल राज्य अपने स्थापना के दशक वर्ष में आठवें मुख्यमंत्री का आश्वासन सुनने को तैयार है, काम को परखने को तैयार है और बदलाव को देखने के लिए बेताब है
Thursday, June 17, 2010
डोमटोली में रोज लगने वाला एक स्कूल

रांची में कुल 1391 सरकारी प्राथमिक विद्यालय हैं. गली-मुहल्लों में खुले हुये निजी प्राईमरी स्कूलों की संख्या निकाली जाये तो यह आंकड़ा दुगुने के आसपास पहुंचता है. लेकिन शहर के डोमटोली इलाके में चलने वाला एक स्कूल इन सबों से अलग है. इसे न तो सरकार चलाती है और ना ही शिक्षा को उद्योग मानने वाले धनपति. कोई ट्रस्ट और एनजीओ भी नहीं.
टीवी मिस्त्री मो. एजाज कहते हैं- “इसे रोज मज़दूरी करने वाले हमारे जैसे लोग चलाते हैं. ”
करबला चौक के पास डोमटोली में रोज लगने वाला यह स्कूल दिहाड़ी मजदूरी करने वाले अभिभावकों के बच्चों के लिए आशा की किरण है. डोमटोली स्कूल के नाम से पुकारा जाने वाला प्रेरणा सामाजिक विद्यालय कहने को तो स्कूल ही है लेकिन है दूसरे सभी स्कूलों से अलग.
अब स्कूल की हालत को ही लें. भीषण गर्मी में स्कूल की खुली छत पर धूप का एक बड़ा हिस्सा रोके नहीं रूक रहा है. हालांकि इसे रोकने के लिए टाट-टप्पर के साथ ही स्कूल की टूटी-फूटी छत पर किसी ने अपने घर की चादर लाकर भी टांग दी है. बच्चे और उन्हें पढ़ाने वाली शिक्षिकायें पसीने से तरबतर हैं लेकिन कतारबद्ध बद्ध अलग-अलग कक्षाओं में बैठे बच्चे मौसम की मार को जैसे मात दे रहे हों.
ऐसे रखी नींव
तीन साल पहले इस स्कूल की नींव ऐसे लोगों ने रखी, जिनका शिक्षा से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था. रोज-रोज कमाने-खाने वालों के लिये यह दुखद था कि उनके बच्चे आवारा घूमते रहें या बेटियां घरों में चुल्हा-बरतन करती रहें. मजदूरों के बच्चे पढ़-लिख कर क्या करेंगे, जैसे ताने तो थे ही.
इलाके के मजदूरों ने बैठक की और फिर शुरु हुआ तिहाड़ी मजदूरों के सपनों का स्कूल. पहले आपस में ही चंदा किया गया और बच्चों की पढ़ाई का सिलसिला शुरु हुआ. स्कूल खुला टीवी मिस्त्री मोहम्मद एजाज की छत पर, जहां शुरुवात में 10 बच्चे पढ़ने के लिये आये.
एजाज मुस्कराते हुए बताते हैं- “ आज इस स्कूल में 160 बच्चे हैं. इनमें से अधिकांशत: दाई, रिक्शाचालक, मिस्त्री या ऐसे ही छोटे काम करनेवाले लोगों के बच्चे हैं. स्कूल में नर्सरी, केजी, कक्षा एक व दो तक की पढ़ाई सीबीएस ई पैटर्न में होती है.”
शुरुवात में स्कूल चलाने के लिये 10-10 रुपये का चंदा इकट्ठा किया गया था लेकिन बाद में स्कूल के बाहर ही एक दानपेटी लगा दी गई, जिसमें लोग स्वेच्छा से पैसे डालने लगे. हालांकि स्कूल चलाने के लिये पैसों की तंगी हमेशा बनी रहती है लेकिन इलाके के लोग आश्वस्त हैं कि यह तंगी धीरे-धीरे जरुर दूर हो जाएगी.
बुलंद हौसले
स्कूल की शुरुवात करने वाले टीवी मिस्त्री मो. एजाज, बक्सा मिस्त्री मो. इकबाल, बिजली मिस्त्री मो. इरफान, सरस्वती चौरिया, बीएसएनल में कैजुअल बेसिस पर कार्यरत मो. जावेद, राजमिस्त्री शाहिद आलम जैसे लोगों से आप बात करें तो लगता है कि उन्होंने स्कूल चलाने को एक चुनौती की तरह लिया है. जाहिर है, स्कूल चलाने वालों के हौसले अभिभावकों को भी प्रेरित करते ही हैं.
अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने आये मो. आलम कहते हैं- “हमारे बच्चे भी पैसेवालों के बच्चों की तरह कुछ बड़ा काम करें. हालांकि स्कूल के पास फंड की कमी है पर हम आधे पेट खाकर भी इसे बंद नहीं होने देंगे.”
यहां पढऩे के लिए आने वाले बच्चों का उत्साह भी देखते ही बनता है. वे जानते है कि चार पंक्तियों में चार कक्षाएं लगती हैं. ऐसे में वे खुद ही इतने अनुशासित हो गये हैं कि पहली पंक्ति वाले बच्चे दूसरी पंक्ति वाले बच्चे की ओर पीठ करके बैठते है ताकि आवाज ज्यादा न गूंजे और कोई परेशानी न हो.
सबसे अलग
अपनी ही कक्षा के दूसरे साथियों को ब्लैकबोर्ड पर पहाड़े और गिनती का सबक याद कराकर आया एक बच्चा कहता है- “ सरकारी स्कूल से तो यह अच्छा है. कम से कम होमवर्क तो मिलता है. रोज स्कूल न आने पर टीचर की डांट का डर भी रहता है.”
वैसे यह डर स्वाभाविक भी है क्योंकि स्कूल के बाद कभी-कभार स्कूल के टीचर या संचालक बच्चों के घर तक पहुंच जाते हैं. यह देखने कि उनके इस अनोखे स्कूल का विद्यार्थी आखिर कर क्या रहा है !यहां पढ़ने वाले बच्चे सुविधाओं से कहीं अधिक अनुशासनात्मक और गुणात्मक शिक्षा को महत्व देते हैं. ऐसे में इनके सपनों को पूरा करने से कोई नहीं रोक सकता.
12 वर्षीय शगुफ्ता परवीन कक्षा दो में पढ़ती हैं. शगुफ्ता बताती हैं –“ पहले सरकारी स्कूल में मैं पांचवीं की छात्रा थी, पर मैं न एक पंक्ति पढ़ पाती थी न लिख पाती थी. सरकारी स्कूल में जाकर बस बोर्ड से देखकर नकल उतारती थी. पर यहां के बच्चों को अंग्रेजी बोलते देखकर मैंने अपना नामांकन यहां करा लिया और आज मैं भी अंग्रजी में कुछ-कुछ बोल पाती हूं.”
15 वर्षीय कक्षा दो की छात्रा हिना शरमाते हुये बताती हैं- “ मेरे घरवालों ने तो अब तक मेरी शादी कर दी होती, यदि दो साल पहले एजाज सर मेरे घरवालों को समझाकर यहां पढ़ाई के लिये प्रेरित नहीं करते.”
अभिभावक भी मानते हैं कि इस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे दूसरों से अलग हैं. शगुफ्ता के तीन बच्चे सरकारी स्कूल में और तीन इस स्कूल में पढ़ते हैं. वे बताती हैं कि सरकारी स्कूल में हर दिन बच्चों को खाना मिलता है और महीने के सौ रुपये भी लेकिन वे चाहती हैं कि सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले उनके बच्चे भी यहीं पढ़ें. वे कहती हैं- “यहां पढ़नेवाले मेरे बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि और प्रेम है. वे मन लगा कर पढ़ते हैं.”
अभिभावकों की खुशी के दूसरे कारण भी हैं. साजिया और मुन्नी के पिता शराब में डूबे रहते थे, पर स्कूल में शराब से होनेवाले नुकसान के बारे में जानकर बच्चों ने अपने अब्बू से पूछा कि अब्बा अगर आप मर गये तो हम कहां जायेंगे. आप शराब मत पीया कीजिए. और यकीन मानिए कि यह बात उन्हें इस कदर छू गयी कि अब वे उसे हाथ तक नहीं लगाते.
स्कूल की शिक्षिका बेनाडेल्ट मिंज कहती है कि इन बच्चों की आंखों में भी डॉक्टर, इंजीनियर और शिक्षक बनने के सपने तैर रहे हैं. वे दृढ़ता के साथ कहती हैं- “यहां पढ़ने वाले बच्चे सुविधाओं से कहीं अधिक अनुशासनात्मक और गुणात्मक शिक्षा को महत्व देते हैं. ऐसे में इनके सपनों को पूरा करने से कोई नहीं रोक सकता.”
एक औऱ शिक्षिका अंबरी भी मानती हैं कि इस स्कूल के बच्चे बहुत गंभीरता से पढ़ाई कर रहे हैं और उन्हें इस बात का अहसास है कि उन्हें मां-बाप के सपनों को पूरा करना है. ज़ाहिर है, इस बस्ती की प्रार्थनाओं में यह दुआ भी शामिल रहती है कि उपरवाला इस स्कूल को और बुलंदी दे.
Saturday, June 5, 2010
हौसला देता हेसालौंग

एक लड़की है सीमा. झारखंड या देश की अन्य हजारों-लाखों लड़कियों की तरह. बिल्कुल सामान्य-सी लड़की. दैनिक मजदूरी करने वाली हेसालौंग के दलित परिवार से है. झारखंड के हजारीबाग जिले में. दलितों व पिछड़ी जातियों का गांव. झारखंड के सैकड़ों गांवों की तरह. सीमा हेसालौंग गांव की ही है. सीमा की खास बात यह है कि वह दो बार मैट्रिक फेल हुई लेकिन धैर्य बनाये रखा, मेहनत जारी रखी और तीसरी बार में पास कर गयी. अब इंटर में पढ़ रही है. अपने गांव की पहली दलित लड़की बनी, जो मैट्रिक पास हुई.
इलाके में चर्चे हुए. और सीमा के गांव हेसालौंग की चर्चा सिर्फ इसलिए, योंकि वह गांव अन्य सामान्य गांवों से ज्यादा मुश्किलों में है. अगल-बगल में खुले स्पंज आयरन फैट्रियों ने गांव की जमीन को बंजर कर दिया है. पीने का पानी मयस्सर नहीं होता लोगों को तो एक-एक बालटी पानी के लिए या तो एक किलोमीटर दूर चलकर चुआं पर जाते हैं या इकलौते चापाकल पर गर्मी की रातों में आठ-आठ घंटे लाइन में लगे रहते हैं. सीमा से यह पूछने पर कि तुमने तो इतिहास रच दिया. वह तुरंत अपने घर के बगल में एक छोटे से भवन की ओर इशारा करते हुए कहती है. इतिहास मैं क्या रचती, मेहनत-मजदूरी से फुर्सत कहां है, सब उसने करवा दिया. उस भवन ने. सीमा जिस भवन की ओर इशारा किया, वही एक चीज इस गांव में है, जो तमाम मुश्किल हालातों, चुनौतियों व परेशानियों के बावजूद हेसालौंग को एक ऐसे गांव के रूप में स्थापित करता है, जिसकी मिसाल देश भर में कहीं दी जा सकती है.
वह जिस भवन की ओर इशारा की वह पंचायत का सामुदायिक भवन है, जिसके बाहर दीवार पर आड़े-तीरछे शब्दों में लिखा हुआ है- मुंशी प्रेमचंद पुस्तकालय. पुस्तकालय के नाम पर चंद किताबें, एक टेबल, जिस पर सजाने-संवारने के लिए फटी-पुरानी धोती बिछी हुई है और कुछ बोरे, जिस पर बैठकर पढ़ाई होती है. किताबों के नाम पर अधिकतर टैस्ट कि किताबें, प्रेमचंद का मानसरोवर, कुछ उपन्यास, कुछ साहित्यिक पत्रिकाएं और कुछेक बच्चों की किताबें. संसाधन भले ही कुछ न हो लेकिन इस लाइब्रेरी ने इलाके की तसवीर और तकदीर, दोनों बदल दी है.अभी झारखंड में मैट्रिक और इंटर की परीक्षा ली जा रही है. इस परीक्षा के पहले इस लाइब्रेरी में गांव के चंद युवाओं ने कई-कई बार प्रैटिस टेस्ट लेकर उनमें इतना आत्मविश्वास भर दिया है कि कोई सेेकंड डिविजन की बात नहीं करता. गांव के चंद पढ़े-लिखे नौजवान खुद से अध्ययन कर परीक्षा का मॉडल प्रश्न पत्र तैयार करते हैं. निर्धारित समय में टेस्ट लेते हैं और फिर परीक्षा परिणाम भी जारी करते हैं. पिछले पांच सालों से यही सिलसिला चल रहा है और अब नतीजा यह है कि इस एक गंवई लाइब्रेरी के टेस्ट में शामिल होने के लिए उस इलाके के परीक्षार्थी वाहन रिजर्व कर निर्धारित तिथि पर पहुंचते हैं. सरस्वती विद्या मंदिर और डीएवी जैसे स्कूलों के छात्र भी, जो उस इलाके का सबसे प्रतिष्ठित स्कूलों में है.
उसी लाइब्रेरी में मिली ममता, प्रभा, सीता, दीपिका जो इस बार इंटर की परीक्षा दे रही हैं. उनसे यह पूछने पर कि सामने परीक्षा है तो तनाव है कि नहीं. सबका जवाब प्राय: एक सा- काहे का टेंशन, साल भर यहां आकर पढ़ते हैं, जमकर टेस्ट देते हैं, तो टेंशन या? जिस दिन मैं वहां पहुंची, वहां कुछ लड़कियां डीबेट में भाग लेने आयी थी तो कुछेक को संगीत लास करना था. कुछ विज प्रतियोगिता में हिस्सा लेती, कुछेक को राइटिंग प्रतियोगिता में बाजी मारने की हड़बड़ी थी और शाम को सबको कराटे और स्पोकेन इंग्लिश लास जरूरी करना था. इतना सब कुछ उस एक छोटे से भवन में होता है. और एक खास बात यह कि यह लाइब्रेरी न तो किसी एनजीओ या ट्रस्ट का है और न ही किसी कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी की मेहरबानी की उपज. बस पांच साल पहले गांव के ही लालदीप, मनोज, कैलाश, मंतोष, नवीन, कृष्णा आदि चंद नौजवानों ने गांव में चंदा शुरू किया. 667 रुपये जमा हुए, 500 की किताबें आयी, 167 में मुंशी प्रेमचंद की जयंती मनी और लाइब्रेरी शुरू. अब उस गांव का सबसे बड़ा सालाना आयोजन मुंशी प्रेमचंद जयंती ही है और चंदा तीन हजार के करीब हो जाता है. और हां, यह जान लेना भी जरूरी है, यहां सारी गतिविधियां नि:शुल्क है. कोई शुल्क नहीं, बल्कि यदि कोई विद्यार्थी अपने घर किताब ले गया और समय पर वापस नहीं कर सका तो अगले दिन कपिल उसके घर पहुंचकर कहता है-कितबवा लौटा दो, दूसरे को भी चाहिए होगा...इस लाइब्रेरी की देखरेख अब कपिल ही करता है. कपिल इसी लाइब्रेरी के सौजन्य से मैट्रिक की परीक्षा तो पास कर गया लेकिन आर्थिक तंगी के कारण फिलहाल उसकी आगे की पढ़ाई बंद है.
उस लाइब्रेरी में चलने वाली इन गतिविधियों के संचालन के बारे में जानना भी दिलचस्प है. कैलाश खुद इंटर पास हैं. अंग्रेजी स्कूल में पढ़े हैं, अंग्रेजी बोल लेते हैं तो वे गांव के छात्र-छात्राओं को हर शाम अंग्रेजी बोलना सिखाते हैं. कृष्णा मनोविज्ञान से स्नातक कर शिक्षक बन गये हैं. दिनभर सरकारी स्कूल में पढ़ाकर आते हैं तो शाम को लाइब्रेरी में बैठकर खुद पढ़ते हैं ताकि मॉडल टेस्ट पेपर तैयार किया जा सके. कृष्णा के साथ पारा शिक्षक नवीन पांडेय, मंतोष कुमार होते हैं. उसी गांव के एक नौजवान अरविंद हैं जो कराटे में ब्लैक बेल्ट धारी हैं. अरविंद गांव के 45 लड़के-लड़कियों को कराटे सीखाते हैं. और इसकी बुनियाद रखनेवालों में प्रमुख लालदीप गोप, जो नागपुर में विज्ञान अनुसंधान सहायक हैं, जब घर आते हैं तो लगातार कैरियर काउंसेलिंग का दौर चलता है.
मुफलिसी में विरासत बचाने की कोशिश

अनुपमा
जेठ बैसाख मासे-2
ए मन तोयें उदासे-2
ए भाई, जने देखूं तने दिसे
लहलह पात कहूं, केके कहूं बात
कहूं केके कहूं बात..
पूरे लय, छंद और ताल के साथ कालीशंकर जब कानों पर हाथ रखकर इस गीत को गाकर सुनाते हैं तो गाते-गाते वे खुद रुआंसे से हो जाते हैं. लेकिन इस गीत में रचे-बसे दुख की गहराई का सही अंदाजा तब लगता है जब वे शर्ट-पैंट उतारकर धोती पहनते हैं और इसे टूहिला पर सुनाते हैं. बांस की फट्टी के एक छोर पर कद्दू या लौकी का आधा खोखला हिस्सा (तुंबा), दूसरी ओर सिर्फ धागे को थोड़ी ऊंचाई से बांधने के लिए एक लकड़ी की हुक और काले बांस में छेदकर 4-5 जगह बांधे गए रेशम के धागे, यही है टूहिला का स्वरूप. धागों को कसकर, स्वर की परख करने के बाद कालीशंकर दादा ने टूहिला सीने से लगाया और इसे बजाते हुए गीत शुरू किया. गाते-गाते वे कब रोने लगे, पता ही नहीं चला. जितने गाढ़े दुख से रंगा यह गीत है, उतनी ही मार्मिक इसकी धुन. गीत खत्म हुआ तो कालीशंकर दो-चार मिनट तक ध्यान मुद्रा में वैसे ही खड़े रहे. पूरे माहौल में एक गहरी उदासी और सन्नाटा. आखिर इस गीत में ऐसा क्या है जो गाने और सुनने वाले को इतना विह्वल कर देता है?
काली दा पहले तो गीत का अर्थ बताते हैं, फिर कहते हैं, ‘यह जो टूहिला है न, यह दुख, विरह, वेदना के स्वर को बढ़ा देता है. इस वाद्य यंत्र को सीने से लगाकर बजाते हैं, नंगे बदन.’ दरअसल, यह आदि वाद्य यंत्र है, लौह युगीन सभ्यता से भी पहले का. तब का जब मानव मन में सांस्कृतिक चेतना जगनी शुरू ही हुई थी. चूंकि वाद्य यंत्रों का कोई लिखित इतिहास नहीं है इसलिए इसकी प्रामाणिकता नहीं पेश की जा सकती. परंतु एक लोकगीत में इस बात का भी जिक्र है कि आदिवासी समाज के नायक और महान स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा भी टूहिला बहुत बढ़िया बजाया करते थे. एक और विशेष बात. बदलते समय के साथ सारे वाद्य यंत्र बदल गये पर टूहिला अब तक नहीं बदला है. दादा एक गहरी सांस लेते हुए अफसोस के साथ कहते हैं, ‘अब क्या बदलाव होगा इसमें? अब तो यह अपने आखिरी दौर में है. अब इसे बजाएगा कौन? मैं अपने बेटे तक को तो शागिर्द नहीं बना सका.’
उनका बेटा टूहिला नहीं बजाता, ड्राइवरी करता है. मन में सवाल उठता है कि झारखंड में तो इतने गायक और वादक हैं, फिर किसी में इस वाद्य यंत्र को सीखने की ललक क्यों नहीं होती? कालीशंकर कहते हैं, ‘एक कारण इसकी बनावट हो सकती है. इसे बजाने के लिए अन्य वाद्य यंत्रों से ज्यादा रियाज की जरूरत है. पर इसमें जितनी अधिक मेहनत है, उससे उलट नाम और दाम. यानी कीमत नहीं मिलती इसे बजाने से. लोग भूल चुके हैं इसे.’
कालीशंकर सारंगी और बांसुरी बजाने में भी दक्ष हैं. कोलकाता, दिल्ली, चेन्नई जैसे कई शहरों और अमेरिका में भी जाकर वे अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं. लेकिन आज भी जो संतोष उन्हें टूहिला बजाकर मिलता है वह कहीं नहीं मिलता. रोज खेत से लौटकर, चाहे कितने भी थके क्यों न हों, टूहिला पर हाथ फेर ही लेते हैं. वे कहते हैं, ‘मेरा मन तो बस टूहिला में ही बसता है. मैं चाहता हूं यह बचा रहे, सदा बजता रहे. कोई तो आए. मैं सिखाने को तैयार हूं. मुझे कुछ नहीं चाहिए इसके बदले में.’
कालीशंकर के गुरु उनके पिता श्री द्रीपनाथ महली उम्दा कलाकार और आकाशवाणी के स्थायी गायक-वादक थे. कालीशंकर टूहिला के इकलौते प्रोफेशनल वादक हैं. जैसे टूहिला अब विलुप्तप्राय है, वैसे ही इसके बजाने वालों में भी संभवत: आखिरी कलाकार बचे हैं कालीशंकर. रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय व क्षेत्रीय भाषा विभाग के प्राध्यापक व वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी गिरधारी राम गौंझू कहते हैं, ‘संगीत अकादमी के कोलकाता के कार्यक्रम में जब काली ने इसका प्रदर्शन किया था तो विशेषज्ञों ने कहा कि झारखंड को विशिष्टता प्रदान करने वाला यह अकेला वाद्य यंत्र है और इसे पुनजीर्वित करने की जरूरत है.’ 2005 से कला एवं संस्कृति विभाग ने जनजातीय वाद्य यंत्रों को प्रोत्साहन देने के लिए स्कीम भी चलाई कि टूहिला सीखने और सिखाने वालों को प्रोत्साहन राशि मिलेगी. फिर भी यह उपेक्षित है. लोक की यह खासियत होती है कि वह हमेशा सामूहिकता का बोध कराता है. सुख की घड़ी हो या दुख की, हर क्षण समूह बोध सामने होता है. ऐसे में लोक जगत में एकाकी जीवन की परिकल्पना, यह इसके संगीत की नई बात थी. मशहूर गायक मुकुंद नायक कहते हैं, ‘यह प्रकृति और मानव मन से जुड़ा हुआ विरह का स्वर है. उसी मन को शांत करने के लिए आदिपुरुषों ने शायद सबसे पहले टूहिला को लौकी, बांस और धागे से बनाया होगा.’
काली के घर से निकलते समय मन में सवाल उठता है, तो क्या आदिपुरुषों का आदि वाद्य यंत्र, मनुष्य की सांस्कृतिक विरासत की पहली धरोहरों व आविष्कारों में से एक, टूहिला वाकई अपने आखिरी दौर में है? प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी एवं आदिवासी मामलों के जानकार डा. रामदयाल मुंडा कहते हैं, ‘टूहिला के लिए संदर्भ खड़ा करना होगा. इसे रीवाइव किए जाने की जरूरत है. इस वाद्य यंत्र का नाजुक पक्ष यह है कि इसे खुले बदन में ही बजाया जाता है. इसमें शरीर रेजोनेंस का काम करता है. इसकी वादन शैली काफी पेचीदा है. यदि इसे बचाना है तो इसमें कुछ बदलाव करना होगा. लौकी, रेशम के स्टिंग का विकल्प ढूंढ़ना होगा. यह एकांत में बजाया जाता है, समूह में नहीं. आवाज इतनी मृदु है कि वह अन्य वाद्य यंत्रों में खो-सी जाती है और यह केवल दुख में बजता है. इसमें सौंदर्य बोध डाल दिया जाए या एंप्लिफाई कर दिया जाए तो इसे बचाया जा सकता है.’ लेकिन काली उनकी बातों से इत्तेफाक नहीं रखते. वे कहते हैं, ‘ऐसा कभी भी नहीं होना चाहिए. कुछ चीजों को शाश्वत रूप में ही रहने देना चाहिए. यदि बदलाव किए गए तो मौलिकता नष्ट हो जाएगी. इसकी पहचान ही खत्म हो जाएगी.’ और एक आखिरी बात. कालीशंकर रांची में ही रहते हैं. उसी के निकट, जहां राष्ट्रीय खेलों के आयोजन के लिए खेलगांव बना है, जहां झारखंड का पहला विशाल कला भवन बना है. लेकिन वे रांची में रहकर भी रांची में नहीं रहते. न किसी गांव में, न बस्ती-मोहल्ले में. उन्होंने बस्ती से दूर अकेले खेत में अपने सहिया के साथ खपरैल घर बना लिया हैं. वहीं काली का पूरा परिवार रहता है. मन में प्रश्न उठता है, क्या उनका यह एकाकी जीवन भी टूहिला का ही प्रभाव है?
Tuesday, May 11, 2010
मैं बच्ची नहीं थी मां और न ही अनपढ़-गंवार ...

निरुपमा पाठक का ख़त, मां सुधा पाठक के नाम…
पत्र शैली में निरुपमा हत्याकांड से जुड़े पहलुओं को समझने की कोशिश
मेरी प्यारी मां,
तुझे बहुत-बहुत-बहुत सारा प्यार!
मां, परसों मदर्स डे था न। मुझे यहां स्वर्गलोक में जरा भी अच्छा नहीं लग रहा था मां। सोचा क्यों न पापा की चिट्ठी का जवाब लिखूं, जो दुनिया से विदा होने के पहले उन्होंने मुझे लिखी थी। लेकिन तू तो जानती है न मां कि मैं पापा से ज्यादा बातें नहीं कह पाती। जो कहना होता है, तुमसे ही कहती हूं। तो मदर्स डे के दिन अपने अजन्मे बच्चे के साथ दिन भर यूं ही तुझे याद करती रही और कुछ-कुछ लिखने की कोशिश करती रही।
मां, मुझे अच्छा नहीं लग रहा कि तू मेरे कारण परेशान है और फजीहत झेल रही है लेकिन मैं अब कुछ कर भी तो नहीं सकती न! बहुत दूर हूं मां। अगर करने की स्थिति में होती, तो तुम्हें कष्ट न होने देती। ऐसे भी तुझे पता है न कि मैं अपनी मां पर जान छिड़कती हूं, उसे कितना प्यार करती हूं, यह शब्दों में बयां नहीं कर सकती। तू ही बता न कि अगर मैं मां-पापा से प्यार न करती और भरोसे का कत्ल करना चाहती तो क्यों सिर्फ यह पूछने के लिए दिल्ली से कोडरमा जाती कि क्या मैं प्रिभयांशु से शादी करूं। मां उसके साथ पति-पत्नी के रिश्ते के बीच जितने भी तरह के भाव होते हैं, उन सभी भावों से तो गुजर ही चुकी थी न, सिर्फ एक सामाजिक मान्यता मिलनी बाकी थी।
मां, प्रिभयांशु के साथ मैं एक दोस्त या प्रेमिका की तरह नहीं बल्िक हमसफर की तरह ही रह रही थी। और फिर मुझे आपलोगों के भरोसे का कत्ल करना होता तो मैं अपनी अन्य सहेलियों की तरह कोर्ट में शादी करने के बाद बताती कि मैंने शादी कर ली। तब आपलोगों की मजबूरी होती मां कि अपनी सहमति की मुहर लगाएं। लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। मैं दो वर्षों के प्यार पर जीवन देने वाली मां और पालन करने वाले पिता के प्यार को हल्का नहीं करना चाहती थी। उसका मान कम नहीं करना चाहती थी।
यह भरोसा था मुझे मां कि जब आपलोगों ने झुमरीतिलैया से मुझे पढ़ाई करने के लिए दिल्ली भेजा है, अखबारी दुनिया में नौकरी करने की छूट दी है तो फिर अपने तरीके से, अपनी पसंद के लड़के के साथ जिंदगी भी गुजारने देंगे। मैं कानूनन सब करने में सक्षम थी मां, लेकिन मैं कानून से ज्यादा आपलोगों की कद्र करती थी। आपलोगों पर भरोसा करती थी। इसलिए सहमति की मुहर लगाने कोडरमा पहुंची थी। और सुनो न मां, अब तो दो-दो जिंदगियां बरबाद हो ही चुकी हैं। मैं और मेरी संतान ने दुनिया से अलग कर लिया है खुद को। अब प्रियभांशु को भी बरबाद करने के लिए दांव-पेंच क्यों चले जा रहे हैं मां।
मां, क्या मैं बेवकूफ थी, जो मुझे पता नहीं चल सका था कि मेरे गर्भ में उसका बच्चा पल रहा है? मैं अबॉर्शन करा सकती थी न, लेकिन मैंने नहीं करवाया। मैं और कई उपाय भी अपना सकती थी लेकिन नहीं अपनाये। इसलिए कि मैं प्रिभयांशु को मन से चाहती थी, तो तन देने में भी नहीं हिचकी। मां उसने कोई बलात्कार नहीं किया और न ही संबंध बनाने के बाद मुझे बंधक बनाकर रखा कि नहीं तुझे बच्चे को जन्म देना ही होगा। यह सब मेरी सहमति से ही हुआ होगा न मां, तो उसे क्यों फंसाने पर आमादा है पुलिस। जरा इस बात पर भी सोचना तुम।
हां मां, अब यहां स्वर्गलोक में आ चुकी हूं तो यहां कोई भागदौड़ नहीं। फुर्सत ही फुर्सत है। ऐसी फुर्सत कि वक्त काटे नहीं कट रहा। धरती की तरह जीवन की बहुरंगी झलक नहीं है यहां, जीवन एकाकी और एकरस है। लिखने की आदत भी पड़ गयी है, तो सोच रही हूं कि आज पापा के उस आखिरी खत का जवाब भी दे दूं। पापा से कहना वो मेरे जवाब को मेरी हिमाकत न समझें बल्िक एक विनम्र निवेदन समझेंगे।
उन्होंने अपने पत्र में सनातन धर्म का हवाला दिया है। अब यहां स्वर्गलोक में जब फुर्सत है तो सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों से भी परिचित हो रही हूं। सनातन धर्म के बारे में पापा शायद ज्यादा जानते होंगे मां लेकिन मैं अब सोच रही हूं कि मैंने भी तो उसी धर्म के अनुरूप ही काम किया न। मां, सनातन धर्म ने तो प्रेम पर कभी पाबंदी नहीं लगायी और न ही जातीय बंधन इसमें कभी हावी रहा। देखो ना मां, कृष्ण की ही बात कर करो। जगतपालक विष्णु के अवतार कृष्ण। प्रेम की ऐसी प्रतिमूर्ति बने कि रुक्िमणी को भूल लोग उन्हें राधा के संग ही पूजने लगे। घर-घर में तो पूजते हैं लोग राधा-कृष्ण को। फिर राधा-कृष्ण की तरह रहने की छूट क्यों नहीं देते अपनी बेटियों को? क्या राधा-कृष्ण सिर्फ पूजे जाने के लिए हैं? जीवन में उतारे जाने के लिए नहीं? और यदि जीवन में जो चीजें नहीं उतारी जा सकतीं, उसे वर्जना के दायरे में रखा जाना चाहिए न मां। मां अपने कोडरमा वाले घर में भी राधा-कृष्ण की तस्वीर है, हटा देना उसे सदा-सदा के लिए।
हां मां, पापा से कहना कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की तस्वीर भी फेंक दें, वह भी सनातन धर्म की कसौटी पर पूजे जाने लायक नहीं हैं। याद हैं मां, बचपन से एक भजन मैं सुना करती थी – बाग में जो गयी थी जनक नंदिनी, चारों अंखियां लड़ी की लड़ी रह गयीं। राम देखे सिया और सिया राम को। चारों अंखियां लड़ी की लड़ी रह गयीं… फिर भाव समझाते थे प्रवचनी बाबा कि शिवधनुष तोड़ने से पहले का नजारा है यह। सीता जी फूल तोड़ने बाग में गयी थीं, राम से नैन लड़े तो दोनों एक दूसरे पर मोहित हो गये। जानती हो मां, इस भजन को याद आने के बाद मैं यह सोच रही हूं कि राम ने भी तो अपने पिता की मर्जी से सीता से शादी की नहीं थी। वह तो गये थे अपने गुरू के साथ ताड़का से रक्षा के लिए लेकिन जब नजरें सीता से मिलीं तो चले गये शिवधनुष तोड़ने। क्या राम को यह नहीं पता था कि धनुष तोड़ने का मतलब होगा शादी कर लेना। फिर क्यों नहीं एक बार उन्होंने अपने पिता दशरथ से यह अनुमति ली। दशरथ को तो बाद में पता चला न मां कि जनक की बेटी से उनका बेटा शादी करने जा रहा है। तो मां, क्या गुरु के जानने से काम चल जाता है। मेरे भी गुरू तो जानते ही थे न। दिल्ली में रहनेवाले सभी गुरु और मित्र इस बात के जानते थे कि मैं प्रिभयांशु से शादी करने जा रही हूं। फिर भी मैंने गुरु के बजाय आपलोगों की सहमति लेना जरूरी समझा। राम की तस्वीर हटा देना मां उन्होंने भी अपने पिता से पूछे बिना अपना ब्याह तय कर लिया था।
मां, पिताजी को माता कुंती की भी याद दिलाना न। सनातनी कुंती की। उन्हें तो कोई कभी कुल्टा नहीं कहता। उन्हें आदर्श क्यों माना जाता है जबकि उन्होंने छह पुत्रों का जन्म पांच अलग-अलग पुरुषों से संबंध बनाकर दिया। और मां कर्ण वह तो विवाह से पहले ही उनके गर्भ से आये थे न। यह तो सनातनी पौराणिक इतिहास ही कहता है न मां। फिर कुंती को कुल्टा क्यों नहीं कहते पापा। पापा की कसौटी पर तो तो वह चरित्रहीन ही कही जानी चाहिए।
और द्रौपदी, मां। कोई द्रौपदी को दोष क्यों नहीं देता। अच्छा जरा ये बताओ तो मां कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, कोई एक स्त्री पांच-पांच पुरुषों के साथ कैसे रह सकती है। लेकिन वो रहती थी और उसे कोई दोष नहीं देता। पापा को कहना कि वह द्रौपदी को भी अच्छी औरतों की श्रेणी में न रखा करें। एक बात कहूं मां, पापा ने शुरुआती दिनों में ही एक गलती कर दी थी। मुझे धर्म प्रवचन की बातें बताकर। उन्होंने ही एक बार बताया था कि इस जगत में ब्रह्मा की पूजा क्यों नहीं होती क्योंकि ब्रह्मा ने अपनी ही मानस पुत्री से शादी कर ली थी। छि: कितने गंदे थे न ब्रह्मा।
और मां, रामचंद्र के वंशजों में तो किसी की तस्वीर घर में नहीं रखना, क्योंकि तुम्हें भी तो पापा ने बताया ही होगा कि धर्म अध्यात्म और सनातनी इतिहास के क्रम में भागीरथी कैसे दुनिया में आये थे। दो महिलाओं के आपसी संबंध से उत्पन्न हुए थे न मां वो। यानी लेस्बियनिज्म की देन थे। बताओ तो सही, भला नैतिक रूप से कहां आये थे वो? मैं भी गंदी थी मां। अनैतिक। इन लोगों की तरह ही अनैतिक। मैं कुतर्क नहीं कर रही और न ही अपने पक्ष में कोई दलील ही दे रही हूं मां। यह सब मन में बातें आयीं तो सोचा तुमसे कह दूं। खैर, एक बात कहूं मां, मुझसे तू चाहे जिंदगी भर नफरत करना, घृणा करना, लेकिन अब छोड़ दो न प्रिभयांशु को। उसने कुछ नहीं किया जबरदस्ती मेरे साथ। मैं बच्ची नहीं थी मां और न ही अनपढ़-गंवार थी। सब मेरी रजामंदी से ही हुआ होगा न मां।
और हां मां, मुझे फिर से धरती पर भेजने की तैयारी चल रही है। मेरे बच्चे को भी फिर से दुनिया में भेजा जाएगा। मैंने तो सोच लिया है कि इस बार अपने नाम के आगे पीछे कोई टाइटल नहीं लगाऊंगी। सीधे-सीधे नाम लिखूंगी। कोई पाठक, तिवारी, यादव, सिंह नहीं। सीधे-सीधे सिर्फ नाम। जैसे कि दशरथ, राम, कृष्ण… इन सबकी तरह। इनके नामों के साथ कहां लिखा हुआ मिलता है कि दशरथ सिंह, राम सिंह, कृष्ण यादव। मां मैं फिर आ रही हूं। इस बार फिर प्यार करुंगी। अपने तरीके से जीने की कोशिश करुंगी। फिर मारी जाऊंगी तो भी परवाह नहीं। पर एक ख्वाहिश है मां, ईश्वर से मेरे लिए दुआ मांगना कि इस बार किसी अनपढ़ के यहां जन्म लूं… जो ज्यादा ज्ञान रखता हो। जो सनातनी हो लेकिन व्यावहारिक सनातनी, सैद्धांतिक नहीं। जो कम से कम अपने संतान को अपने तरीके से जीने की आजादी दे।
बस मां! अभी इतना ही । शेष फिर कभी। तुम अपना ख्याल रखना मां और पापा का भी। भाई-मामा को प्रणाम कहना। जल्दी ही मिलती हूं मां। नाम बदला हो सकता है लेकिन तू गौर करती रहना… तुम मुझे पहचान ही लोगी।
तुम्हारी बेटी
निरुपमा
Monday, May 3, 2010
कला जगत की कलाबाजियों से दूर

अनुपमा
कला जगत की कलाबाजियों से उनका दूर-दूर तक का रिश्ता नहीं। न बाजार के दांव-पेंच से ज्यादा वास्ता है। शायद इसीलिए रेशमा दत्ता का नाम आज फाइन आर्ट्स की दुनिया में एक अनचीन्हा नाम है। पर इनकी सधी हुई उंगलियां मिट्टी में जान फूंक देती हैं। झारखंड के घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्र में रेशमा अकेले दम पर जो काम कर रही हैं, वह कलाबाजियों और बाजार से बहुत आगे की चीज है। 60 घरेलू महिलाओं को कलाकार बनाकर, आत्मनिर्भर बनाकर खामोश क्रांति कर रहीं रेशमा का सूत्र वाक्य है – आप अपना काम करो, जहां हो, वहीं कुछ सार्थक करो, देश-दुनिया बदलने के चक्कर में अपने गांव-मोहल्ले में भी काम करने का अवसर क्यों गंवाना
रेशमा की कहानी
दोपहर के एक बजे का समय है। झारखंड की राजधानी रांची से करीब 50 किलोमीटर की दूरी तय कर हम बुंडू पहुंचे हैं। वहां हमने एक युवक से पूछा – रेशमा दत्ता जी का घर किधर है? थोड़ी देर सोचकर वह पूछता है – कौन रेशमा दत्ता?
अच्छा वो रेशमा दीदी। जो मिट्टी वाला काम करती हैं। इस तरह रेशमा के घर पहुंचने से पहले ही यह पता चल जाता है कि यहां के बड़े-बूढ़े-नौजवान, सब उसे मिट्टी वाली दीदी के नाम से ही जानते हैं।
इसके बाद हमें रेशमा के घर तक पहुंचा दिया जाता है। घर के नाम पर हमारा सामना सबसे पहले एक बेडौल पुराने फाटक और ढही हुई चाहरदीवारी से होता है। देखकर मन में एक शंका भी होती है कि यह किसी कलाकार का आशियाना तो नहीं लगता! लेकिन अंदर घुसते ही बाहर से वीरान दिखनेवाला यह खंडहर कला की जन्नत-सा लगने लगता है। बड़े से बाग में जगह-जगह लगी हुईं टेराकोटा की कलाकृतियां, पत्थर की मूर्तियां, मोटरसाइकिल के टूटे हुए सायलेंसर, रिंग और अन्य चीजों से बनी मानव आकृति, तरह-तरह के फूल-फल, बगल में एक बड़ा तालाब और उन सबके बीच एक छोटा सा घर। उस घर के बाहर की दीवारों पर टेराकोटा की नक्काशी, बरामदे में रखी हुई मिट्टी की मूर्तियां। घर और कैंपस का हर कोना कला का परिचय देता हुआ दिखता है। कहीं टेराकोटा, डोकरा, एपलिक तो कहीं सीरामिक की कलाकृतियां चारों ओर करीने से सजी हुई हैं।
यकीनन, कैंपस में पहुंचते ही हम यह भूल जाते हैं कि हम उस बुंडू में हैं, जो पिछले कई वर्षों से गुंडागर्दी, अपराध और नक्सली गतिविधियों के कारण दहशत का पर्याय बन गया है। पिछले कुछ वर्षों में यहां ऐसी घटनाएं घटी हैं, जिसे सोचकर ही सिहरन पैदा हो जाती है। मसलन, दो वर्ष पूर्व एक स्कूल के कार्यक्रम में जदयू विधायक रमेश सिंह मुंडा को सरेआम गोलियों से भून दिया जाना, कुछ माह पूर्व इंस्पेक्टर फ्रांसिस इंदवार को अगवा कर मौत के घाट उतार दिया जाना आदि। यह दो घटनाएं तो राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रही। लूट-अपराध की छोटी-छोटी कई घटनाएं तो रोज ही घटती हैं। बुंडू की पहचान भी अब इन्हीं घटनाओं से जोड़कर होती है। लेकिन रेशमा के कैंपस में ये सारे सवाल, सारे खौफ धरे के धरे रह जाते हैं। वहां पहुंचते ही एक गोरी-सी आम दिखने वाली लड़की, मिट्टियों के ढ़ेर के बीच सामने होती है। जींस और बांह तक चढ़ाये हुए स्वेटर में। मैं यह पूछने की बजाय कि क्या आप रेशमा हैं, सीधे यही पूछ देती हूं – मिट्टी से इतना लगाव…!
रेशमा भी बिना औपचारिक हुए तुरंत बोलती हैं – तो मिट्टी के बिना जीवन भी कहां है? मैं तो मिट्टी में ही जीती हूं, मिट्टी के साथ ही जीना चाहती हूं। यह मिट्टी बहुत कुछ दे सकती है, सब कुछ दे सकती है।
अदभुत तरीके का व्यक्ितत्व देख रेशमा के बारे में अधिक से अधिक जल्दी से जल्दी जान लेने की इच्छा है लेकिन वह बताना शुरू करती हैं – कि अभी उनके साथ 60 महिलाएं काम कर रही हैं। सब यहीं की हैं। आसपास के गांव की। बिल्कुल घरेलू महिलाएं। यहां आने से पहले कोई कलाकार नहीं थीं। 25 वर्ष की पोलियोग्रस्त देवंती से लेकर 80 साल की मीनू तक। ऐसा भी नहीं कि यहां आनेवाली महिलाएं कुम्हार के घर से ताल्लुक रखती हों और कुछ जन्मजात हुनर उनके पास हो। लेकिन एक महीने की ट्रेनिंग के बाद वे सब अपने आप में स्वतंत्र कलाकार हैं। रेशमा के वर्कशाप में हमारी मुलाकात रूबी से होती है जो एक सधे हुए प्रोफेशनल कलाकार की तरह हमसे बात करती हैं और कहती हैं – अब हम कहीं भी एग्जिविशन लगा सकते हैं, अकेले जा सकते हैं, ऑर्डर लेकर माल सप्लाई कर सकते हैं। वैसे आत्मविश्वास से लबरेज पुष्पा, सुधा और बाकी अन्य भी हैं। घर की देहरी तक यह आत्मविश्वास का आना, रेशमा के त्याग और उन सबमें अपने को खपा देने का ही परिणाम है।
शांति निकेतन से फाइन आर्ट्रस में बैचलर की डिग्री, महाराजा सेगीराव से मास्टर की डिग्री व जापान से फेलोशिप करने के बाद रेशमा लौटकर सीधे अपने गांव बुंडू पहुंची थीं। इन उम्दा जगहों पर प्रशिक्षण लेने के बाद रेशमा के सामने कई विकल्प थे। वह कहीं भी जा सकती थीं। घर की आर्थिक हालत भी ऐसी थी कि इन्हें कहीं बाहर रहकर अपना काम करने में आर्थिक परेशानी नहीं आती लेकिन रेशमा ने अपने काम के लिए चुना तो अपने दादा की उस पुरानी लाह फैक्ट्री के खंडहर मकान को, जो एक तरीके से भूत बंगला ही हो चुका था। रेशमा ने वहां अपने दो साथियों शुचि स्मितो व बहादुर के साथ काम करना शुरू किया। शुरू में गांव की दस महिलाओं के साथ पास के ही खेत से मिट्टी लाकर काम शुरू किया और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाया – आधार। आधार आज कॉपरेटिव के रूप में काम कर रहा है।
रेशमा शुरुआती दिनों को याद कर रूआंसी हो जाती हैं और कहती हैं कि उस वक्त सिर्फ बैठकर रोने का मन करता था। चारों ओर विरानगी ही विरानगी। काम करो तो उसका कोई रिस्पांस नहीं। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। आर्थिक तंगी और काम को तवज्जो न मिलने के कारण दो साथी वापस चले गये। पर रेशमा अकेले डटी रही।
मेहनत धीरे-धीरे रंग लायी। महिलाओं की संख्या 10 से 20, 20 से 40 हुई, जो अब 60 है। यह वही महिलाएं हैं, जिनकी सीमा घर की देहरी के अंदर सिर्फ चूल्हा-चौका तक थी। लेकिन अब ये अहमदाबाद, रांची, दिल्ली जाकर एग्जिविशन लगाती हैं। खास यह कि इनमें से अधिकांश अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति की महिलाएं हैं। ये महिलाएं दिन के 11 बजे तक अपने घर का सारा काम निपटाकर यहां पहुंचती हैं और शाम पांच बजे तक फिर घर वापस चली जाती हैं। इनमें से कई तो दो से ढाई हजार रुपये मासिक वेतन पर काम करती हैं और कुछ को काम के आधार पर पैसा मिलता है। खास बात यह कि यहां काम करने वाली एक महिला अंधी भी हैं। रेशमा ने इन महिलाओं के काम को झारक्राफ्ट (झारखंड राज्य का आर्ट एंड कल्चर शो रूम) से जोड़ दिया है, वहीं के ऑर्डर पर ये माल तैयार कर पहुंचाती हैं।
रांची झारक्राफ्ट के शो रूम में पहुंचिए तो बुंडू वाला टेराकोटा एक ब्रांड की तरह स्थापित हो चुका है। अब सिरामिक और डोकरा आर्ट का काम भी महिलाएं करने लगी हैं। रेशमा डोकरा और टेराकोटा का फ्यूजन कर नया प्रयोग कर रही हैं। रेशमा चाहती हैं कि ये महिलाएं इसे खुद चलाएं और खुद इसे आगे बढ़ाएं। वे इससे होनेवाले लाभ को उसके विकास में लगाती हैं और खुद के खर्चे के लिए इंटेरियर डेकोरेशन का काम करती हैं। अभी हाल ही में इन्होंने नेशनल मेटलर्जिकल लेबोरेटरी व जमशेदपुर में सिद्धगोरा सूर्य मंदिर के इंटीरियर डेकोरेशन का काम किया है। रेशमा जिन महिलाओं के साथ काम करती हैं। उनमें से कुछ के घर के सदस्य नक्सल संगठन से भी जुड़े रहे हैं। एक युवा कारीगर तो स्वयं ही यह काम करने आता था। पर रेशमा का इन सबसे कोई वास्ता नहीं, वह सिर्फ कला को जानती हैं।
बातचीत के दौरान रेशमा अपने वर्कशॉप को दिखाने ले जाती हैं, जहां बांकुड़ा (पश्चिम बंगाल) के डोकरा कलाकार काम में लगे हैं। उनमें से एक बोरेन कुंभकार कहता है – दीदी के साथ काम करने का अपना मजा है। कभी कोई टेंशन नहीं…। बस हरदम कुछ नया और अनोखा करने को मिलता है। घर के कैंपस से सटे पास के तालाब को देखकर बरबस पूछ लिया – क्या इसमें मछली पालन करवाती हैं? कलाकार मन विचलित हो उठता है और रेशमा कहती हैं। मैं ऐसा कोई काम नहीं कर सकती। मारने का काम मुझसे नहीं होगा। ये परती जमीन को देखिए। अगली बार आएंगी तो आपको किसान रेशमा दिखेगी। मैं पूरे देश का तो कुछ नहीं कर सकती पर इन 60 महिलाओं के लिए तो कुछ जरूर करूंगी। मेरा सपना है कि एक ऐसा स्कूल खोलूं जहां बस्ते का बोझ न हो। सिर्फ मस्ती हो और कला हो। यानी एक ऐसा शांति निकेतन जहां कई रेशमा जन्म ले और कला को पूरी पहचान मिले। यदि ऐसा हुआ तो काफी हद तक नक्सल समस्या का भी समाधान हो जाएगा और बच्चों को सही दिशा मिल जाएगी।
पर्सनल इंटरव्यू
शांति निकेतन, बड़ौदा आर्ट कॉलेज, जापान की यात्रा के बाद वापस गांव? अवसर तो बहुत थे आपके पास, फिर यहीं क्यों?
मुझे लगता है कि मैं बिजनेस नहीं कर सकती। कुछ काम होना चाहिए। और काम करने के लिए मुझे अपनी मिट्टी से बेहतर कोई जगह नहीं लगी। यूं ही एक दिन सोची कि चलते हैं अपने गांव और फिर आयी तो कहीं जाने को सोचती भी नहीं।
आप जहां काम कर रही हैं, वह नक्सलियों का गढ़ माना जाता है, क्या आपको कभी किसी किस्म की परेशानी हुई?
मुझे कभी कोई परेशानी नहीं हुई। मैं तो इस बारे में सोचती भी नहीं। मेरे साथ तो काम करने वाला लड़का खुद ही बताता था कि वह नक्सली गिरोह में शामिल है। मुझे उससे क्या लेना-देना। फिर गांव के सारे लोग भी कहते हैं – दीदी आप जो काम कर रही हैं, उससे किसी को क्या परेशानी होगी, सब तो खुश रहते हैं।
कला के बाजार में कला और कलाकारों की बोलियां करोड़ों में लगती हैं। आपकी इच्छा नहीं होती उस रेस में शामिल होने की?
(जोर से हंसते हुए) सड़ी, मुझे तो पता भी नहीं रहता कि कहां क्या हो रहा है। मैं जानना भी नहीं चाहती। इस खंडहर को कला मंदिर बनाने में ही इतनी व्यस्त रहती हूं कि कुछ जानने की फुर्सत भी तो नहीं मिलती। मेरे पास कोई फोन भी तो नहीं आता। कभी-कभी तो दो-तीन दिनों तक एक रिंग भी नहीं…
जब वापस अपने गांव लौटीं तो शुरुआती दिनों में कितनी मुश्किलें हुईं। संघर्ष के उन दिनों को कैसे याद करती हैं?
विरासत में यह एक खंडहर मिला था लेकिन साथ में परिवार वालों का सपोर्ट था। लेकिन उन दिनों मैं सोच भी नहीं पाती थी कि यहां कुछ हो पाएगा। कभी-कभी रोने लगती थी अकेले। कोई संसाधन नहीं। सिर्फ अपने गांव के खेत की मिट्टी और यहां आनेवाली महिलाओं पर भरोसा रहता था। बस, उन्हीं दोनों ने मनोबल को टूटने नहीं दिया।
सबसे ज्यादा खुशी कब मिलती है?
जब अपने साथी कलाकारों में से किसी को यह कहते हुए सुनती हूं कि मेरा घर-परिवार तो अच्छे से चल रहा है। जब कोई यह कहती है कि मैंने तो अपने बड़े का दाखिला यहां करवा दिया। बस उनकी खुशी से मैं सबसे ज्यादा खुश होती हूं।
आपका ड्रीम प्रोजेक्ट क्या है?
ड्रीम प्रोजेक्ट तो नहीं कह सकती लेकिन दो काम तो करने की सोच रखी है। एक की शुरुआत अभी करनेवाली हूं। अब इस साल से खेती करने जा रही हूं। मैंने पानी के लिए बोरिंग डलवा दी है। अब पास के खेत में खेती होगी। धान गेहूं आलू आदि की। और भविष्य में एक स्कूल खोलने की इच्छा है। उस स्कूल में पढ़ाई के नाम पर भारी बस्ता नहीं होगा। जीवन की मस्ती के साथ पढ़ाई। और हां… शुल्क नहीं। एक पैसा भी नहीं।
अचानक खेती का खयाल कैसे आया?
अचानक नहीं। मेरे साथ करने वाली महिलाएं कहा करती हैं कि वे खेती भी कर सकती हैं। फिर मैं सोचती हूं कि यहां से इतनी कमाई तो होती नहीं कि वे घर की गृहस्थी भी चला लें। अब खुद से खेती करेंगी तो कम से कम चावल, गेहूं, सब्जी के झंझट से तो मुक्त रहेंगी न। और फिर मैं सच कहूं, खेती से ज्यादा क्रिएटिव और जरूरी काम मुझे कुछ नहीं लगता। शायद इसलिए भी…
और अपने जीवन का ड्रीम प्रोजेक्ट? मतलब शादी करने का खयाल…!
अरे नहीं नहीं। शादी करने का खयाल भी नहीं आता अब तो। अब कोई पूछता भी नहीं इस बारे में। मैं खुश हूं। जीवन का ड्रीम प्रोजेक्ट दिखाऊंगी न। अगली बार आइएगा – किसान रेशमा मिलेगी। फिर कभी बाद में आइएगा – अपने मकसद के साथ मिलूंगी – मास्टरनी रेशमा…
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