Saturday, April 20, 2013

अनगढ़, बिखरे पत्थरों में खगोल विज्ञान का आदिम ज्ञान


हजारीबाग शहर से बाहर निकलकर कुछ किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद हम रोला पहुंचते हैं. न गांव, न शहर बल्कि कस्बे जैसा है रोला. वहां चारो ओर से बन रहे या बन चुके कुछ मकानों के बीच एक खेत में बिखरे पड़े आड़े-तीरछे  कुछ पत्थरों को दिखाते हुए शुभाशीष दास बार-बार कहते हैं- देखिए आदि विज्ञान और इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय चारो ओर से कैद होता जा रहा है, ऐसे ही यह एक दिन मिट जाएगा, मिट्टी में मिल जाएगा. शुभाशीष इधर-उधर बिखरे गड़े हुए पत्थरों को जब बार-बार आदि जमाने के वैज्ञानिक चेतना का एक महत्वपूर्ण साक्ष्य बताते हैं तो बातें कुछ साफ समझ में नहीं आती. हम उनसे पूछते हैं कि यह तो पत्थरगड़ी केंद्र है, जहां आदिवासी समाज किसी की मृत्यु के बाद उसकी स्मृति में पत्थरों को गाड़ा करते हैं, आप जब इसे विज्ञान का अहम केंद्र बता रहे हैं तो जरा समझाइये. शुभाशीष हंसते हुए कहते हैं- आप खुद सोचिए कि अगर यह सिर्फ मृत आत्मा की याद में गाड़े हुए पत्थर भर होते और किसी तरह एक परंपरा के निर्वहन की प्रक्रिया भर होती तो फिर सभी पत्थर अमूमन एक तरीके के होने चाहिए थे. सबको या तो गाड़ा जाना चाहिए था, या रखा होना चाहिए था. यह बताते हुए वह तुरंत अपने बैग से कंपास और इंच-टेप निकालते हैं. एक पत्थर पर कंपास को रखते हुए कहते हैं कि देखिए यह पूरी तरह से उत्तर-दक्षिण की दिशा में रखा हुआ है या नहीं? कंपास सभी पत्थरों का रखा होना उत्तर-दक्षिण दिशा ही बताता है. फिर वे दो पत्थरों के बीच की दूरी टेप से नापते हुए कहते हैं कि देखिए यह दो पत्थर जितनी दूरी पर हैं, अगला पत्थर ठीक उससे दो गुनी दूरी पर होगा और उससे अगला चार गुणा दूरी पर. परिणाम वैसा ही दिखता है. शुभाशीष कहते हैं सब विज्ञान पर आधारित है, विज्ञान के औजार हैं और वह भी तब के जब खगोल विज्ञान का यह आधुनिक ज्ञान विकसित नहीं हुआ था. आर्यभट्ट, ब्रह्मभट्ट से बहुत पहले आदिवासियों द्वारा स्थापित विज्ञान के केंद्र हैं, जिनकी अवधि करीब चार हजार साल पहले की बतायी जाती है. परंपरा निर्वहन के साथ विज्ञान के विकसित करने की एक अद्भुत कला और तकनीक के साक्ष्य को हम रोला में देख रहे थे. शुभाशीष कहते हैं कि यह तो कुछ नहीं हजारीबाग के ही बड़कागांव के पंकरी बरवाडीह में चलकर देखिए, वह तो कई मायनों में एस्ट्रोनोमिकल साइंस का दुनिया का एक अहम केंद्र है, जहां दो पत्थरों के बीच से उगते सूर्य को देखने के लिए पर्यटकों के साथ अब दूसरे मुल्क के विज्ञानी भी पहुंचने लगे हैं. पंकरी बरवाडीह में हम उस साइट को देखते हैं. शुभाशीष फिर कहते हैं, आप रांची से जमशेदपुर जाने के रास्ते में अति नक्सल प्रभावित बुंडू के चोकाहातू में भी कभी जाकर देखिए, वहां तो ऐसे पत्थरों का समंदर ही दिखेगा. वहां साढ़े आठ एकड़ जमीन में करीब आठ हजार ऐसे पत्थर दिखेंगे. शुभाशीष कहते हैं, यहां-वहां, कहां-कहां बतायें, पूरे झारखंड में, झारखंड ही नहीं कश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरे भारत में ऐसे साइट मिलेंगे और दुनिया में मनुष्य द्वारा निर्मित इससे प्राचीन लेकिन जीवंत आराधना के केंद्र कहीं नहीं मिलेंगे और न ही विज्ञान के केंद्र.

परंपरागत पत्थरों में रहस्यमयी विज्ञान
शुभाशीष जितनी बातें बताते जाते हैं, हम उन पत्थरों के रहस्य, उनमें छुपे विज्ञान और उस परंपरा के महत्व को समझने की कोशिश करते हैं. हैरत भी होती है कि इतिहास कितनी चीजों को निगल लेता है. खगोल विज्ञान के इस अद्भुत ज्ञान को इतिहास ने क्यों निगल लिया था. यह सवाल हमारे मन में चल रहे होते हैं, दूसरी ओर सामने बैठे शुभाशीष डूबकर अपनी बात कह रहे होते हैं. वैसे, वे पिछले दो दशक से इन्हीं पत्थरों की दुनिया में डूबे हुए भी हैं. पहले एक प्राइवेट फर्म में मार्केटिंग का काम करते थे, फिर डीएवी स्कूल के प्रिंसिपल बने और दो दशक पहले इन पत्थरों की दुनिया को समझने का जुनून ऐसा सवार हुआ कि सब छोड़ इसी में लग गये. नतीजा यह कि पिछले दो दशक में वे ऐसी 40 जगहों की खोज कर चुके हैं और उनकी दो महत्वपूर्ण किताबें ‘ इन सर्च ऑफ मेगालिथ’ और ‘ सेक्रेड स्टोन इन इंडियन सिविलाइजेशन’ इस विषय पर आ चुकी है, तीसरी आनेवाली है, जिसे वे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के टेरेंस मेडेन के साथ मिलकर लिख रहे हैं. वह बताते हैं, झारखंड में आम बोलचाल की भाषा में इसे पथलगड़ी केंद्र कहते हैं. उरांव, हो, मुंडा और असुर आदिवासियों में पथरगड़ी की परंपरा पीढ़ियों से रही है. किसी की मृत्यु के बाद उसकी याद में पत्थर गाड़ने का रिवाज रहा है, जो अब भी एक अहम परंपरा है. इसे मेगालिथ भी कहते हैं जिसका शब्दानुवाद तो बड़ा पत्थर होता है लेकिन इसका एक आशय आदिवासियों का कब्र भी होता है और ऑस्ट्रिक स्पीच में इस प्रक्रिया को ससंदरी, हड़गड़ी, हड़सड़ी भी कहते हैं. यह परंपरा कब शुरू हुई, यह तो इतिहास के पन्ने नहीं बताते लेकिन यह माना जाता है कि नवपाषाण काल एवं ताम्र युग के समय से ही यह परंपरा चलन में रही है. साथ ही यह भी पता चलता है कि आदिवासियों ने मृतात्मा की याद में जब इस परंपरा की शुरुआत की तो उसमें कई जगहों पर खगोलीय विज्ञान व ज्योतिष ज्ञान के तत्वों को भी समायोजित किया. इन पत्थरों के जरिये ही वे काल, समय, मौसम आदि की भी गणना और अनुमान लगाते थे. बरवाडीह पंकरी में जो मेगालिथ साइट है, वहां दो पत्थरों के बीच उगता सूर्य उसी दिन दिखायी पड़ता है, जब वह पूरी तरह से पूरब दिशा से निकलता है. जिस दिन सूर्य पूरब दिशा से निकलता, उस दिन खुशी का पर्व और नये साल मनाने की एक संस्कृति भी कभी हुआ करती थी. यह दिन अब इक्विनॉक्स डे के रूप में जाना जाता है और साल में यह मौका दो बार आता है, जो पहली बार करीब 20 मार्च को आता है और दूसरी बार 22-23 सितंबर को. शुभाशीष बताते हैं, बात सिर्फ काल-मौसम गणना-आकलन की नहीं है, आप इन्हें गौर से देखेंगे तो पायेंगे कि सभी पत्थरों का मिलान बायें कोण से (यानि लेफ्ट अलाइंड) किया गया है. ऐसा संभवतः इसलिए कि आदिवासी समाज हमेशा से वामा यानि स्त्री को अधिक महत्व देते रहा है और जब अपने जमाने के बौद्धिक आदिवासियों ने भी इस अनगढ़ विज्ञानशाला को स्थापित करना शुरू किया तो उसमें बायें पक्ष को ही सबसे ज्यादा महत्व दिया.

दुनिया जानती है और मानती भी है लेकिन...
आदिम जमाने में विकसित हुए खगोल विज्ञान के इस अद्भुत ज्ञान परंपरा को भारत में वह महत्व क्यों नहीं मिला, यह सवाल हमारे मन में घुमड़ रहे होते हैं. हम यह सवाल रांची विश्ववविद्यालय के इतिहास के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ एचएस पांडेय, झारखंड के कला-संस्कृति विभाग के पूर्व सहायक निदेशक रहे हरेंद्र सिन्हा, रांची बोकारो के रास्ते में पड़नेवाले चितरपुर में रहकर इन मेगालिथ पत्थरों के साथ ही पुरातत्व के दूसरे आयामों पर पिछले कई सालों से काम करने में मगन फैयाज आदि से भी करते हैं. डॉ एचएस पांडेय कहते हैं, यथार्थ के कई रहस्य दबे हुए हैं, देर से ही सही, लेकिन यदि रहस्य का उदघाटन हो जाए तो बहुत कुछ पता चलेगा. शुभाशीष कहते हैं, यह ज्ञान-विज्ञान अगर आदिवासियों की बजाय दूसरे समुदाय का होता तो वर्षों से इस कदर उपेक्षित न रहा होता. हरेंद्र सिन्हा कहते हैं कि कोशिश जारी है कि मिट्टी में मिलता जा रहा एक महत्वपूर्ण अध्याय सामने आये. इसके लिए वर्षों से प्रयास जारी है और कोशिश कर के हमने नष्ट होते एक-दो साइट की खुदाई करवाने की पुरातत्व विभाग से अनुमति भी ले ली है. उनकी बातों को विस्तार देते हुए फैयाज कहते हैं, ज्ञान-विज्ञान से चमत्कृत करनेवाली इस दुनिया को बहुत दिनों तक नहीं दबाये रखा जा सकता, सामने आ रहा है, दुनिया जब इसे जानती-मानती है तो भला भारत में कब तक इसे दबाकर रखा जा सकता है. उक्त सभी लोग अपने-अपने तरीके से सही बात कहते हैं और आज के संदर्भ में ही अगर देखें तो मेगालिथ के कई ऐसे साइट हैं, जो दुनिया भर में मशहूर हैं और उन पर तेजी से काम भी चल रहा है. सबसे पहला नाम तो स्टोनहेंज का ही लिया जा सकता है, जिसे दुनिया के आश्चर्यों में शामिल करने के साथ ही वर्ल्ड हेरिटेज घोषित किया जा चुका है. इंगलैंड में न्यूगै्रंज, कैलानिश, मिस्र में नबटा, मलेशिया में बातू रिटोंग आदि ऐसे मेगालिथ साइट हैं, जिन्हें दुनिया भर में ख्यातिप्राप्त है और पत्थरों में समाये आदिम जमाने के ज्ञान-विज्ञान के इन स्थलों को देखने दुनिया भर के लोग पहुंचते हैं. भारत में भी झारखंड के अलावा कश्मीर में बुर्जहोम, गुफकराल, राजस्थान में देवसा, मेघालय में शिलॉंग, कर्नाटक में विभूतिहाली आदि महत्वपूर्ण मेगालिथ साइट हैं. झारखंड में तो खैर इसकी भरमार ही है. पंकड़ी बरवाडीह, रोला, रांची, चोकाहातू, रामगढ़, नापो, बीरबीर आदि स्थलों पर ऐसे साइट खोजे जा चुके हैं. और स्थलों की खोज तेजी से जारी भी है. बरवाडीह जैसे मेगालिथ साइट पर सूर्योदय देखने के लिए साल में दो बार सैलानियों की भीड़ बढ़ने लगी है. दुनिया के विज्ञानी इसे समझने के लिए आने लगे हैं और राज्य की सरकार भी आखिर में इन्हें थोड़ा महत्व देने को तैयार होते हुए दिखने लगी है. इसका एक प्रमाण यह है कि कई मेगालिथ स्थलों पर अब सरकार की ओर से बड़े बड़े बोर्ड लगाकर लोगों को उस स्थल की महत्ता के बारे में सूचित किया गया है. पिछले साल राज्य सरकार ने इन मेगालिथ साइटों के संरक्षण व विकास के लिए 2.75 करोड़ रुपये जारी भी किये हैं. विशेषज्ञ कहते हैं, इन साइटों का अगर पॉपुलर तरीके से विकास हुआ तो इनके विनाश का ही रास्ता खुलेगा. बस, ये जहां बिखरे हैं, बिखरे रहने दिया जाए, कोई जमीन पर कब्जा न करे आसपास खुली जगह रहे, सरकार इतना ही सुनिश्चित करे तो कई महत्वपूर्ण अध्याय इन बिखरे पत्थरों से खुलेंगे. एच एस पांडे कहते हैं कि सरकार पहले तो यही कोशिश करे कि रांची-जमशेदपुर मार्ग में जो चोकाहातू मेगालिथ साइट है, उसे भारत के महत्वपूर्ण स्थलों में शामिल करवाने की कोशिश करे, क्योंकि वैसा और उतना बड़ा मेगालिथ साइट दुनिया में शायद ही कहीं होगा. वैसे मेगालिथ स्थलों को यह हक भी बनता है. इस श्रेणी में हिंदुओं के कई स्थल पहले से शामिल है हीं, बौद्ध धर्म के भी महाबोधि मंदिर जैसे स्थल उस श्रेणी में शामिल हैं, ईसाई धर्म के कई चर्च और ताजमहल के अलावा मुसलमानों के भी कई स्थल इसमें शामिल हैं तो आदिवासियों का भी एक महत्वपूर्ण स्थल शामिल हो, यह हक तो भारत के आदिम निवासियों का बनता ही है. और इस श्रेणी में मेगालिथ उनकी सबसे प्राचीन जीवंत परंपराओं में से एक है, जिसमें धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक परंपरा के साथ ज्ञान-विज्ञान की विशाल दुनिया भी समायी हुई है. जो पुरातत्व के जरिये नये सिरे से इतिहास की व्याख्या करने की क्षमता भी रखता है. मेगालिथ स्थलों को घूमते हुए ये बातें सच भी लगती हैं.

बाट जोहता कला का ठाट



वह बेहद थकाऊ यात्रा थी. उबाऊ भी. झारखंड के सीमावर्ती जिला पांकुड़ से हम सुबह-सुबह ही निकले थे. रास्ते का सन्नाटा भी उब पैदा कर रहा था और काठीकुंड जैसे इलाके से गुजरते हुए किराये पर ली हुई बोलेरो चला रहा ड्राइवर भी उस इलाके में माओवादियों के राज-पाट चलने के किस्से सुनाकर पुराने और पारंपरिक राग को दुहराये जा रहा था. लेकिन संथाल परगना के दुरूह इलाके से गुजरते हुए हमें झारखंड की आखिरी सीमा तक पहुंचने की बेताबी भी उतनी ही थी. अंदर से एक रोमांच और उत्साह भी हिलोरें मार रहा था. यह उत्साह- उमंग मलूटी गांव में जल्द से जल्द पहुंचने को लेकर था. हम वहां पहुंचकर देश के अनोखे और संभवतः टेरकोटा कला के इकलौते मंदिरों के गांव को देखना चाहते थे. एक छोटे से गांव में 72 अनोखे, अद्भुत और बेजोड़ कलाकृतियों वाले मंदिरों को करीब से देखने की जिज्ञासा रोमांचित किये हुए थी. उन मंदिरों के अवशेषों में बची संभावनाओं को जानने की इच्छा ही उत्साह का संचार कर रही थी.
गांव में पहुंचने के पहले ही गेट, छोटे-छोटे माइलस्टोन बताने लगते हैं कि हम मंदिरों के गांव में पहुंच रहे हैं.  गांव में प्रवेश पर भी कहीं मंदिर दिखते नहीं. हम भी मंदिरों की तलाश करने की बजाय गोपालदास मुखर्जी का पता पूछते हैं. उनके बारे में कई लोगों ने सलाह दी थी कि जैसे मलूटी गांव खासियतों से भरा हुआ है, वैसे ही उन मंदिरों को बचाने की जिद्द और अभियान में पिछले चार दशक से भी अधिक समय से लगे गोपाल दा भी खासियतों से भरे हुए हैं. लेकिन जैसे मलूटी अनामी-गुमनामी में रहते हुए उपेक्षित रहा, वैसे ही गोपाल दा भी. गोपाल दा से उनके घर में मुलाकात होती है. उम्र के 83वें साल में प्रवेश कर चुके गोपाल दास मुखर्जी मलूटी की चर्चा करते ही पहले निराशा के गहरे गर्त में समा जाते हैं. फिर तुरंत किसी नौजवान की तरह ऊर्जा से लैश हो जाते हैं. बच्चे की तरह बार-बार अपने कमरे में जाते हैं, फाइलों का ढेर उठाकर लाते हैं. एक-एक कर दिखाते हुए इतिहास-भूगोल से लेकर वर्तमान-अतीत तक के बारे में बताते है. कहते हैं- आप जिस गांव में है, वह मंदिरों का गांव है. मंदिरों का शहर तो मदुरै, काशी है लेकिन मंदिरों का गांव कहने पर हिंदुस्तान में यही एक अकेला गांव है, जिसे देश और राज्य में भले न जाना जाये लेकिन दुनिया भर में जरूर जाना जाता है. अतीत यह है कि विष्णुपुर के मल्ल राजाओं के युग में यह गांव महुलटी नामक छोटा-सा गांव हुआ करता था.17वीं सदी के अंत में इस गांव में आकर ननकर राज्य के राजाओं ने अपनी राजधानी बनायी. ननकर का मतलब करमुक्त राज्य से होता है. राजधानी बनने के 100 साल बाद तक उस वंश के राजाओं ने इस गांव में लगातार मंदिर बनवाये और यह संख्या 108 हो गयी. अधिकांश मंदिर शिव के थे, कुछ दूसरे-देवी देवताओं के भी लेकिन राजवंश का सूर्य अस्त हुआ तो  मंदिरों की भी दुर्दशा शुरू हो गई. लेकिन 300 घरों की इस बस्ती में अब भी 72 मंदिर मौजूद हैं, जो जर्जर होने के बावजूद जीवंतता से अपने अतीत की कहानी को बयां करते हैं.
गोपाल दा से और भी ढेरों बातें होती हैं. वे पेशे से मास्टर रहे हैं. मास्टरी के दौरान ही होम्योपैथी डॉक्टरी भी सीख लिया था, जिसका इस्तेमाल अब वे गांव-इलाके के लोगों के मुफ्त इलाज में करते हैं. मास्टर-डॉक्टर बनने के पहले वे फौजी थे. फौज से अपने गांव लौटने के बाद उन्होंने दो चीजें एक साथ शुरू की. एक मास्टरी और उसके साथ ही अपने गांव की विरासत को बचाने की जंग. वर्षों की जंग का परिणाम यह भले न रहा हो कि सरकारें मलूटी जैसे दुर्लभ प्राचीन व पुरास्थल को बचाने के लिए बेचैन हो गयी हों लेकिन एक बड़ा असर यह जरूर हुआ कि मलूटी दुनिया भर में ख्यात हो गया।  झारखंड और बंगाल के ठीक बोर्डर एरिया पर बसे इसे छोटे से गांव में तमाम दुस्सवारियों के बावजूद देश-दुनिया के लोग यहां पहुंचने लगे. इस विडंबना के साथ ही सेव हेरिटेज एंड इनवायरमेंट जैसी प्रतिष्ठित संस्था ने इसे दुनिया के 12 मोस्ट इंडेंजर्ड कल्चरल हेरिटेज की साइट में भी डाल दिया है. इस सूची में यह भारत की इकलौती विरासत है. मुखर्जी कहते हैं- दुर्भाग्य है इस स्थान का कि यह बिहार-झारखंड के हिस्से में है. मुखर्जी यह बात कहते हैं तो महज स्वयं बंगाली होने की वजह से नहीं. वे चंद कदमों की दूरी पर बसे बंगाल के वीरभूम में इसके न जाने की कसक को भी बयां नहीं करते. यह कसक इस वजह से कि 80 के दशक से आग्रह और अनुनय के बावजूद सरकारी तंत्रों से लड़ते-लड़ते निराश भी हो चुके हैं।
मुखर्जी दा से बात करने के बाद हम गाव की गलियों मे मंदिरों को देखने निकलते हैं। एक-एक कर मंदिर सामने आते जाते हैं, कलाकृतियों की शैली मन मोहते जाती है और उपेक्षा का दंश झेलते मंदिर खुद सच बयान करते जाते हैं। इसी गांव में एक मौलीक्षा मां का मंदिर भी है, जहां इलाके के लोगों की भीड़ जुटती है, साल में दो-तीन बार बड़े आयोजन भी होते हैं. इस मंदिर के पास ही राज्य सरकार के पयर्टन विभाग ने एक गेस्ट हाउस भी बनाया है, जो बनने के बावजूद संचालक के अभाव में लंबे समय तक बंद पड़ा रहा, अब जाकर किसी तरह वहां सेवा शुरू की जा रही है. लेकिन जो भी सुविधा है, जो भी चहल- पहल है वह मौलीक्षा मंदिर के पास ही दिखती है। उसको छोड़ दूसरे मंदिर गांव की गलियों के दायरे में आते हैं। उनकी स्थिति दिन-ब-दिन बद से बदतर होती जा रही है. हम सभी मंदिरों का चक्कर लगाते हैं. इनमें 58 मंदिर तो शिव के ही हैं, जिनमें से कुछ टेराकोटा अलंकृत तो कुछ सामान्य हैं। काली, विष्णु तथा मौलीक्षा मंदिरों की संख्या 14 है. रख-रखाव व संरक्षण के अभाव में भले ही ये मंदिर जर्जर और ध्वस्त होने की राह पर हैं लेकिन इनके निर्माण की शैली इतनी अद्भुत है कि अब भी इनमें एक खास किस्म का आकर्षण है, एक खास किस्म की जीवंतता भी. इन सभी मंदिरों का निर्माण करीब 100 वर्षों में हुआ है, इसलिए शैलियों में एका देखने को नहीं मिलेगी. मंदिरों की बनावट के अनुसार 58 मंदिर शिखर मंदिर हैं, एक रासमंच, एक बांग्ला और शेष 12 समतल छत वाले. पूरी तरह टेराकोटा कला से बने अब भी सात मंदिर शेष हैं. मंदिरों की दीवारों पर उकेरी गयी कलाकृतियां इतनी आकर्षक हैं कि मंदिरों के धंस जाने, ध्वस्त होने की राह पर पहुंचने के बावजूद उनमे जीवंतता बची हुई है। महाभारत और रामायण की कथाएँ दीवारों की कलाकृतियों मे दिखती है। शौर्य-पराक्रम की कहानी भी। संगीत और लोकजीवन का पक्ष भी मंदिरों की दीवारों पर बनायों गईं कलाकृतियों मे हैं। 
झारखंड के दुमका जिले के शिकारीपाड़ा प्रखंड में अवस्थित इस मंदिर गांव की गलियों में घूमते हुए कई नये अनुभवों से हम गुजरते हैं. मन में सवाल आते हैं कि क्या इसकी स्थिति ऐसी ही होती यदि ऐसी ही कोई विरासत दक्षिण के किसी राज्य में होती! यह भी सवाल कौंधता है कि जब हर साल इस गांव को देखने फ्रांस, इंगलैंड, अमेरिका आदि देशों से शोधार्थी और पर्यटक पहुंचते हैं, कोलकाता के शांतिनिकेतन से हर साल यहां काफी संख्या में लोग आते हैं, फिर झारखंड या इसके पहले बिहार की सरकार ने आध्यात्मिक,धार्मिक, पुरातात्विक व ऐतिहासिक पर्यटन की तमाम संभावनाओं से भरे इस स्थल को लेकर वह उत्साह या गंभीरता क्यूँ नहीं दिखाईं? अगर सोचा गया होता तो यह गांव अब तक देश का खास टूरिस्ट विलेज तो बन ही गया होता.
जवाब मिलता है, सीमावर्ती दूरस्थ क्षेत्र में बसे होने की कीमत भी चुका रहा है। अगर यह किसी शहरी क्षेत्र में होता तो सरकारें जरूर सक्रिय हुई होतीं. तब शायद वे भी इसको अपना ही मानते और इस पर गर्व करते, जो मंदिर को देश की सांस्कृतिक पहचान बताते नहीं अघाते और मंदिर-मंदिर खेलने की कला मे पारंगत भी हैं। इसकी उपेक्षा का आलम यह रहा कि 1980 तक तो मंदिरों के इस गांव पर सरकारों का कोई खास ध्यान ही नहीं गया, जबकि पास में बंगाल में अवस्थित तारापीठ नामक मंदिर तेजी से देश भर में ख्याति प्राप्त करता रहा. 1981 में गोपाल दास मुखर्जी ने केंद्र से इन मंदिरों को बचाने और विकसित करने के लिए संवाद स्थापित करना शुरू किया. केंद्र ने रुचि भी दिखायी लेकिन वर्ष 1983  में बिहार सरकार ने भी गजट पास कर दिया और यह राज्य की धरोहर बन गयी. तब संरक्षण की दिशा में थोड़ा काम शुरू हुआ. 1996 तक छिटपुट चलता रहा लेकिन उसके बाद बंद हो गया. फिर वर्ष 2000 में राज्य का बंटवारा हुआ और मलूटी झारखंड के हिस्से में आ गया. आरंभ के कुछ सालों तक झारखंड सरकार का तो इस ओर ध्यान ही नहीं गया लेकिन कोर्ट के एक आदेश के बाद राज्य सरकार ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को इसके संरक्षण का काम सौंपा. तीन साल तक काम भी चला, करीब 12 मंदिरों को जैसे-तैसे संरक्षित करने की खानापूर्ति भी हुई, फिर बंद. इस संदर्भ में जब राज्य सरकार के कला-संस्कृति विभाग में पुरातत्व के उपनिदेशक डॉ अमिताभ से बात होती है तो वे कहते हैं कि राज्य सरकार ने 2004-05 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को 40 लाख रुपये इसके संरक्षण के लिए दिये थे. संरक्षण का काम कितना बढ़ा है यह उसी विभाग के अधिकारी बतायेंगे. डॉ अमिताभ यह भी बताते हैं कि हमलोगों को पता है कि यह राज्य में इकलौता जीवंत (लीविंग) पुरातात्विक साइट है, जहां आज भी लोग देखने जाते हैं, पूजा-पाठ भी करते हैं इसलिए हमलोग इसके लिए तेजी से कोशिश कर रहे हैं. चार महीने पहले कोलकाता में हुई बैठक में यह तय हुआ और इसे विश्व धरोहरों की श्रेणी में शामिल करवाने का आवेदन भी किया गया है. संरक्षण का काम न होने बीच में छोड़ दिये जाने की बात जानने के लिए हम भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के पुरातात्विक अधीक्षक एन जी निकोसे से बात करते हैं. बकौल निकोसे, ‘‘ राज्य सरकार से हमें 30 लाख रुपये दिये गये थे. हमने 20 लाख का काम कर दिया है. एक से लेकर 15 नंबर तक के मंदिर के संरक्षण का काम हुआ है, शेष दस लाख रुपये का काम भी मार्च के बाद होगा. चूंकि हमारे पास स्टाफ एक ही है, एक ही इंजीनियर है और यह सिविल डीपॉजिट वर्क है, इसलिए थोड़ा विलंब हुआ है.
निकोसे पुरातत्वविद हैं. वे मंदिरों को संख्या के अनुसार बताते हैं कि कितने का काम हो गया है, कितने का बाकी है. वे पैसों की भाषा में भी समझाते हैं कि इतने का काम हुआ है, इतने का बाकी है. वे सिविल डीपॉजिट जैसे शब्दावलियों के जरिये भी समझाते हैं. वे अपने अनुसार सही ही समझाते हैं लेकिन सदियों पूर्व बने मलूटी के मंदिरों को शायद ही यह भाषाएं समझ में आये. वे मंदिर इतने वर्षों तक भी बिना किसी संरक्षण-संवर्धन के टिके हुए हैं तो यह उनकी अपनी मजबूती है. धंसते, गिरते हुए भी वे अपने अस्तित्व के साथ खड़े हैं और फिर खड़े होने की संभावनाओं को बचाये हुए हैं तो यह उनके निर्माण की ही खासियत है. लेकिन विरासत को बचाने की तकनीक ने साथ नहीं दिया तो मंदिर ज्यादा दिनों तक तकनीकि शब्दावलियों को सुनकर आश्वासन पर शायद टिक न पाएं. कुल 108 मंदिरों में से अब केवल 72 ही बचे हैं.
वैसे वहां से लौटते हुए कुछ लोगों से फोन पर बात होती है तो मंदिरों के इस गांव को लेकर उम्मीद की लौ भी जगती है. मलुटी मंदिरों का गहराई से अध्ययन कर चुके प्रो सुरेंद्र झा कहते हैं, ‘‘ एशिया में ऐसी जगह कहीं नहीं है, मंदिरों का कोई ऐसा गांव नहीं है, ना टेरकोटा कला से निर्मित ऐसे मंदिर , इसलिए देर-सबेर ही सही, अब इस पर ध्यान जाने लगा है तो कल को इसके दिन भी बहुरेंगे.’’ झारखंड राज्य पर्यटन विकास निगम के प्रबंध निदेशक सुनील कुमार से बात होती है तो वे कहते हैं कि हम उस गांव को लेकर गंभीर हैं. गेस्ट हाउस बनावकर जिला प्रशासन को सौंप चुके हैं. जिला प्रशासन और भी जिन संसाधनों के विकास का खाका बनाकर सौंपेगा, हम उसे करेंगे.’’


Sunday, April 14, 2013

झुमरीतिलैयाः एक शहर, हजार फसाने



इतनी बातें एक साथ बतायी जाने लगती हैं कि हम तय नहीं कर पाते कि आखिर इस छोटे से कस्बे की जो देश-दुनिया भर में ख्याति है, उससे जुड़े किस किस्से को ज्यादा तवज्जो दें, किस छोर को पकड़कर बात की शुरुआत करें. कोई कहता है- अजी झुमरीतिलैया आयी हैं तो इसकी तो बस एक ही बड़ी पहचान है- रेडियो की फरमाइशी गीतांे के दिवानों का शहर. उन्हीं के बदौलत तो इस कस्बे को पहचान मिली. कुछ बताते हैं, रेडियो की फरमाइसी गीतों के कद्रदानों का शहर तो है ही यह, लेकिन यहां का कलाकंद भी जरूर चखिएगा. उसका इतिहास भी जानिएगा. यहां से हर रोज कलाकंद देश के कोने-कोने में जाता है और दुनिया के उन मुल्कों में भी, जहां इस इलाके के लोग रहते हैं. इन बातों के बीच ही सडक किनारे दिवारों से झांकते पोस्टर भी अपनी ओर आकर्षित कर दूसरी कहानी भी बता रहे होते हैं. एक नयी पहचान की बानगी के साथ. कुछ युवाओं द्वारा जिद-जुनून से एक्शन, थ्रिलर और रोमांच से भरपूर ‘झुमरीतिलैया’ नाम से बनी हालिया फिल्म ने शहर को नयी पहचान देने की कोशिश की है. और इन सबके बीच तिलैया डैम के पास ब्रजकिशोर बाबू भी मिलते हैं, जो कहते हैं कि देखिए, यह सब पहचान बाद की है, इसकी असली पहचान तो अबरख को लेकर ही रही है. 1890 के आसपास जब रेल लाइन बिछाने का काम शुरू हुआ तो पता चला कि यहां तो अबरख की भरमार है. फिर क्या था, यहां के अबरख पर अंग्रेजों की नजर पड़ी, वे खुदाई करने में लग गये. बाद में छोटुराम भदानी और होरिलराम भदानी आये, उन्होंने मिलकर सीएच कंपनी प्राइवेट लिमिटेड बनायी और माइका किंग नाम से मशहूर हो गये. ब्रजकिशोर बाबू बताते हैं, आज नहीं जी, 1960 में ही इस शहर में मर्सिडीज और पोर्सके कार देख सकती थीं.
किस्से दर किस्से, कहानियां दर कहानियां. रामप्रसाद मिलते हैं, वे ‘हसीना मान जाएगी’ फिल्म का गीत ही गाकर सुना देते हैं- मैं झुमरी तिलैया जाउंगी, नत्थु तेरे कारण, मैं जोगन बन जाउंगी, नत्थु तेरे कारण... रामप्रसाद बाबू का गीत मन मोहता है लेकिन बाकि दूसरे पहचान को लेकर बेतरतीब आग्रहों में हम नहीं उलझते. सीधे गंगा प्रसाद मगधिया के घर ही पहुंचते हैं. मगधिया अपने जमाने में रेडियो पर फरमाइशी सुनने के चर्चित रसिया रहे थे. रेडियो सिलोन से लेकर विविध भारती तक में चर्चित नाम. शहर के बीचो-बीच अवस्थित दुकान के पीछे अवस्थित मकान में उनकी पत्नी मालती देवी मिलती हैं, भाई किशोर मगधिया मिलते हैं, बेटा अंजनी मगधिया मिलते हैं. धर के अंदर दाखिल होते ही लगता है कि किसी ऐसे संगीत रसिया के घर में हैं, जहां कभी सिर्फ और सिर्फ गीत-संगीत और रेडियो की खुमारी रही होगी. कुछ पुराने रेडियो छज्जे पर रखे रहते हैं, कपड़े के गट्ठर में कुछ पुराने कागजों के बंडल पड़े होते हैं. अंजनी मगधिया उन बंडलों को खोलकर सामने रखते हुए कहते हैं, इसे ही देख लीजिए, कुछ नहीं बताना पड़ेगा हमलोगों को. हमारे पिताजी के मन में रेडियो फरमाइश, गीत-संगीत की दिवानगी की कहानी इसी बंडल में है. बंडल खुलता है, सबसे पहले एक पैड नजर आता है- बारूद रेडियो श्रोता संघ, झुमरीतिलैया. फिर कई तरह के पोस्टकार्ड, जो बजाप्ता प्रिंट कराये हुए होते हैं. कोई गंगा प्रसाद मगधिया के नाम से, किसी में गंगा प्रसाद मगधिया और उनकी पत्नी मालती देवी, दोनों के नाम और कुछ पोस्टकार्ड ऐसे, जो बारूद रेडियो श्रोता संघ के. रंग-बिरंगे छपाई वाले होते हैं. एक ओर प्रेषक, फरमाइशकर्ता का नाम पता प्रिंट होता है और दूसरी ओर फरमाइशी गीत, फिल्म का नाम, गीतकार आदि. सिर्फ दो चार शब्द कलम से लिखे जाते थे और फटाफट भेज दिये जाते थे. स्व. गंगा प्रसाद मगधिया की पत्नी मालती देवी कहती हैं, ‘‘ मुझे तो इतना गुस्सा आता था उन पर कह नही ंसकती, दिन भर बैठकर यही करते रहते थे. कहने पर कहते थे-सुनना तुम्हारा भी नाम आएगा. मैं झल्लाकर कहती कि रेडियो से नाम आने पर क्या होगा तो वे कहते- माना की फरमाइश बचपना बर्बाद करती है, ये क्या कम है कि दुनिया याद करती है... मालती देवी कहती हैं, हंसते हुए यही कहकर फिर कॉपी में गीतों को लिखने लगते थे. मगधिया की वह कॉपी हमें भी दिखायी जाती है. मोटी-मोटी चार-पांच कॉपियां, जिसमें गीतों के बोल, फिल्म का नाम, गीतकार, गायक आदि लिखा हुआ मिलता है. एक पत्रिका दीपक भी, जो रेडियो श्रोता संघ की ओर से ही प्रकाशित होती थी. उन कॉपियों के और उस पत्रिका के पन्ने अब फटकर चिथड़े-चिथड़े हो रहे हैं.
गंगा प्रसाद मगधिया के घर में रेडियो की फरमाइश से जुड़े एक से एक किस्से सुनने को मिलते हैं. उनके भाई किशोर कुमार मगधिया कहते हैं कि उस जमाने में विदेश में एक बार फरमाइश भेजने में 14 रुपये तक का खर्च आता था लेकिन यह रोजाना होता था. उस जमाने में यानि 60 से 80 के दशक के बीच इतना खर्च कर रेडियो पर फरमाइशी गीत सुनने का यह जुनून क्यों और इसके लिए हर रोज एक साधारण परिवार का सदस्य 14 रुपये तक खर्च क्यों करता था. यही सवाल लेकर हम मगधिया के घर से विदा होते हैं. शहर की गलियों मंे घूमते हुए, कई लोगों से मिलने पर इसका जवाब मिलता है. बताया जाता है कि कई वजहें थीं. एक तो इस छोटे से कस्बेनुमा शहर को ख्याति दिलाने की होड़, दूसरा इस छोटे से शहर के लोगों का नाम रेडियो सिलोन, रेडियो इंडोनेशिया, रेडियो अफगानिस्तान, विविध भारती वगैरह में रोजना सुनायी पड़ता था. एक तो इसे लेकर उत्साह और रोमांच रहता था और दूसरा अधिक से अधिक बार नाम प्रसारित करवाने की एक होड़ भी थी, जिसमें कई गुट एक दूसरे से मुकाबला करने में लगे रहते थे. हम मगधिया के अलावा रेडियो और फरमाइशी गीतों के दूसरे दिवानो के बारे में जानना चाहते हैं. बताया जाता है कि मगधिया के किस्से तो हैं हीं, रामेश्वर वर्णवाल भी फरमाईशी गीतों के बेमिसाल श्रोता और फरमाइश भेजनेवालों के बेताज बादशाह थे. कभी कवि और फिल्म समीक्षक विष्णु खरे ने लिखा था कि अमीन सयानी को मशहूर कराने में झुमरीतिलैया वाले रामेश्वर वर्णवाल का बड़ा योगदार रहा है. मगधिया और वर्णवाल के अलावा झमुरीतिलैया से फरमाइश करनेवालों में कुलदीप सिंह आकाश, राजेंद्र प्रसाद, जगन्नाथ साहू, धर्मेंद्र कुमार जैन, लखन साहू, हरेकृष्ण सिंह, राजेश सिंह, अर्जुन सिंह के नाम भी बताये जाते हैं. मजेदार यह कि इनमें से कई टेलीग्राम भेजकर भी गीतों की फरमाइश करते थे और कई ऐसे भी थे डाकखाने से सेटिंग कर एक-दूसरे की फरमाइशी चिट्ठियों को गायब भी करवा देते थे ताकि दूसरे का नाम कम आये. फिल्मी गीतों के दिवानों में नंदलाल सिन्हा का किस्सा सुनाया जाता है, जिन्होंने तो बाद में गीतों की दुनिया में डूबे रहने के लिए कैसेट की दुकान ही खोल ली. यह भी पता चलता है कि हरेकृष्ण सिंह प्रेमी जैसे श्रोता भी थे, जो अपने नाम के साथ अपनी प्रेमिका प्रिया जैन का नाम भी लिखकर भेजा करते थे लेकिन फरमाइशी गीतों में लगातार फरमाइश करते रहने के बावजूद वे प्रेम में कामयाब नहीं हो सके थे, प्रेमी की शादी प्रिया से नहीं हो सकी थी. अतीत के कई-कई किस्सों के साथ वर्तमान को जानने की कोशिश करते हैं. फरमाइशपसंदों के इस शहर में कितने फरमाइशी गुरू बचे हैं अब? गंगा प्रसाद मगधिया के भाई किशोर मगधिया कहते हैं- हम जिंदा रखना चाहते हैं इसे लेकिन परंपरा की तरह, हमारे अंद रवह जुनून नहीं आ सकता, क्योंकि रोजी-रोटी सबकी चिंता है. और फिर अब तो टीवी युग है, कौन सुनता है रेडियो, फिर भी सप्ताह में दस रुपये तो इस पर अब भी खर्च कर ही देते हैं.
रेडियो, फरमाइशी गीतों का इतिहास और गीतों के दिवानों के किस्से सुनने के बाद हमं अतीत से निकलकर झुमरीतिलैया की नयी फिल्मी पहचान से रू-ब-रू होने जाते हैं. यह एकदम हालिया पहचान की कोशिश है, कुछ मायनों में एकदम नायाब भी. शहर में जगह-जगह ‘झुमरीतिलैया’ फिल्म के पोस्टर नजर आते हैं तो हम उसके कलाकारों से मिलने उनके घर पहुंचते हैं. एक कमरे में सारे कलाकार जुटते हैं. निर्देशक, अभिनेता, अभिपेक द्विवेदी, उनके भाई राहुल, उनके पिता उदय द्विवेदी, मां कांती द्विवेदी,विवेक राणा, उनके मामा गौरव राणा, अभिनेत्री नेहा, नेहा के पापा आदि. इन सबने मिलकर ही एक फिल्म प्रोडक्शन कंपनी बनायी एफ एंड बी यानि फंेड्स एंड ब्रदर्स प्रोडक्शन और हालिया दिनों में एक फिल्म रिलीज कर दी- झमुरीतिलैया. एक्शन थ्रिलर ओर रोमांच से भरपूर. कुल खर्च 13 लाख लेकिन लागत साढ़े पांच लाख. फिल्म झुमरीतिलैया के सिनेमाहॉल में दस दिनों तक चली, रांची में एक सप्ताह तक, बुंडू में छह दिनों तक. अब होली के बाद दूसरे शहरों में फिर से रिलीज करने की तैयारी है. फिल्म में एक्शन की भरमार है. ताईक्वांडो, कराटे, कूंगफू के भरपूर सीन. अभिषेक कहते हैं, हम बचपन से ही मार्शल आर्ट के दिवाने रहे हैं. बहुत दिनों से फिल्म बनाने को सोचते थे. पहले घर में ही सिचुएशन वन, सिचुएशन टू, द एग्जिट गेट जैसी फिल्में बनाये थे, जिसमें पापा आदि को रोल में रखे थे लेकिन एक फीचर फिल्म बनाने की योजना हमारी थी. तो हमलोगों ने तय किया खुद ही पैसा जुटायेंगे और खुद ही अभिनेता-अभिनेत्री बनेंगे. सोनी एफएक्स कैमरे का जुगाड़ हुआ. ग्यारहवीं में पढ़नेवाली नेहा हिरोइन के तौर पर मिल गयी, हीरो के लिए विवेक, राहुल आदि हो गये. पापा की भूमिका के लिए निर्देशक अभिषेक के पापा मिल गये और मां के लिए खुद की मां भी. सबका नाम भी ओरिजिनल ही रहा. किसी को फिल्म का अनुभव पहले से नहीं था, सो बार बार ब्रुस ली की फिल्म ‘ इंटर द ड्रैगन’, ‘ टॉम युम वुम’ आदि फिल्में दिखायी गयी ताकि एक्शन का रियाज हो और फिर घर में और आसपास के लोकेशन में ‘झुमरीतिलैया’ की शूटिंग भी शुरू हो गयी. फिल्म बनाने के दौरान लगा कि एक गाना तो होना ही चाहिए. अब गायक कहां से आये तो अभिषेक ने अपने चाचा को कहा, जो मुकेश के गाने ही गाते हैं तो एक सीन ऐसा क्रियेट किया गया, जिसमें मुकेश के गाने गाये जा सके. ऐसे ही जुगाड़ तकनीक से ‘झमुरीतिलैया’ बनकर तैयार हुई और रिलीज हुई तो एक बार फिर गीत-संगीत के शहर का फिल्मी सफर शुरू हुआ. नेहा कहती हैं, मैं तो पहले सोचती थी कि अभिनय कैसे करूंगी लेकिन बाद में दोस्तों के साथ काम करना था सो पता ही नहीं चला. अभिषेक धीरे से कहते हैं, छापिएगा नहीं लेकिन यह ऐसी अभिनेत्री है कि पहली बार अपनी ही फिल्म को देखने हॉल में गयी. गीतों के शहर में फिल्मों के जरिये सफर का यह नया अनुभव सुनना दिलचस्प लगता है. फिल्म में मां बनी निर्देशक अभिषेक की मां कांती द्विवेदी कहती हैं, बेटों ने मुझसे भी अभिनय करा लिया, अब तो सड़क पर जाती हूं तो कई बार बच्चे कहते हुए मिले- देखो-देखो, झुमरीतिलैया की मां जा रही है. एक्शन फिल्मों का नाम झुमरीतिलैया क्यों, झमुरीतिलैया का तो कुछ खास है नहीं इसमें? निर्देशक अभिषेक कहते हैं, इससे ज्यादा पॉपुलर नाम झारखं डमें कोई है क्या और फिर अपना शहर है झमुरीतिलैया, इसके नाम पर तो इतना भरोसा है कि यह कुछ भी चल जाएगा.
युवा फिल्मी लोगों से मिलकर झमुरीतिलैया की नयी यादों के साथ विदा होने को होते हैं कि वहां भी फिर वही बात दुहराई जाती है कि एक बार यहां के कलाकदं को तो जाकर चख ही लीजिए, देख ही लीजिए. हम आनंद विहार मिष्ठान भंडार पहुंचते हैं. अमित खेतान मिलते हैं. कहते हैं कि मिठाई की दुनिया में कलाकदं झुमरीतिलैया की ही खास देन है, यह तो दावे के साथ नहीं कह सकता लेकिन यहां के कलाकंद की तरह कहीं और का स्वाद नहीं होता, क्योंकि यहां की आबोहवा कलाकंद का साथ देती है. पहले एक भाटिया मिष्ठान भंडार हुआ करता था, वहीं पर कलाकंद बनना शुरू हुआ, फिर वह बंद हो गया तो हमारे यहां से लोग रोज पैक कराकर देश के कोने-कोने में अपने रिश्तेदारों के यहां भेजते हैं और कई बार विदेश भी. पिछले चार दशक से कलाकंद बनाने में ही लगे कारिगर सुखती पात्रो कहते हैं- मैंने बहुत जगह देखा है, कलाकंद आज भले सभी जगह हो लेकिन यह देन तो इसी झुमरीतिलैया की है. पता नहीं कलाकंद कहां की देन है लेकिन वाकई झमुरीतिलैया के कलाकंद का स्वाद शायद ही कहीं और मिले. विदा होते समय बताया जाता है कि यह इलाका तो अब पावर हब बनने जा रहा है. कोई कहता है कि यह भी जानिए कि रांची पटना मार्ग पर अवस्थित यह शहर रांची और पटना से समान दूरी पर स्थित है. कोई कहता है, पहले यह अबरख के लिए जाना जाता था लेकिन अब तो बेशकीमती पत्थरो ंका खान मिला है यहां. सब नयी-नयी पहचान बताते हैं लेकिन हमारे हाथों मंे मगधिया के पोस्टकार्डों का बंडल होता है- फरमाईशकर्ता गंगा प्रसाद मगधिया, बारूद रेडियो क्लब, झुमरीतिलैया, गीत- दो हंसों का जोड़ा बिछड़ गया रे, फिल्म गंगा-जमुना....!