Tuesday, December 18, 2012
जा रही हो, चली जाओगी, थोड़ी देर और बैठो ना...!
अनुपमा
कल, जब से यह सूचना मिली है कि शिवकुमार ओझा नहीं रहे, तब से मन बेचैन, परेशान तो है ही, एक अपराध बोध से ग्रस्त भी. वे करीब 98 साल की उम्र में गुजरे. अपनी जिंदगी पूरी जी ली उन्होने. इस उम्र में किसी भी दिन दुनिया को अलविदा कह सकते थे, यह लगभग तय-सा था, लेकिन उनके जाने के बाद लग रहा है कि वे थोड़ी जल्दी चले गये, काश! कुछ दिन और रूक जाते.
करीब डेढ़ माह पहले उनका सुबह-सुबह फोन आया था. जानता हूं बेटा की मीडिया में काम करती हो इसलिए समयाभाव रहता होगा, तभी तो मिलने नहीं आ रही हो. लेकिन मुझे लगता है कि मीडियावाले अधिकांश बार काम के बोझ का बहाना बनाकर भी मिलने-जुलने के दायित्वों से छुट्टी पा लेना चाहते हैं. यह कहने के बाद उनका वही पुराना एक संक्षिप्त वाक्य- आओगी नहीं, आओ ना...! पूर्वनिर्धारित कार्य होने के कारण थोड़ी जल्दबाज़ी थी लेकिन फिर भी आनन-फानन में उनके पास पहुंच ही गयी. नहा-धोकर बारामदे में कुर्सी-टेबल पर बैठ कर धूप में नाश्ता कर रहे थे. एक रोटी लेकर नाश्ते में बैठे थे. मुझे जल्दी मची थी, मैं चाहती थी कि वे जल्दी से जल्दी रोटी खत्म कर दें तो मैं भी यहां से निकल जाउं. मैं निकल जाने की हड़बड़ी में थी पर शिष्टाचार वश छोड़ कर नहीं जा प रही थी. और वे रोटी छोड़ बातों में रमते जा रहे थे. दवाइयां दिखाते हुए कह रहे थे कि अब लगता है कि बुढ़ापा आ गया, खाने से ज्यादा दवाइयां दे रहे हैं मुझे घरवाले. उनका शरीर सूजा हुआ था, अच्छे से बोल नहीं पा रहे थे लेकिन बिंदास बने रहने की जिद थी कि वे अपनी बीमारियों से, उम्र से भी लड़कर रोटी खाते-खाते ठहाके लगाने की कोशिश कर रहे थे. उनका नाश्ता खत्म हुआ, निकलने लगी तो उन्होंने वही पुराना वाक्य दुहराया, जिसे सुनने के बाद कितनी भी हड़बड़ी में निकलने को नहीं सोच पाती थी. उन्होंने कहा- जाओगी, चली ही जाओगी, जा ही रही हो, थोड़ी देर और रूको ना, सिर्फ थोड़ी देर और...! उस दिन पहली दफा मैं उनके थोड़ी देर और रूकने के आग्रह को नहीं मान सकी और यह वादा कर विदा हो चली कि कल पक्का आउंगी तो ढेर सारी बातें करूंगी आपके साथ. चलते-चलते पास बुलाकर उन्होंने वही आशीर्वाद दुहराया- स्वस्थ रहो, सुखी रहो, संपन्न रहो...! लेकिन वह कल नहीं आया, मालूम हुआ कि वे इंतजार करते रहे आने का... मन अपराध बोध से भरा हुआ है कि जब मैं नहीं जा सकती थी कि क्यों कह दी थी कि कल आउंगी तो ढेर सारी बातें करूंगी. जब कह ही दी थी तो डेढ़ माह में दो घंटे क्यों नहीं निकाल कर जा पायी उनके पास!
ओझाजी के बारे में करीब चार साल पहले जानी थी. वर्तमान में तहलका में सहयोगी निरालाजी तब प्रभात खबर के साथ ही थे. उन्होंने प्रभात खबर में एक पूरे पन्ने में उनके बारे में, उनके साक्षात्कार और जीवन के पन्नों और उनके काम आदि को प्रकाशित कर उनसे रू-ब-रू करवाया था. निरालाजी से ही उनका फोन नंबर प्राप्त कर उनसे मिलने गयी थी. यही सोचकर कि मैं भी लिखूंगी इनके व्यक्तित्व, कृतित्व पर. उनका जीवन प्रभावित करनेवाला था. आजादी की लड़ाई में स्कूली जीवन में ही उनका जेल जाना, फिर बाद में भी जेल जीवन गुजारना, जेल से निकलने के बाद गांधीजी के रहते ही उन पर द कूली बैरिस्टर, देवदर्शन आदि किताबें लिखना प्रेरित किया था. राइडिंग द स्टोर्म भी उनकी चर्चित कृति थी. जब बहार आयी, मैं अकेली, प्रीत की रीत निराली, प्यासा पंछी, मधु के छींटे आदि शीर्षक से करीब आठ उपन्यासों के भी रचनाकार थे वे. उनसे पहली बार मिलने गयी तो यही सोचकर गयी कि एक इंटरव्यू करूंगी, एक प्रोफाइल स्टोरी उनपर करना चाहती थी. इस उम्र में भी कैसे वे इतने सक्रिय रहते हैं, लिखना-पढ़ना जारी रख हुए हैं लेकिन उनसे पहली ही बार हुई मुलाकात में उन पर अपनी पत्रकारिता विधा दिखाने की तैयारी बस धरी कि धरी ही रह गयी और न तो कभी उनका इंटरव्यू जैसा कुछ की और न उन पर कुछ और ही लिख सकी. पहली ही मुलाकात के बाद चलते हुए उन्होंने कह दिया था- तुम्हें अनुपमा नहीं कहूंगा, बड़ा नाम है यह, सिर्फ अनु कहूंगा. साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि तुम इसे जबर्दस्ती ही मानो लेकिन आज से तुम मेरी बेटी हुई. तुम्हें कोई जरूरत तो किसी और को नहीं कहना, मुझे इशारा भर करना, मैं सक्षम हूं अपनी बेटी की जरूरतों को पूरा करने में.
उसके बाद कई बार सोची लेकिन हर बार उन्होंने कहा कि अच्छा अगली बार आना तो तुम पत्रकार बनकर आना तब मैं तुम्हें बताउंगा लेकिन वह अगली बार कभी नहीं आया. जाते ही मैं उनकी बेटी होती थी और वे एक ऐसे अनुभवी और खुले दिमाग वाले अभिभावक जो अपने बच्चे को अपनी जिंदगी की हर पहेली को बता देना चाहते थे. हर बात पर कहते, कभी जिंदगी को शर्तों पर नहीं जीना, अपनी पसंद से जिंदगी जीना...!
उनकी बातें ही खत्म नहीं होती थीं तो मैं उनका इंटरव्यू कब करती! देश-दुनिया-समाज-राजनीति-फिल्म-प्यार सब पर वे घंटों बातें करते और उसमें खुद को रखकर उसका आकलन करते. बहुत ही निरपेक्ष भाव से. आत्ममुग्धता का शिकार होते हुए उन्हे कभी नहीं देखी, ना ही उनकी कभी चाहत रही कि उनके बारे में अधिक से अधिक लोगों को बताया जाए कि वे भी आजादी के एक सिपाही थे. जिन्होंने स्वतंत्रता सेनानी पेंशन आदि लेना कभी पसंद नहीं किया और एक महत्वपूर्ण लेखक हैं, जिन्होंने कई किताबें लिखी. वे गांधीजी के साथ गुजारे हुए अपने समय को हमेशा बताते थे. किस्से के अंदाज में बताते कि कैसे वह दिल्ली में हर दिन गांधी जी की प्रार्थना में शामिल होने के लिए साइकिल से जाते थे और एक बार तो ऐसा हुआ कि घनघोर बारिश में सिर्फ गांधीजी, उनके दो सहयोगियों के अलावा सिर्फ वही अकेले बाहरी प्रार्थना सभा में पहुंचे. गांधीजी ने तब चंदा मांगा, इन्होंने एक अन्नी दी और गांधी जी का हाथ ज़ोर से दबाया. गांधीजी ने कहा कि जो है वही दो, लेकिन देशसेवा में अपना योगदान जरूर दो.... हर बात-मुलाकात में ऐसे ही कई किस्से सुनाते थे. अपने प्रेम के किस्से भी सुनाया करते थे. भोजपुरी में कहावतों का जुबानी संग्रह था उनके पास, हर बात में उसका इस्तेमाल करते. हर सुबह दस बजे तक नहा-धोकर एक दम से ऑफिसियल ड्रेस यानि चमकदार सफ़ेद शर्ट पहनकर अपने स्टडी रूम में बैठते और चार घंटे तक कुछ न कुछ लिखते-पढ़ते थे. यह उनका रोज का रूटीन था और फिर शाम को पहले माले से नीचे उतरकर घंटों टहलते. उम्र के 98वें साल में भी. हर रविवार की दोपहर को उनका एक घंटे का समय एक खास प्रायोजन के लिए भी तय था, जिसमें वे किसी किस्म की बाधा पसंद नहीं करते थे और न ही वह कभी उसे मिस करते थे. हर रविवार को दोपहर एक बजे से दो बजे तक वे अपनी बहन से फोन पर बात करते थे. इस उम्र में भाई-बहन को बात करते हुए देखना और फिर दुख-सुख से ज्यादा ठहाका लगाकर हंसने की प्रक्रिया दुर्लभतम थी? ऐसी ही कई दुर्लभ आदतें थीं उनकी.
डेढ़ माह पहले जब वादा करके आयी थी कि आपसे अगली बार मिलने आउंगी तो बहुत देर बैठूंगी. गयी तो नहीं मिलने लेकिन सोची थी कि इस बार उनका एक इंटरव्यू कर ही लूंगी और फिर और भी कुछ जानकर उनके बारे में कुछ लिखूंगी. वह इंटरव्यू तो नहीं कर सकी, उनके पास पत्रकार रूप में एक बार भी नहीं जा सकी लेकिन उनसे टुकड़े-टुकड़े में हुई बातों का इतना संग्रह है कि एक मोटी किताब बन जाये लेकिन लिख नहीं पाउंगी. क्योंकि अभी इतना ही लिख रही हूं तो बार-बार लग रहा है कि वे कंप्यूटर स्क्रीन से झांकते और हंसते हुए कह रहे हैं कि अभी नहीं जाना, कुछ देर रूकना, एक गाना भी सुनाउंगा और कुछ खिलाना भी बाकी है तुम्हें...!
Saturday, January 14, 2012
सपनों को सच करने में एक सवाल नजरिये का भी है !
♦ अनुपमा
पिछले साल की बात है। 28 दिवंबर की। उस रोज कितनी खुश थी जॉनी उरांव। खुशी का कारण भी कोई छोटा नहीं था। रांची से सटे बेड़ो के एक किसान परिवार की 18 वर्षीया बिटिया जॉनी ने रांची वीमेंस कॉलेज में स्नातक पार्ट वन की छात्रा रहते हुए देश में रिकार्ड कायम किया। अपने कॉलेज में टॉपर वगैरह बनकर नहीं, बल्कि मुखिया के रूप में चुने जाने के कारण। जॉनी देश में सबसे कम उम्र की मुखिया बनीं। वह खुश थी और उसका खुश होना और हम जैसों को हैरत में पड़ना स्वाभाविक ही था। जॉनी से उस रोज जो बातचीत हुई थी, वह अब भी डायरी के पन्ने में मौजूद है।
उसने झारखंड के कई नेताओं से ज्यादा स्पष्ट उच्चारण के साथ अपनी उम्र से बहुत आगे की गंभीरता दिखाते हुए कहा था, ‘कुछ साथियों ने सलाह दी थी कि जब राजनीति में ही रुचि है, तो चुनाव क्यों नहीं लड़ जाती! मैं साथियों की सलाह से चुनाव लड़ गयी। सिर्फ ट्रायल मारने या शौक पूरा करने के लिए नहीं बल्कि गंभीरता के साथ। चुनाव चल रहा था, तो मैं चुनाव प्रचार से लौटने के बाद रोज ही पंचायत के अधिकार, मुखिया के अधिकार और जिम्मेवारियों का अध्ययन भी करती थी ताकि अगर जीत जाऊं, तो क्या-क्या करूंगी, कैसे-कैसे करूंगी।’
सच में जिस आत्मवशि्वास से 18 साल की जॉनी उरांव अपनी बातों को बता रही थी, वैसा आत्मवशि्वास 20-30 साल से राजनीति-राजनीति का खेल खेलने वाले झारखंड के कई नेताओं में भी देखने को नहीं मिलता। जॉनी की तरह ही जमशेदपुर में एमबीए की एक छात्रा सविता टुडू भी आत्मवशि्वास से लबरेज दिखी थीं। घसियाडीह की रहनेवाली सविता भी मुखिया चुनी गयी थी। सविता ने कहा था कि अब मुझे पंचायत प्रबंधन में ही अपनी सारी ऊर्जा को लगाना है, नौकरी के प्रबंधन के बारे में सोचूंगी भी नहीं। जमशेदपुर के पास से ही एक सबर महिला भी चुनी गयी थी। उसका नाम है ममता सबर। ऐसे कई नाम हैं।
झारखंड में पंचायत चुनाव सपना था। वह पिछले साल हकीकत में बदला। गांव-गांव में सरकार बनी। रांची में बैठनेवाली राज्य की सरकारें साल-दर-साल निराशा के गहरे गर्त में समानेवाला माहौल बनाती रहीं तो उम्मीद की किरणें इस गंवई सरकार पर ही टिकी। जॉनी, ममता और सविता जैसों पर ज्यादा। आधी आबादी की इतनी जोरदार दस्तक पहली बार सुनाई पड़ी थी। 50 प्रतशित का आरक्षण था, लगभग 58 प्रतशित पर जीत हासिल की महिलाओं ने। संख्या के हिसाब से करीब 29 हजार के आसपास महिलाएं। 32 साल बाद और राज्य बनने के बाद पहली बार तमाम पेंच को पार करते हुए पंचायत चुनाव के आये नतीजे ने राज्य के अलग-अलग हिस्से में जॉनी, सविता, ममता की तरह भारी संख्या में आत्मवशि्वासी युवा वर्ग को लोकतंत्र की असली राजनीति में उभरने का मौका दिया। अधिकतर वैसे, जो ठेठ ग्रामीण परिवेश से हैं, कई ऐसे भी जो कैरियर के तमाम मोह को छोड़ बदलाव की छटपटाहट लिये चुनावी मैदान में उतरे थे। इन सबके बीच अब तक मेनस्ट्रीम पॉलिटिक्स के लिए उपेक्षित समुदाय से भी नेताओं का उदय हुआ। एक नजरिये से देखें, तो यह झारखंड बनने के बाद की सबसे बड़ी सामाजिक-राजनीतिक क्रांति हुई।
अब पंचायत चुनाव के एक बरस गुजर गये हैं। झारखंड की राजनीति का मर्सिया गान करनेवाले एक समूह द्वारा पंचायत चुनाव से निकले प्रतिनिधियों की राजनीति का मर्सिया गान भी किया जाने लगा है। पॉपुलर तरीके से लेकिन घटिया अंदाज में। निराशावादी रवैये के साथ। कई ऐसे साथी मिलते हैं, जो कहते हैं कि कहां हुआ कुछ बदलाव! वे बातें ऐसे करते हैं, जैसे बदलाव कोई जादुई छड़ी से निकलनेवाला चमत्कार हो। उन्हें कौन बताये कि 100 सालों के बिहार में जब सब कुछ पटरी पर नहीं आ सका है, तीन-तीन बार पंचायती चुनाव होने के बाद बिहार में जब पंचायती राज व्यवस्था नहीं सुधर सकी है, तो झारखंड से चमत्कार की उम्मीद एक ही बार में क्यों की जा रही है। फिर उसे एक राग की तरह गाये जाने की इतनी अकुलाहट क्यों है?
एक बड़ा सवाल यह भी कि क्या जिस तरह बिहार में महिला प्रतिनिधियों को आइकॉन की तरह बनाकर पेश किया, बिहार की तर्ज पर ही चुनावी राजनीति ने उसे अपनी एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर ब्रांडिंग की! वैसा झारखंड में हुआ या होता दिख रहा है? क्या सरकार, शासन व समाज की ओर से जॉनी, सविता टुडू को उम्मीदों की नायिका बनाने की कोशिश हुई? समाज ने क्या कभी नेताओं-अधिकारियों या मंत्रियों की तरह ही इन नये नेताओं को मान दिया? हौसलाअफजाई की?
राज्य में 4423 पंचायतों में कुल 32,260 गांव आते हैं। इनमें से कई गांव ऐसे हैं, जो आज भी विकास क्या, बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते हुए गांव हैं। कई इलाके ऐसे हैं, जो पिछड़ेपन के मामले में देश भर में चुनिंदा इलाकों में से हैं। सुदूर इलाके में कई ऐसे आदिवासी समुदाय वाले पंचायत हैं, जो हाशिये पर रहे हैं। जहां से उस समुदाय के बड़े नेता के अब तक राजनीति में नहीं होने की वजह से कोई अधिकारी, मंत्री, जनप्रतिनिधि वगैरह उन तक पहुंचना भी मुनासिब नहीं समझते थे। अब पंचायत चुनाव के बाद मजबूरी में ही सही, उन इलाकों को भी थोड़ी राहत तो मिल ही रही है। जाहिर सी बात है कि आज अगर पंचायत चुनाव के बाद उन बाशिंदों को छोटी सरकार का सपना साकारा होता दिखा है, तो कल वे बड़ी सरकार में भी अपनी आकांक्षाओं को साकार होता देखना चाहेंगे। पंचायत चुनाव के जरिये नेताओं ने कम से कम उन्हें हाशिये से हस्तक्षेप करने की ताकत दी है। वह कई रूपों में इसका असर आनेवाले कल में दिखेगा। और फिर यह कम है क्या कि झारखंड को पंचायत चुनाव नहीं होने की वजह से हर साल जो लगभग 500 करोड़ रुपये की केंद्रीय राशि का नुकसान सहना पड़ रहा था, अब वह नहीं होगा।
सवाल नजरिये का है…!
(झारखंड सरकार के मीडिया फेलोशिप के तहत लिखा गया लेख
पिछले साल की बात है। 28 दिवंबर की। उस रोज कितनी खुश थी जॉनी उरांव। खुशी का कारण भी कोई छोटा नहीं था। रांची से सटे बेड़ो के एक किसान परिवार की 18 वर्षीया बिटिया जॉनी ने रांची वीमेंस कॉलेज में स्नातक पार्ट वन की छात्रा रहते हुए देश में रिकार्ड कायम किया। अपने कॉलेज में टॉपर वगैरह बनकर नहीं, बल्कि मुखिया के रूप में चुने जाने के कारण। जॉनी देश में सबसे कम उम्र की मुखिया बनीं। वह खुश थी और उसका खुश होना और हम जैसों को हैरत में पड़ना स्वाभाविक ही था। जॉनी से उस रोज जो बातचीत हुई थी, वह अब भी डायरी के पन्ने में मौजूद है।
उसने झारखंड के कई नेताओं से ज्यादा स्पष्ट उच्चारण के साथ अपनी उम्र से बहुत आगे की गंभीरता दिखाते हुए कहा था, ‘कुछ साथियों ने सलाह दी थी कि जब राजनीति में ही रुचि है, तो चुनाव क्यों नहीं लड़ जाती! मैं साथियों की सलाह से चुनाव लड़ गयी। सिर्फ ट्रायल मारने या शौक पूरा करने के लिए नहीं बल्कि गंभीरता के साथ। चुनाव चल रहा था, तो मैं चुनाव प्रचार से लौटने के बाद रोज ही पंचायत के अधिकार, मुखिया के अधिकार और जिम्मेवारियों का अध्ययन भी करती थी ताकि अगर जीत जाऊं, तो क्या-क्या करूंगी, कैसे-कैसे करूंगी।’
सच में जिस आत्मवशि्वास से 18 साल की जॉनी उरांव अपनी बातों को बता रही थी, वैसा आत्मवशि्वास 20-30 साल से राजनीति-राजनीति का खेल खेलने वाले झारखंड के कई नेताओं में भी देखने को नहीं मिलता। जॉनी की तरह ही जमशेदपुर में एमबीए की एक छात्रा सविता टुडू भी आत्मवशि्वास से लबरेज दिखी थीं। घसियाडीह की रहनेवाली सविता भी मुखिया चुनी गयी थी। सविता ने कहा था कि अब मुझे पंचायत प्रबंधन में ही अपनी सारी ऊर्जा को लगाना है, नौकरी के प्रबंधन के बारे में सोचूंगी भी नहीं। जमशेदपुर के पास से ही एक सबर महिला भी चुनी गयी थी। उसका नाम है ममता सबर। ऐसे कई नाम हैं।
झारखंड में पंचायत चुनाव सपना था। वह पिछले साल हकीकत में बदला। गांव-गांव में सरकार बनी। रांची में बैठनेवाली राज्य की सरकारें साल-दर-साल निराशा के गहरे गर्त में समानेवाला माहौल बनाती रहीं तो उम्मीद की किरणें इस गंवई सरकार पर ही टिकी। जॉनी, ममता और सविता जैसों पर ज्यादा। आधी आबादी की इतनी जोरदार दस्तक पहली बार सुनाई पड़ी थी। 50 प्रतशित का आरक्षण था, लगभग 58 प्रतशित पर जीत हासिल की महिलाओं ने। संख्या के हिसाब से करीब 29 हजार के आसपास महिलाएं। 32 साल बाद और राज्य बनने के बाद पहली बार तमाम पेंच को पार करते हुए पंचायत चुनाव के आये नतीजे ने राज्य के अलग-अलग हिस्से में जॉनी, सविता, ममता की तरह भारी संख्या में आत्मवशि्वासी युवा वर्ग को लोकतंत्र की असली राजनीति में उभरने का मौका दिया। अधिकतर वैसे, जो ठेठ ग्रामीण परिवेश से हैं, कई ऐसे भी जो कैरियर के तमाम मोह को छोड़ बदलाव की छटपटाहट लिये चुनावी मैदान में उतरे थे। इन सबके बीच अब तक मेनस्ट्रीम पॉलिटिक्स के लिए उपेक्षित समुदाय से भी नेताओं का उदय हुआ। एक नजरिये से देखें, तो यह झारखंड बनने के बाद की सबसे बड़ी सामाजिक-राजनीतिक क्रांति हुई।
अब पंचायत चुनाव के एक बरस गुजर गये हैं। झारखंड की राजनीति का मर्सिया गान करनेवाले एक समूह द्वारा पंचायत चुनाव से निकले प्रतिनिधियों की राजनीति का मर्सिया गान भी किया जाने लगा है। पॉपुलर तरीके से लेकिन घटिया अंदाज में। निराशावादी रवैये के साथ। कई ऐसे साथी मिलते हैं, जो कहते हैं कि कहां हुआ कुछ बदलाव! वे बातें ऐसे करते हैं, जैसे बदलाव कोई जादुई छड़ी से निकलनेवाला चमत्कार हो। उन्हें कौन बताये कि 100 सालों के बिहार में जब सब कुछ पटरी पर नहीं आ सका है, तीन-तीन बार पंचायती चुनाव होने के बाद बिहार में जब पंचायती राज व्यवस्था नहीं सुधर सकी है, तो झारखंड से चमत्कार की उम्मीद एक ही बार में क्यों की जा रही है। फिर उसे एक राग की तरह गाये जाने की इतनी अकुलाहट क्यों है?
एक बड़ा सवाल यह भी कि क्या जिस तरह बिहार में महिला प्रतिनिधियों को आइकॉन की तरह बनाकर पेश किया, बिहार की तर्ज पर ही चुनावी राजनीति ने उसे अपनी एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर ब्रांडिंग की! वैसा झारखंड में हुआ या होता दिख रहा है? क्या सरकार, शासन व समाज की ओर से जॉनी, सविता टुडू को उम्मीदों की नायिका बनाने की कोशिश हुई? समाज ने क्या कभी नेताओं-अधिकारियों या मंत्रियों की तरह ही इन नये नेताओं को मान दिया? हौसलाअफजाई की?
राज्य में 4423 पंचायतों में कुल 32,260 गांव आते हैं। इनमें से कई गांव ऐसे हैं, जो आज भी विकास क्या, बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते हुए गांव हैं। कई इलाके ऐसे हैं, जो पिछड़ेपन के मामले में देश भर में चुनिंदा इलाकों में से हैं। सुदूर इलाके में कई ऐसे आदिवासी समुदाय वाले पंचायत हैं, जो हाशिये पर रहे हैं। जहां से उस समुदाय के बड़े नेता के अब तक राजनीति में नहीं होने की वजह से कोई अधिकारी, मंत्री, जनप्रतिनिधि वगैरह उन तक पहुंचना भी मुनासिब नहीं समझते थे। अब पंचायत चुनाव के बाद मजबूरी में ही सही, उन इलाकों को भी थोड़ी राहत तो मिल ही रही है। जाहिर सी बात है कि आज अगर पंचायत चुनाव के बाद उन बाशिंदों को छोटी सरकार का सपना साकारा होता दिखा है, तो कल वे बड़ी सरकार में भी अपनी आकांक्षाओं को साकार होता देखना चाहेंगे। पंचायत चुनाव के जरिये नेताओं ने कम से कम उन्हें हाशिये से हस्तक्षेप करने की ताकत दी है। वह कई रूपों में इसका असर आनेवाले कल में दिखेगा। और फिर यह कम है क्या कि झारखंड को पंचायत चुनाव नहीं होने की वजह से हर साल जो लगभग 500 करोड़ रुपये की केंद्रीय राशि का नुकसान सहना पड़ रहा था, अब वह नहीं होगा।
सवाल नजरिये का है…!
(झारखंड सरकार के मीडिया फेलोशिप के तहत लिखा गया लेख
सत्ता मिलने के बाद भी सरलता नहीं गयी आमोलिना की

♦ अनुपमा
स्थानीय बोली की मिलावट के साथ फटाफट-धड़ाधड़ हिंदी में बोलती हैं आमोलिना सारम। उनके चेहरे पर उपजा भाव उनके आत्मविश्वास को दिखाता है। कुछ करने की बेचैनी और जिज्ञासा जनता के प्रति उनकी निष्ठा को। वह और मुखिया की तरह चमचमाती बोलेरो के आगे मुखिया लिखवा कर सड़कों पर धूल उड़ाती नहीं चलती। पैदल उन्हें गांव-गांव घूमते हर रोज देखा जा सकता है। आमोलिना के बारे में जो बातें पहले से जानकारी दी गयी थी, उनसे और उनके बारे में लोगों से बातचीत होने पर एक नयी धारणा बनती है। हमें बताया गया था कि आमोलिना सारम वह महिला है, जिन्हें चुनाव लड़ने के पहले पेंच-दर-पेंच का सामना करना पड़ा था। पेंच इतने फंसाये गये थे कि उन्हें मानसिक तौर पर तोड़ देने की पूरी कोशिश की गयी थी। और जब तमाम पेंचों से निकल कर वह पंचायत की मुखिया बनीं, तो टूटने के बजाय मजबूती से एक मिसाल के रूप में सामने आयीं।
आमोलिना आदिवासी ईसाई हैं। उनके पति युनूस अंसारी मुसलमान। आमोलिना झारखंड में होनेवाले पहले पंचायत चुनाव में उतरने का मन पहले से ही बना चुकी थीं लेकिन जब उन्होंने इस दिशा में पहला कदम ही बढाया, तो उनके कुछ प्रतिद्वंद्वियों ने नामांकन से पहले जातिगत पेंच फंसा दिया। आमोलिना जिस पंचायत से जीती हैं, वह लोहरदगा जिले के किस्को प्रखंड का नवाडीह पंचायत है। यहीं से वो मुखिया चुनी गयी हैं। यह सीट अनुसूचित जनजाति व महिला आरक्षित सीट थी। निर्वाचन आयोग में जब लोगों ने शिकायत की, तो पहले उन्हें नामांकन करने से ही रोक दिया गया। फिर उन्होंने डीसी व एसडीओ को ज्ञापन दिया और कहा कि आखिर मेरी जाति क्या है, यह आपलोग ही तय कर दीजिए। मैं आखिर कैसे जिंदगी जीऊंगी। मेरे पास कोई तो जाति होनी चाहिए। आखिर एक मुसलमान से शादी करना गुनाह है क्या? बाद में उन्हें कहा गया कि चूंकि आपने आदिवासी समाज में जन्म लिया है और यह मातृसत्तात्मक समाज है, इसलिए आपकी पहचान आदिवासी के रूप में ही है। सर्टिफिकेट मिलने के बाद उन्होंने नामांकन किया। घर-घर जाकर लोगों से वोट मांगने के बजाय आमोलिना ने यह बताना शुरू किया कि वोट कैसे डालते हैं। खुद के चुनने या नहीं चुनने का निर्णय मतदाताओं पर ही छोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि जिले में आमोलिना ने रिकार्ड मत हासिल किया। उन्हें मुखिया पद के लिए 10 वोट मिले। उनकी प्रतिद्वंद्वी राजमुनी उरांव को 600 के करीब मत मिले।
आमोलिना कहती हैं, अब वह सब पुरानी बातें हुईं। मैं जानती थी कि मैंने खुद को समाज में, समाज के लिए खपाया है तो मुझे जीतने से कोई नहीं रोक सकता। अब जाति का पेंच फंसानेवालों का क्या किया जा सकता है? वह कहती हैं कि अब मैं पीछे मुड़कर नहीं देखती न देखना चाहती। मेरी चिंता यह है कि मेरे पास फंड नहीं है और काम इतना पड़ा है कि पूछिए मत। लोगों के पास उम्मीदों का सैलाब है और मेरे पास चुटकी भर संसाधन। सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए। सिर्फ चुनाव कराने से नहीं होगा।
ऐसा नहीं कि आमोलिना सिर्फ यह सब बोलकर किसी सामान्य नेता की तरह लंबी-लंबी बातें करने और दूसरे पर दोष थोप अपनी नाकामियों को छुपा लेने की कला दिखा रही होती हैं बल्कि वह अहले सुबह से देर रात तक समस्या और समाधान की तरकीबों की दुनिया में रहती और जीती भी हैं। वह घर-घर और दफ्तर-दफ्तर जाकर समस्याएं सुनती हैं। यथासंभव दूर करवाने की कोशिश करती हैं। उनके आंख खोलने से पहले ही उनके घर पर आनेवालों का तांता लगना शुरू हो जाता है। हर सुबह आमोलिना के मिट्टी वाले छोटे खपरैल घर में जनता दरबार की तरह मजमा लगता है। वह बड़े धैर्य से एक-एक कर लोगों की समस्याएं सुनती हैं।
आमोलिना कहती हैं, मुझसे अपने दायरे में जितना संभव होता है, उतना करने की कोशिश कर रही हूं लेकिन मुझे पता है कि बदलाव की कोशिशें पंचायत स्तर से ही कामयाब होगी और बिगड़ाव की गुंजाइश भी सबसे ज्यादा यहीं रहती है। वह कहती हैं कि मैं बचपन से ही आर्थिक और सामाजिक संघर्ष करती आयी हूं, आगे भी करती रहूंगी। लोग चुनाव जीतते ही गाड़ी और बॉडीगार्ड खोजने लगते हैं, पर मैं किसी से नहीं डरती और न कोई सुविधा खोजती हूं। मैं सिर्फ और सिर्फ काम में भरोसा करती हूं और इसीलिए मीलों पैदल ही निकल पड़ती हूं।
आमोलिना पहले नवा विहान में पढ़ाती थी। टीसीडीएस नाम की संस्था भी चलाती थी। लेकिन अब सिर्फ जनता के बीच समय देती हूं और जिन उम्मीदों के लिए चुनी गयी हूं, उसी पर ध्यान केंद्रित करती हूं। अब हमने कार्यकारी समिति का समूह भी बनाया है और और हर महीने की पांच तारीख को ग्रामसभा में बैठक होती है। यहीं तय होता है कि आगे क्या करना है। चुनाव के छह महीने बाद तक तो कोई पावर ही नहीं था लेकिन अब हमने अपने पंचायत के सभी वृद्धों को, विधवाओं और विकलांगों को चिन्हित कर उनके पेंशन की व्यवस्था करवा दी है। इसमें उन्हें 400 रुपये प्रति माह अब मिलेंगे तो थोड़ी सुविधा होगी उन्हें। केंद्र से 22 इंदिरा आवास बनवाने के लिए राशि देने की बात है, तो हमने ग्रामसभा से चयनित करवा कर लिस्ट भेज दी है। अब उनके लिए आवास आवंटित करवाऊंगी। आपदा प्रबंधन से दो लाख मिले थे, जिससे हमने चापानल, कुआं मरम्मती करवायी है। टीआरडीएस का जो फंड 4 लाख 84 हजार आया था, उससे पंचायत का समान खरीदा है। कुर्सी, टेबल, दरी, कंप्यूटर, आलमीरा आदि।
आमोलिना जो कहती हैं, वह कोरी बात भी नहीं होती। इस बार की बारिश में झारखंड में मनरेगा के तहत बने कुएं करीब-करीब भरभरा गये।
लेकिन उनके यहां बत्तीसों कुएं एक इंच भी नहीं धंसे। आमोलिना ने चार तालाबों से मनरेगा के तहत मिट्टी निकलवाने का काम करवाया। वह कहती हैं कि मैं मानती हूं कि मनरेगा सिर्फ टाइम पास रोजगार योजना नहीं बल्कि यह सृजन का भी बड़ा जरिया है। वही कोशिश कर रही हूं। अगर कुछ और फंड आये, तो मैं अपने पंचायत को आदर्श पंचायत के रूप में स्थापित कर दूंगी। यह वादा नहीं, दावा है।
नवाडीह पंचायत में नीनी, नवाडीह, नारी, दुरहुल सरना टोली आदि गांव हैं। इस पंचायत में साझा संस्कृति-धर्म वाले बाशिंदे हैं। उरांव, मुलमान, ईसाई, सरना, हिंदू सब हैं। इलाके में 4000 वोटर हैं। आबादी करीब 10,000 है। परिवार लगभग 2000 हैं। हालांकि नवाडीह में स्कूलों की संख्या तो आठ है लेकिन सड़कों के अभाव में बच्चों को कीचड़ से ही गुजर कर जाना पड़ता है। प्रखंड मुख्यालय जाना हो तो नदी-नाले पार करने पड़ते हैं। नवाडीह के एक स्कूल को जमीन नहीं मिलने के कारण दिक्कत हो रही है। साढ़े तीन लाख रुपये आये थे लेकिन लौट गये। यदि जमीन मिल जाती तो कक्षाएं, चापानल, शौचालय आदि बन पाता। मैं कोशिश करूंगी कि वह करवा दूं। जनता दबाव बनाती है, पर मेरे हाथ बंधे होने के कारण मैं कुछ नहीं कर पाती, जितना मुझे करना चाहिए। हम सवाल करते हैं, तो घर कैसे संभालती हैं? जवाब मिलता है थोड़ा उसके साथ भी समझौता करना पड़ता है। लेकिन इतनी व्यस्तता के बावजूद मैं घर का सारा काम करती हूं और आधा घंटा समय बच्चों को पढ़ाने में जरूर लगाती हूं। मैं गरीब परिवार से रही हूं। बचपन से ही संघर्ष किया है, परेशानियां झेली हैं।
आमोलिना की छोटी-छोटी मुश्किलें हैं लेकिन वह बड़े अभियान की तैयारी में भी लगी हुई हैं। उसने पाखर माइंस में मजदूरों की बहाली करवाने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया हैं। वह कहती हैं, यहां हिंडालको 60 वर्षों से खनन कर रहा है। लेकिन किसी को काम पर नहीं रखा। हम चाहते हैं कि जो पत्तल, दातुन और लकड़ी बेचते हैं, उन्हें नौकरी मिले। जो आदिवासी लड़कियां भट्ठे में काम करती हैं या बेच दी जाती हैं, उनके लिए भी कुछ हो…
(झारखंड सरकार के मीडिया फेलोशिप के तहत लिखा गया लेख)
Friday, December 30, 2011
छोटी-छोटी रेखाओं ने बदल दी परंपरा!
♦ अनुपमा
झारखंड की राजधानी रांची से निकलकर पुरुलिया जाने के रास्ते में झालदा ब्लॉक पड़ता है। झारखंड से बिलकुल सटा हुआ। जिला है पुरुलिया। इसी ब्लॉक में एक सुदूरवर्ती गांव है बोड़ारोला। पुरुलिया जिले के अन्य गांवों की तरह ही यह गांव भी है। घोर गरीबी, अशिक्षा की जकड़नवाला गांव। बीड़ी मजदूरों का गांव।
इसी गांव में मुलाकात हुई थी रेखा कालिंदी से। 14 साल की रेखा कालिंदी समुदाय से आती है। दो साल पहले रेखा ने उस गांव में क्रांति का जो बीज बोया, आज उसकी फसल उस पूरे निर्जन इलाके में काटी जा रही है। हुआ यह था कि रेखा की शादी उसके निर्धन पिता ने 12 साल की उम्र में ही तय करने को सोची। इसकी भनक रेखा को भी लगी। 12 साल की रेखा सामने आ गयी और बोली ऐसा नहीं हो सकता। अभी वह शादी नहीं करेगी। कालिंदी समुदाय की परंपरा के खिलाफ उठाया गया यह कदम था। रेखा को डांट फटकार मिली लेकिन वह नहीं मानी। उसने न कह दिया, तो उसका मतलब न ही हुआ। रेखा की घरवाले तो फिर भी जबरिया उसकी शादी करने पर तुले ही हुए थे लेकिन उसने मोबाइल फोन से पुरुलिया के लेबर कमिश्नर तक यह बात पहुंचा दी और फिर उसकी शादी रुक गयी।
रेखा को देखते ही यह सवाल जेहन में उठा कि क्या होता यदि रेखा की शादी हो ही गयी होती! आखिर उस समुदाय मे और इलाके में पीढ़ियों से ऐसा ही होता रहा है। रेखा की बड़ी बहन की शादी भी तो उसी उम्र में हो गयी थी। तीन साल में उसने चार बच्चों को भी जन्म दे दिया था लेकिन एक भी बच्चे को बचा नहीं सकी थी। रेखा कहती हैं, अपनी दीदी को देखकर ही तो मैं सिहर गयी थी और तय भी कर चुकी थी कि मेरी बारी आएगी तो ऐसा नहीं होने दूंगी। सबसे गौर करनेवाली बात यह है कि ऐसा रेखा ने सिर्फ अपने साथ नहीं किया। अपने साथ हमेशा परछाईं की तरह रहनेवाली चचेरी बहन बुधुमनी की शादी भी रेखा ने रुकवायी और फिर उसके बाद एक-एक कर अपने ही घर-परिवार की 21 लड़कियों की शादी 18 की उम्र के बाद ही करवाने के लिए रेखा ने सबको मानसिक तौर पर तैयार किया। साथ ही यह शादी रोको अभियान को पढ़ाई से भी जोड़ा। रेखा के घर की सभी लड़कियां, जो दिन भर घर में बीड़ी बनाने के कारोबार में लगी रहती थीं या वही करना उनकी नियति थी, वे स्कूल जाने लगीं और रेखा के यहां के लड़कियों की नियति यह नहीं रही कि जो जितनी तेजी से बीड़ी बनाएगा, उसकी शादी उतनी ही अच्छी होगी और उतनी ही जल्दी भी।
रेखा के इस अभियान की धमक घर की चहारदीवारी से बाहर निकलकर गांव के पुष्पा, सोना जैसी कई लड़कियों को प्रभाव में ले चुकी तो फिर बीड़ी छोड़ो, शादी तोड़ो अभियान का असर आसपास के गांवों में भी तेजी से होने लगा। बोड़ारोला के पास ही कुम्हारपाड़ा, कर्मकार पाड़ा के बाद झालदा, कोटशिला से पुरुलिया तक इस अभियान का क्रमशः असर हुआ। बहुत बड़े स्तर पर न सही तो बहुत छोटा दायरा भी नहीं रहा। दायरा इस मायने में भी बड़ा रहा कि इससे बीड़ी को ही जिंदगी की कसौटी मान लेने का मिथ टूटा, लड़कियों का पढ़ाई से वास्ता जुड़ा और अब कई घर में कई ऐसी लड़कियां मिलती हैं, जो स्कूल के वक्त स्कूल जरूर जाती हैं। अच्छी शादी के लिए बीड़ी पर दिन-रात हाथ नहीं फेरतीं। असर का एक नमूना तो रेखा कालिंदी के घर काफी देर बैठने के बाद विदा लेते हुए साफ दिखा।
विदा होते समय रेखा कहती है, दीदी, मैं टीचर बनना चाहती हूं। फिर धीरे से शरमाती हुई बुधनी भी दोहराती है, दीदी मैं भी टीचर ही बनना चाहती हूं। फिर एक के बाद एक पुष्पा, सोना आदि की तेज आवाज आती है, मैं भी, मैं भी…
बीड़ी के साथ जिंदगी गुजारने की नियति के साथ पैदा हुई बोड़ारोला की कई लड़कियां टीचर बनना चाहती हैं। रेखा कालिंदी के पिता कहते हैं, हम भी कोई शौक से थोड़े ही बचपन में ब्याहते थे इन्हें या बीड़ी में लगा देते थे, हमारी भी मजबूरी समझिए … लेकिन अब रेखा ने जो रेखा खींची है, वही हमारे परिवार की नयी परंपरा होगी।
झारखंड की राजधानी रांची से निकलकर पुरुलिया जाने के रास्ते में झालदा ब्लॉक पड़ता है। झारखंड से बिलकुल सटा हुआ। जिला है पुरुलिया। इसी ब्लॉक में एक सुदूरवर्ती गांव है बोड़ारोला। पुरुलिया जिले के अन्य गांवों की तरह ही यह गांव भी है। घोर गरीबी, अशिक्षा की जकड़नवाला गांव। बीड़ी मजदूरों का गांव।
इसी गांव में मुलाकात हुई थी रेखा कालिंदी से। 14 साल की रेखा कालिंदी समुदाय से आती है। दो साल पहले रेखा ने उस गांव में क्रांति का जो बीज बोया, आज उसकी फसल उस पूरे निर्जन इलाके में काटी जा रही है। हुआ यह था कि रेखा की शादी उसके निर्धन पिता ने 12 साल की उम्र में ही तय करने को सोची। इसकी भनक रेखा को भी लगी। 12 साल की रेखा सामने आ गयी और बोली ऐसा नहीं हो सकता। अभी वह शादी नहीं करेगी। कालिंदी समुदाय की परंपरा के खिलाफ उठाया गया यह कदम था। रेखा को डांट फटकार मिली लेकिन वह नहीं मानी। उसने न कह दिया, तो उसका मतलब न ही हुआ। रेखा की घरवाले तो फिर भी जबरिया उसकी शादी करने पर तुले ही हुए थे लेकिन उसने मोबाइल फोन से पुरुलिया के लेबर कमिश्नर तक यह बात पहुंचा दी और फिर उसकी शादी रुक गयी।
रेखा को देखते ही यह सवाल जेहन में उठा कि क्या होता यदि रेखा की शादी हो ही गयी होती! आखिर उस समुदाय मे और इलाके में पीढ़ियों से ऐसा ही होता रहा है। रेखा की बड़ी बहन की शादी भी तो उसी उम्र में हो गयी थी। तीन साल में उसने चार बच्चों को भी जन्म दे दिया था लेकिन एक भी बच्चे को बचा नहीं सकी थी। रेखा कहती हैं, अपनी दीदी को देखकर ही तो मैं सिहर गयी थी और तय भी कर चुकी थी कि मेरी बारी आएगी तो ऐसा नहीं होने दूंगी। सबसे गौर करनेवाली बात यह है कि ऐसा रेखा ने सिर्फ अपने साथ नहीं किया। अपने साथ हमेशा परछाईं की तरह रहनेवाली चचेरी बहन बुधुमनी की शादी भी रेखा ने रुकवायी और फिर उसके बाद एक-एक कर अपने ही घर-परिवार की 21 लड़कियों की शादी 18 की उम्र के बाद ही करवाने के लिए रेखा ने सबको मानसिक तौर पर तैयार किया। साथ ही यह शादी रोको अभियान को पढ़ाई से भी जोड़ा। रेखा के घर की सभी लड़कियां, जो दिन भर घर में बीड़ी बनाने के कारोबार में लगी रहती थीं या वही करना उनकी नियति थी, वे स्कूल जाने लगीं और रेखा के यहां के लड़कियों की नियति यह नहीं रही कि जो जितनी तेजी से बीड़ी बनाएगा, उसकी शादी उतनी ही अच्छी होगी और उतनी ही जल्दी भी।
रेखा के इस अभियान की धमक घर की चहारदीवारी से बाहर निकलकर गांव के पुष्पा, सोना जैसी कई लड़कियों को प्रभाव में ले चुकी तो फिर बीड़ी छोड़ो, शादी तोड़ो अभियान का असर आसपास के गांवों में भी तेजी से होने लगा। बोड़ारोला के पास ही कुम्हारपाड़ा, कर्मकार पाड़ा के बाद झालदा, कोटशिला से पुरुलिया तक इस अभियान का क्रमशः असर हुआ। बहुत बड़े स्तर पर न सही तो बहुत छोटा दायरा भी नहीं रहा। दायरा इस मायने में भी बड़ा रहा कि इससे बीड़ी को ही जिंदगी की कसौटी मान लेने का मिथ टूटा, लड़कियों का पढ़ाई से वास्ता जुड़ा और अब कई घर में कई ऐसी लड़कियां मिलती हैं, जो स्कूल के वक्त स्कूल जरूर जाती हैं। अच्छी शादी के लिए बीड़ी पर दिन-रात हाथ नहीं फेरतीं। असर का एक नमूना तो रेखा कालिंदी के घर काफी देर बैठने के बाद विदा लेते हुए साफ दिखा।
विदा होते समय रेखा कहती है, दीदी, मैं टीचर बनना चाहती हूं। फिर धीरे से शरमाती हुई बुधनी भी दोहराती है, दीदी मैं भी टीचर ही बनना चाहती हूं। फिर एक के बाद एक पुष्पा, सोना आदि की तेज आवाज आती है, मैं भी, मैं भी…
बीड़ी के साथ जिंदगी गुजारने की नियति के साथ पैदा हुई बोड़ारोला की कई लड़कियां टीचर बनना चाहती हैं। रेखा कालिंदी के पिता कहते हैं, हम भी कोई शौक से थोड़े ही बचपन में ब्याहते थे इन्हें या बीड़ी में लगा देते थे, हमारी भी मजबूरी समझिए … लेकिन अब रेखा ने जो रेखा खींची है, वही हमारे परिवार की नयी परंपरा होगी।
साल भर का इंतजार, महीने भर का काम, कौड़ियों के भाव
♦ अनुपमा
नया साल जश्न का माहौल लेकर आता है। नये सिरे से अपनी प्राथमिकताओं को तय करने का अवसर भी होता है यह। बीड़ी पत्ता मजदूरों के लिए भी यह अवसर एक खास किस्म की खुशी का भाव लेकर आता है। उम्मीदों की लहर पर सवार होकर आता है। यह खुशी किसी जश्न के माहौल से नहीं उपजता बल्कि हर साल नये वर्ष के आगमन पर हजारों बीड़ी मजदूरों के मन में कुछ दिनों के काम की आस जगती है। उसी कुछ दिन पर उनके परिवार का पूरा साल गुजर-बसर करता है।
यह वह समय होता है, जब सरकार की ओर से केंदु पत्ता के जंगलों की नीलामी होती है। वन विभाग की ओर से नीलामी की प्रक्रिया शुरू होते ही आस-पास की महिलाएं अपने काम के लिए नाम लिखवाने पहुंचने लगती हैं। नीलामी होने के बाद ठेकेदार 25 फीसदी रकम वन विभाग को दे देते हैं और जंगलों की साफ-तराशी करवाते हैं। ऐसा पेड़ों में ज्यादा नयी पत्तियां निकलवाने के लिए किया जाता है। साफ तराशी के लगभग चार महीने बाद महिला मजदूरों का काम शुरू होता है। केंदू पत्ता को तोड़ना शुरू किया जाता है। नये साल की सौगात पर उम्मीद व टकटकी लगाये बैठी हजारों महिलाओं को एक महीने का रोजगार मिल जाता है।
महिलाएं सबसे ज्यादा खपती हैं, वैसे सहभागिता पूरे परिवार की होती है। यह संख्या कोई मामूली नहीं। सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो राज्य में लगभग 70,000 लोग केंदू पत्ता तोड़ने का काम करते हैं। यह सरकारी आंकड़ा है, अगर सही मायने में देखें तो यह संख्या लाख को भी पार कर जाता है।
यह तो मोटे तौर पर काम मिलने और उसकी प्रारंभिक प्रक्रिया की बात हुई लेकिन इतना हो जाने के बाद ही बीड़ी मजदूरों की दशा-दुर्दशा की कहानी शुरू होती है। बानगी के तौर पर देखें, तो वन विभाग मजदूरों के कल्याण के नाम पर हर परिवार को एक जोड़ी चप्पल और स्वास्थ्य बीमा कराये जाने की बात कहता है लेकिन कुछ लोगों को छोड़ दें तो शायद ही यह सुविधा किसी परिवार को मयस्सर हुई हो। यूं भी परिवार पर एक जोड़ी चप्पल का गणित समझ से परे की बात है।
अब मेहनताना में शोषण कथा की बानगी पर गौर करें। प्रति 50, 000 पत्तियों को तोड़ने, सुखाने और फिर उसे फांड़ी में पहुंचाने की कीमत मात्र 90 रुपये है। दिनभर कड़ी धूप में मेहनत करके पत्तियों को तोड़ने के बाद महिलाएं उसे अपने 50-50 पत्तियों का एक पोला बनाती हैं और उसे या तो जंगल की पहाड़ियों पर या फिर घर के पास के मैदान में सुखाने के लिए छोड़ देती हैं। सुखाने के बाद वे सरकार की ओर से बने संग्रह केंद्र यानि फांड़ी तक सर पर ढोकर लाती हैं। सरकार इस घोषणा और योजना को उपलब्धियों के तौर पर बताती हैं लेकिन इस प्रक्रिया में महिला मजदूरों की दुर्दशा देखकर रोना आएगा। ये महिलाएं सुदूर जंगलों में 10-15 किलोमीटर की यात्रा कर पत्तियां तोड़ने का काम करती हैं। जाहिर सी बात है, यह काम शौकिया तौर पर नहीं होता बल्कि कर्ज में डूबे हुए परिवार मजबूरी में इस कदर कमरतोड़ मेहनत करते हैं। ऐसा करने के क्रम में अधिकतर महिलाओं का शरीर बीमारियों का घर हो जाता है। कई बार तो गर्भपात तक हो जाने की शिकायत मिलती है। कभी पत्तियों के रसायन की वजह से तो कभी जंगलों के खतरनाक व दुर्गम रास्तों की वजह से। पत्तियों का काम खत्म होने के बाद महिलाएं बैग या बोरी में पत्तियों को बांधने का काम करती हैं। एक मानक बोरे में लगभग 50 हजार पत्तियां होती हैं। पोला के हिसाब से देखें तो यह संख्या एक हजार की होती है। फिर इन बैगों का गट्ठा बनाया जाता है।
ऐसी ही दुरूह प्रक्रिया के बाद बीड़ी बनाने का कच्चा माल तैयार हो पाता है। इसके बारे में जब वन विभाग के प्रबंध निदेशक बी आर रल्लन से बात होती है, तो वे कहते हैं कि हमारा विभाग ही राज्य में ऐसा है, जो खनन के बाद सबसे ज्यादा राजस्व लाभ पहुंचाता है। हम अगले वर्ष से मजदूरों के लिए तीन तरह की सुविधाएं देने जा रहे हैं। वे कहते हैं इन लोगों के स्वास्थ्य का ख्याल रखते हुए ही हम लोग स्वास्थ्य कैंप भी लगाते हैं लेकिन कैंप तक महिलाएं कम ही पहुंचती हैं, इसलिए इस काम में लगी महिलाओं को लाभ नहीं मिल पाता।
स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ रिचा बताती हैं कि इस काम में जुड़ी महिलाओं का स्वास्थ्य खराब होना और उससे गर्भपात होना सामान्य-सी बात है। वन विभाग के अधिकारी राजस्व में नंबर दो होने को उपलब्धि के तौर पर बताते हैं लेकिन जिनके दम पर यह राजस्व का खेल होता है, वह आहिस्ते-आहिस्ते अपनी मौत मर रहे हैं। ठेका लेनेवालों की स्थिति भी कम भयावह नहीं है। वे लोग अपना ही दुखड़ा रोते नजर आये। चाईबासा और गो़ड्डा समेत कई जिलों में बीड़ी पत्ते का ठेका लेनेवाले ज्ञानेश्वर पांडे बताते हैं कि सरकार और माओवादियों के कारण सिर्फ पुराने खिलाड़ी ही इस व्यवसाय में टिक पाते हैं। सरकार ने इस वर्ष प्रति मानक बोरा 650 रुपये तय किया है। इसमें से 90 रुपये बीड़ी पत्ता तोड़ने वालों को फिर लोडिंग करनेवालों को और उसके बाद माओवादियों को। हर बोरे के हिसाब से माओवादियों को कम से कम 70 रुपये तो देने ही पड़ते हैं। इसके अलावा दूसरी तरह की वसूली भी वे करते हैं। लेवी का एक बड़ा हिस्सा माओवादियों का इसी से जाता है। कई बार तो माओवादी कारोबार का एक बड़ा हिस्सा लेवी के नाम पर वसूल लेते हैं। इस बात की पुष्टि बीबीसी के डेनियल लेक भी करते हैं।
एक शोध के अनुसार वे बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में माओवादियों को लगभग 40 फीसदी लेवी इसी से आता है। सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार गोकुल बसंत कहते हैं कि झारखंड में 40 फीसदी तो नहीं लेकिन कुल कारोबार का 15 से 20 फीसदी माओवादियों की ही जेब में जाता है। चूंकि केंदू पत्ता का व्यवसाय जंगलों से जुड़ा हुआ है और बिना उनकी अनुमति के वहां से एक पत्ता भी नहीं टूट सकता है, इसलिए माओवादी अपनी मनमर्जी करते हैं। यदि सरकारी आंकड़ों को ही सच मान लें तो इस वर्ष 56 करोड़ से ज्यादा का व्यवसाय हुआ है। यदि इसका बीस फीसदी भी माओवादियों की जेब में गया है तो यह आंकड़ा 11 करोड़ को पार कर जाता है। ज्ञानेश्वर बताते हैं कि माओवादियों की सहमति के बिना एक पत्ता भी नहीं टूट सकता। यदि कोई नया व्यवसायी इस क्षेत्र में आता है तो उसे सिर्फ घाटा ही मिलेगा क्योंकि उनसे कई संगठन पैसे की वसूली करने लगते हैं।
वे बताते हैं कि कि 1988-89 में जिन लोगों ने इसका व्यवसाय किया, वे फायदे में रहे। उस समय इसे आप हरा सोना कह सकते थे। लेकिन धीरे-धीरे पत्तियां और जंगल कम होने लगे और पत्तियों का दाम बढ़ने लगा। वसूली के लिए ही माओवादियों के नाम पर कई संगठन खड़े हो गये हैं। स्थानीय निवासी महेंद्र और उप प्रबंधक मनीष भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि माओवादियों के खौफ से यह सब कम हो रहा है। दबी जुबान से वे बताते हैं कि हम तो नीलामी करके निश्चिंत हो जाते हैं पर ठेकेदारों को झेलना पड़ता है। वे खुल कर तो बहुत नहीं बोलते लेकिन इशारों में ही इस बात को बताते हैं कि जंगल, ठेकेदार माओवादी, केंदू पत्ता और लेवी सबकी परस्पर निर्भरता है।
नया साल जश्न का माहौल लेकर आता है। नये सिरे से अपनी प्राथमिकताओं को तय करने का अवसर भी होता है यह। बीड़ी पत्ता मजदूरों के लिए भी यह अवसर एक खास किस्म की खुशी का भाव लेकर आता है। उम्मीदों की लहर पर सवार होकर आता है। यह खुशी किसी जश्न के माहौल से नहीं उपजता बल्कि हर साल नये वर्ष के आगमन पर हजारों बीड़ी मजदूरों के मन में कुछ दिनों के काम की आस जगती है। उसी कुछ दिन पर उनके परिवार का पूरा साल गुजर-बसर करता है।
यह वह समय होता है, जब सरकार की ओर से केंदु पत्ता के जंगलों की नीलामी होती है। वन विभाग की ओर से नीलामी की प्रक्रिया शुरू होते ही आस-पास की महिलाएं अपने काम के लिए नाम लिखवाने पहुंचने लगती हैं। नीलामी होने के बाद ठेकेदार 25 फीसदी रकम वन विभाग को दे देते हैं और जंगलों की साफ-तराशी करवाते हैं। ऐसा पेड़ों में ज्यादा नयी पत्तियां निकलवाने के लिए किया जाता है। साफ तराशी के लगभग चार महीने बाद महिला मजदूरों का काम शुरू होता है। केंदू पत्ता को तोड़ना शुरू किया जाता है। नये साल की सौगात पर उम्मीद व टकटकी लगाये बैठी हजारों महिलाओं को एक महीने का रोजगार मिल जाता है।
महिलाएं सबसे ज्यादा खपती हैं, वैसे सहभागिता पूरे परिवार की होती है। यह संख्या कोई मामूली नहीं। सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो राज्य में लगभग 70,000 लोग केंदू पत्ता तोड़ने का काम करते हैं। यह सरकारी आंकड़ा है, अगर सही मायने में देखें तो यह संख्या लाख को भी पार कर जाता है।
यह तो मोटे तौर पर काम मिलने और उसकी प्रारंभिक प्रक्रिया की बात हुई लेकिन इतना हो जाने के बाद ही बीड़ी मजदूरों की दशा-दुर्दशा की कहानी शुरू होती है। बानगी के तौर पर देखें, तो वन विभाग मजदूरों के कल्याण के नाम पर हर परिवार को एक जोड़ी चप्पल और स्वास्थ्य बीमा कराये जाने की बात कहता है लेकिन कुछ लोगों को छोड़ दें तो शायद ही यह सुविधा किसी परिवार को मयस्सर हुई हो। यूं भी परिवार पर एक जोड़ी चप्पल का गणित समझ से परे की बात है।
अब मेहनताना में शोषण कथा की बानगी पर गौर करें। प्रति 50, 000 पत्तियों को तोड़ने, सुखाने और फिर उसे फांड़ी में पहुंचाने की कीमत मात्र 90 रुपये है। दिनभर कड़ी धूप में मेहनत करके पत्तियों को तोड़ने के बाद महिलाएं उसे अपने 50-50 पत्तियों का एक पोला बनाती हैं और उसे या तो जंगल की पहाड़ियों पर या फिर घर के पास के मैदान में सुखाने के लिए छोड़ देती हैं। सुखाने के बाद वे सरकार की ओर से बने संग्रह केंद्र यानि फांड़ी तक सर पर ढोकर लाती हैं। सरकार इस घोषणा और योजना को उपलब्धियों के तौर पर बताती हैं लेकिन इस प्रक्रिया में महिला मजदूरों की दुर्दशा देखकर रोना आएगा। ये महिलाएं सुदूर जंगलों में 10-15 किलोमीटर की यात्रा कर पत्तियां तोड़ने का काम करती हैं। जाहिर सी बात है, यह काम शौकिया तौर पर नहीं होता बल्कि कर्ज में डूबे हुए परिवार मजबूरी में इस कदर कमरतोड़ मेहनत करते हैं। ऐसा करने के क्रम में अधिकतर महिलाओं का शरीर बीमारियों का घर हो जाता है। कई बार तो गर्भपात तक हो जाने की शिकायत मिलती है। कभी पत्तियों के रसायन की वजह से तो कभी जंगलों के खतरनाक व दुर्गम रास्तों की वजह से। पत्तियों का काम खत्म होने के बाद महिलाएं बैग या बोरी में पत्तियों को बांधने का काम करती हैं। एक मानक बोरे में लगभग 50 हजार पत्तियां होती हैं। पोला के हिसाब से देखें तो यह संख्या एक हजार की होती है। फिर इन बैगों का गट्ठा बनाया जाता है।
ऐसी ही दुरूह प्रक्रिया के बाद बीड़ी बनाने का कच्चा माल तैयार हो पाता है। इसके बारे में जब वन विभाग के प्रबंध निदेशक बी आर रल्लन से बात होती है, तो वे कहते हैं कि हमारा विभाग ही राज्य में ऐसा है, जो खनन के बाद सबसे ज्यादा राजस्व लाभ पहुंचाता है। हम अगले वर्ष से मजदूरों के लिए तीन तरह की सुविधाएं देने जा रहे हैं। वे कहते हैं इन लोगों के स्वास्थ्य का ख्याल रखते हुए ही हम लोग स्वास्थ्य कैंप भी लगाते हैं लेकिन कैंप तक महिलाएं कम ही पहुंचती हैं, इसलिए इस काम में लगी महिलाओं को लाभ नहीं मिल पाता।
स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ रिचा बताती हैं कि इस काम में जुड़ी महिलाओं का स्वास्थ्य खराब होना और उससे गर्भपात होना सामान्य-सी बात है। वन विभाग के अधिकारी राजस्व में नंबर दो होने को उपलब्धि के तौर पर बताते हैं लेकिन जिनके दम पर यह राजस्व का खेल होता है, वह आहिस्ते-आहिस्ते अपनी मौत मर रहे हैं। ठेका लेनेवालों की स्थिति भी कम भयावह नहीं है। वे लोग अपना ही दुखड़ा रोते नजर आये। चाईबासा और गो़ड्डा समेत कई जिलों में बीड़ी पत्ते का ठेका लेनेवाले ज्ञानेश्वर पांडे बताते हैं कि सरकार और माओवादियों के कारण सिर्फ पुराने खिलाड़ी ही इस व्यवसाय में टिक पाते हैं। सरकार ने इस वर्ष प्रति मानक बोरा 650 रुपये तय किया है। इसमें से 90 रुपये बीड़ी पत्ता तोड़ने वालों को फिर लोडिंग करनेवालों को और उसके बाद माओवादियों को। हर बोरे के हिसाब से माओवादियों को कम से कम 70 रुपये तो देने ही पड़ते हैं। इसके अलावा दूसरी तरह की वसूली भी वे करते हैं। लेवी का एक बड़ा हिस्सा माओवादियों का इसी से जाता है। कई बार तो माओवादी कारोबार का एक बड़ा हिस्सा लेवी के नाम पर वसूल लेते हैं। इस बात की पुष्टि बीबीसी के डेनियल लेक भी करते हैं।
एक शोध के अनुसार वे बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में माओवादियों को लगभग 40 फीसदी लेवी इसी से आता है। सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार गोकुल बसंत कहते हैं कि झारखंड में 40 फीसदी तो नहीं लेकिन कुल कारोबार का 15 से 20 फीसदी माओवादियों की ही जेब में जाता है। चूंकि केंदू पत्ता का व्यवसाय जंगलों से जुड़ा हुआ है और बिना उनकी अनुमति के वहां से एक पत्ता भी नहीं टूट सकता है, इसलिए माओवादी अपनी मनमर्जी करते हैं। यदि सरकारी आंकड़ों को ही सच मान लें तो इस वर्ष 56 करोड़ से ज्यादा का व्यवसाय हुआ है। यदि इसका बीस फीसदी भी माओवादियों की जेब में गया है तो यह आंकड़ा 11 करोड़ को पार कर जाता है। ज्ञानेश्वर बताते हैं कि माओवादियों की सहमति के बिना एक पत्ता भी नहीं टूट सकता। यदि कोई नया व्यवसायी इस क्षेत्र में आता है तो उसे सिर्फ घाटा ही मिलेगा क्योंकि उनसे कई संगठन पैसे की वसूली करने लगते हैं।
वे बताते हैं कि कि 1988-89 में जिन लोगों ने इसका व्यवसाय किया, वे फायदे में रहे। उस समय इसे आप हरा सोना कह सकते थे। लेकिन धीरे-धीरे पत्तियां और जंगल कम होने लगे और पत्तियों का दाम बढ़ने लगा। वसूली के लिए ही माओवादियों के नाम पर कई संगठन खड़े हो गये हैं। स्थानीय निवासी महेंद्र और उप प्रबंधक मनीष भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि माओवादियों के खौफ से यह सब कम हो रहा है। दबी जुबान से वे बताते हैं कि हम तो नीलामी करके निश्चिंत हो जाते हैं पर ठेकेदारों को झेलना पड़ता है। वे खुल कर तो बहुत नहीं बोलते लेकिन इशारों में ही इस बात को बताते हैं कि जंगल, ठेकेदार माओवादी, केंदू पत्ता और लेवी सबकी परस्पर निर्भरता है।
बेटी- रोटी- जीवन की गाड़ी, सब चलती बीड़ी से…
♦ अनुपमा
बीड़ी का सामूहिक निर्माण होते हुए तो कई जगहों पर दिखा लेकिन यह एक नये किस्म का अनुभव था। पाकुड़ से राजमहल जाने के क्रम में बीच में मिले एक मंदिर में बहुत सारे लोग एक साथ बैठे हुए हैं। सूप में तंबाकू और बगल में तेंदू पत्ता। दनादन हाथ चल रहे हैं, बीड़ी बनती जा रही है और इस समूह के बीच में बैठा एक आदमी बांग्ला में कुछ संगीतमय पाठ कर रहा है। पूछने पर पता चलता है कि समूह के बीच में बैठा हुआ आदमी परवचनिया है, जो बांग्ला रामायण का पाठ कर रहा है। यहां ऐसा हर रोज होता है। जिनकी गप्पें लड़ाने की उम्र ढल गयी है, उनकी ढलती उम्र के साथ जीवन में आध्यात्मिकता का समावेश ज्यादा हो गया है, वे रोज सबेरे नहा धोकर मंदिर में अपने-अपने तेंदू पत्ता और तंबाकू लिये पहुंचते हैं। साथ ही कुछ कम उम्र लड़कियां भी पहुंचती हैं। परवचनिया बाबा भी आते हैं। फिर दिन भर प्रवचन चलता रहता है और उसी रफ्तार से बीड़ी का निर्माण भी होता रहता है। शाम को प्रवचन के एवज में बाबा को थोड़ी-बहुत दान-दक्षिणा मिल जाती है।
बेटी-रोटी के साथ जीवन के आध्यात्मिक पक्ष से भी बीड़ी का यह जुड़ाव झारखंड़ से सटे पुरुलिया जिले के कई इलाके में देखा जा सकता है। घर में महिलाएं दिन भर अकेले या अपनी हम उम्र महिलाओं के साथ बीड़ी बनाती हैं। बेटियां अपनी सहेलियों के साथ झुंड में बैठकर बीड़ी बनाने का काम करती हैं और लड़के केंदू पत्ता और तंबाकू का जुगाड़ करने में लगे रहते हैं। लड़कियों के बीच तो बीड़ी बनाओ प्रतियोगिता भी होती है, कि कौन कितनी तेजी में कितनी बीड़ी बना पाता है। जो जितनी तेजी से बीड़ी बना सकेगी, उसे जिंदगी में उतनी ही कम कठिनाई होगी। तेज हाथ चलने से अच्छे घर में शादी होगी। ससुराल में मान-सम्मान मिलेगा।
झारखंड और बंगाल के सीमावर्ती इलाके के अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र को इसी बीड़ी के जरिये समझा जा सकता है। बंगाल से ही सटे दूसरे जिले पाकुड़ में जाने पर आध्यात्मिकता की जगह यहां बीड़ी के कारोबार से अपराधशास्त्र का रिश्ता भी जुड़ जाता है। पाकुड़ को झारखंड में बीड़ी उद्योग का गढ़ माना जाता है। इस जिले में छह लाइसेंसी फैक्ट्रियां हैं लेकिन इन छह लाइसेंसी फैक्ट्रियों की आड़ में उससे करीब दो गुना फैक्ट्रियां बगैर किसी लाइसेंस के ही चलायी जाती है। एक अनुमान के मुताबिक करीबन 30 करोड़ रुपये का कारोबार प्रतिमाह इन फैक्ट्रियों से होता है। पाकुड़ के एक उद्योगपति बताते हैं कि लाइसेंसी उद्योग से कम से कम दो लाख बीडियां सिर्फ पाकुड़ से ही प्रतिदिन वैध रूप में कम से कम 2 लाख बीड़ियां सप्लाई की जाती हैं जबकि गैर लाउसेंसी फैक्ट्रियों से भी टीपी-3 फार्म भरकर वैध रूप से ही एक से डेढ़ लाख बीड़ियां रोज ही बाहर भेजी जाती हैं। इसके अलावा अवैध रूप से भी बीड़ियां बाहर जाती हैं। बगल में बंगाल है, तो वहां तो माल आसानी से जाता ही है लेकिन सबसे ज्यादा खपत आगरा, दिल्ली और आंध्रप्रदेश में है। लेकिन यह सब कंपनियों के कारोबार का हिसाब-किताब है। जो बीड़ी के साथ ही सोते-जागते हैं, उन्हें इस अर्थशास्त्र से ज्यादा मतलब नहीं। उन्हें तो सिर्फ जिलालत का जीवन ही नसीब ही होता है।
पाकुड़ में लगभग 60 प्रतिशत महिलाएं बीड़ी निर्माण में लगी हुई हैं। पिछड़े और अल्पसंख्यक बहुल इलाके में तो करीबन शत-प्रतिशत घर का चूल्हा ही बीड़ी की कमाई से जलता है। कंपनियों के लिए यह इलाका क्यों इस कदर पसंद का है, इसे समझने के लिए बीड़ी की मजदूरी को समझना होगा। कंपनियों द्वारा मजदूरों के घर खास कर महिला़ओं के पास कच्ची सामग्री पहुंचा दी जाती है और फिर प्रति हजार बीड़ी निर्माण पर 55 रुपये की मजदूरी दी जाती है। सरकार के श्रम विभाग ने प्रति हजार बीड़ी लगभग 89.50 रुपये तय की है लेकिन श्रम विभाग का आदेश कागज में अपनी जगह रहता है। पाकुड़ में बीड़ी मजदूरों पर काम करनेवाले पत्रकार कृपा सिंधु बच्चन की मानें, तो बाकी राशि मजदूर यूनियनों के सौजन्य से कुछ लोगों की जेब में जाती है। सबका हिस्सा यहां तय कर दिया गया है। अब यदि बीड़ी बनाने की रफ्तार को देखें तो लगातार आठ घंटे तक हाथ फेरते रहने पर एक हजार बीड़ी का निर्माण हो पाता है। यदि कोई दिन-रात बीड़ी-बीड़ी करता रहता है तो बमुश्किल 110 रुपये कमाई हो पाती है। बीड़ी बीमारियों को भी जन्म देता है, मजदूरों की जिंदगी को अकाल निगलता रहता है, फिर भी बीड़ी से ही जुड़े रहना यहां के मजदूरों की मजबूरी भी है। सबसे बड़ा कारण है रोजगार के लिए विकल्पों का अभाव। सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन यहां जमीन की बजाय कागज पर ही ज्यादा होता है। यही वजह है कि मनरेगा जैसी योजनाएं भी यहां लोगों में काम के प्रति ललक नहीं पैदा कर पाती हैं। इसकी बानगी आप मनरेगा में कार्यरत लोगों की संख्या से भी लगा सकते हैं। अगस्त माह का आकलन करें तो 16 तारीख तक मनरेगा में काम करनेवालों की संख्या 1007 है। जबकि जिले में काम करनेवालों के नाम जो पंजीकृत हैं उनकी संख्या 1,65,311 हैं। मनरेगा में काम न करने के बारे में पूछने पर शबाना बताती हैं कि एक बार काम करने जायेंगे तो बीड़ी का काम भी छूट जायेगा। भले ही इसमें काम के एवज में पैसे कम मिलते हैं लेकिन समय से पैसे तो मिल जाते है नं। मनरेगा में हर दिन का न तो पैसा मिलता है और न ही कभी समय पर भुगतान ही होता है। काम मांगने पर भी काम नहीं मिल पाता। दूसरी बात ये कि हर परिवार से सिर्फ एक ही व्यक्ति को काम मिलता है जबकि हमारी जरूरतें कहीं ज्यादा हैं और इसके लिए घर के हर सदस्य को काम करना पड़ता है। मजदूर यूनियन के नेता कृष्णकांतमंडल, माणिक दूबे, मोहम्मद इकबाल भी इस मसले को कारगर ढंग से नहीं उठाते हैं कि बीड़ी मजदूरों को नब्बे रुपये प्रति हजार की मजदूरी दी जाए।
इस बारे में वहां के ग्रामीण बताते हैं कि फैक्ट्री के मालिक उन्हें कमीशन देते हैं इसलिए वे हमारी बात को दमदार तरीके से नहीं रखते। लेकिन मजदूर यूनियन के नेताओं का कहना है कि बीड़ी उद्योग में चूंकि दंबगई और राजनीतिज्ञों की सांठ-गांठ है इसलिए हमारी बात वे नहीं सुनते। बात चाहे जो भी हो लेकिन पाकुड़ के इलामी, लखनपुर, कालीबाड़ी, इसमत कदमसार जैसे गांवों की महिलाओं और बीड़ी मजदूरों की बदहाली की सुधि कोई नहीं लेनेवाला और जब तक उन्हें उनका हक नहीं मिलेगा वे गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पायेंगे-बीड़ी के बड़े कारोबारी चाहते भी हैं कि यह चक्रव्यूह बना रहे ताकि कौड़ी के मोल मजदूर मिलते रहें।
बीड़ी का सामूहिक निर्माण होते हुए तो कई जगहों पर दिखा लेकिन यह एक नये किस्म का अनुभव था। पाकुड़ से राजमहल जाने के क्रम में बीच में मिले एक मंदिर में बहुत सारे लोग एक साथ बैठे हुए हैं। सूप में तंबाकू और बगल में तेंदू पत्ता। दनादन हाथ चल रहे हैं, बीड़ी बनती जा रही है और इस समूह के बीच में बैठा एक आदमी बांग्ला में कुछ संगीतमय पाठ कर रहा है। पूछने पर पता चलता है कि समूह के बीच में बैठा हुआ आदमी परवचनिया है, जो बांग्ला रामायण का पाठ कर रहा है। यहां ऐसा हर रोज होता है। जिनकी गप्पें लड़ाने की उम्र ढल गयी है, उनकी ढलती उम्र के साथ जीवन में आध्यात्मिकता का समावेश ज्यादा हो गया है, वे रोज सबेरे नहा धोकर मंदिर में अपने-अपने तेंदू पत्ता और तंबाकू लिये पहुंचते हैं। साथ ही कुछ कम उम्र लड़कियां भी पहुंचती हैं। परवचनिया बाबा भी आते हैं। फिर दिन भर प्रवचन चलता रहता है और उसी रफ्तार से बीड़ी का निर्माण भी होता रहता है। शाम को प्रवचन के एवज में बाबा को थोड़ी-बहुत दान-दक्षिणा मिल जाती है।
बेटी-रोटी के साथ जीवन के आध्यात्मिक पक्ष से भी बीड़ी का यह जुड़ाव झारखंड़ से सटे पुरुलिया जिले के कई इलाके में देखा जा सकता है। घर में महिलाएं दिन भर अकेले या अपनी हम उम्र महिलाओं के साथ बीड़ी बनाती हैं। बेटियां अपनी सहेलियों के साथ झुंड में बैठकर बीड़ी बनाने का काम करती हैं और लड़के केंदू पत्ता और तंबाकू का जुगाड़ करने में लगे रहते हैं। लड़कियों के बीच तो बीड़ी बनाओ प्रतियोगिता भी होती है, कि कौन कितनी तेजी में कितनी बीड़ी बना पाता है। जो जितनी तेजी से बीड़ी बना सकेगी, उसे जिंदगी में उतनी ही कम कठिनाई होगी। तेज हाथ चलने से अच्छे घर में शादी होगी। ससुराल में मान-सम्मान मिलेगा।
झारखंड और बंगाल के सीमावर्ती इलाके के अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र को इसी बीड़ी के जरिये समझा जा सकता है। बंगाल से ही सटे दूसरे जिले पाकुड़ में जाने पर आध्यात्मिकता की जगह यहां बीड़ी के कारोबार से अपराधशास्त्र का रिश्ता भी जुड़ जाता है। पाकुड़ को झारखंड में बीड़ी उद्योग का गढ़ माना जाता है। इस जिले में छह लाइसेंसी फैक्ट्रियां हैं लेकिन इन छह लाइसेंसी फैक्ट्रियों की आड़ में उससे करीब दो गुना फैक्ट्रियां बगैर किसी लाइसेंस के ही चलायी जाती है। एक अनुमान के मुताबिक करीबन 30 करोड़ रुपये का कारोबार प्रतिमाह इन फैक्ट्रियों से होता है। पाकुड़ के एक उद्योगपति बताते हैं कि लाइसेंसी उद्योग से कम से कम दो लाख बीडियां सिर्फ पाकुड़ से ही प्रतिदिन वैध रूप में कम से कम 2 लाख बीड़ियां सप्लाई की जाती हैं जबकि गैर लाउसेंसी फैक्ट्रियों से भी टीपी-3 फार्म भरकर वैध रूप से ही एक से डेढ़ लाख बीड़ियां रोज ही बाहर भेजी जाती हैं। इसके अलावा अवैध रूप से भी बीड़ियां बाहर जाती हैं। बगल में बंगाल है, तो वहां तो माल आसानी से जाता ही है लेकिन सबसे ज्यादा खपत आगरा, दिल्ली और आंध्रप्रदेश में है। लेकिन यह सब कंपनियों के कारोबार का हिसाब-किताब है। जो बीड़ी के साथ ही सोते-जागते हैं, उन्हें इस अर्थशास्त्र से ज्यादा मतलब नहीं। उन्हें तो सिर्फ जिलालत का जीवन ही नसीब ही होता है।
पाकुड़ में लगभग 60 प्रतिशत महिलाएं बीड़ी निर्माण में लगी हुई हैं। पिछड़े और अल्पसंख्यक बहुल इलाके में तो करीबन शत-प्रतिशत घर का चूल्हा ही बीड़ी की कमाई से जलता है। कंपनियों के लिए यह इलाका क्यों इस कदर पसंद का है, इसे समझने के लिए बीड़ी की मजदूरी को समझना होगा। कंपनियों द्वारा मजदूरों के घर खास कर महिला़ओं के पास कच्ची सामग्री पहुंचा दी जाती है और फिर प्रति हजार बीड़ी निर्माण पर 55 रुपये की मजदूरी दी जाती है। सरकार के श्रम विभाग ने प्रति हजार बीड़ी लगभग 89.50 रुपये तय की है लेकिन श्रम विभाग का आदेश कागज में अपनी जगह रहता है। पाकुड़ में बीड़ी मजदूरों पर काम करनेवाले पत्रकार कृपा सिंधु बच्चन की मानें, तो बाकी राशि मजदूर यूनियनों के सौजन्य से कुछ लोगों की जेब में जाती है। सबका हिस्सा यहां तय कर दिया गया है। अब यदि बीड़ी बनाने की रफ्तार को देखें तो लगातार आठ घंटे तक हाथ फेरते रहने पर एक हजार बीड़ी का निर्माण हो पाता है। यदि कोई दिन-रात बीड़ी-बीड़ी करता रहता है तो बमुश्किल 110 रुपये कमाई हो पाती है। बीड़ी बीमारियों को भी जन्म देता है, मजदूरों की जिंदगी को अकाल निगलता रहता है, फिर भी बीड़ी से ही जुड़े रहना यहां के मजदूरों की मजबूरी भी है। सबसे बड़ा कारण है रोजगार के लिए विकल्पों का अभाव। सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन यहां जमीन की बजाय कागज पर ही ज्यादा होता है। यही वजह है कि मनरेगा जैसी योजनाएं भी यहां लोगों में काम के प्रति ललक नहीं पैदा कर पाती हैं। इसकी बानगी आप मनरेगा में कार्यरत लोगों की संख्या से भी लगा सकते हैं। अगस्त माह का आकलन करें तो 16 तारीख तक मनरेगा में काम करनेवालों की संख्या 1007 है। जबकि जिले में काम करनेवालों के नाम जो पंजीकृत हैं उनकी संख्या 1,65,311 हैं। मनरेगा में काम न करने के बारे में पूछने पर शबाना बताती हैं कि एक बार काम करने जायेंगे तो बीड़ी का काम भी छूट जायेगा। भले ही इसमें काम के एवज में पैसे कम मिलते हैं लेकिन समय से पैसे तो मिल जाते है नं। मनरेगा में हर दिन का न तो पैसा मिलता है और न ही कभी समय पर भुगतान ही होता है। काम मांगने पर भी काम नहीं मिल पाता। दूसरी बात ये कि हर परिवार से सिर्फ एक ही व्यक्ति को काम मिलता है जबकि हमारी जरूरतें कहीं ज्यादा हैं और इसके लिए घर के हर सदस्य को काम करना पड़ता है। मजदूर यूनियन के नेता कृष्णकांतमंडल, माणिक दूबे, मोहम्मद इकबाल भी इस मसले को कारगर ढंग से नहीं उठाते हैं कि बीड़ी मजदूरों को नब्बे रुपये प्रति हजार की मजदूरी दी जाए।
इस बारे में वहां के ग्रामीण बताते हैं कि फैक्ट्री के मालिक उन्हें कमीशन देते हैं इसलिए वे हमारी बात को दमदार तरीके से नहीं रखते। लेकिन मजदूर यूनियन के नेताओं का कहना है कि बीड़ी उद्योग में चूंकि दंबगई और राजनीतिज्ञों की सांठ-गांठ है इसलिए हमारी बात वे नहीं सुनते। बात चाहे जो भी हो लेकिन पाकुड़ के इलामी, लखनपुर, कालीबाड़ी, इसमत कदमसार जैसे गांवों की महिलाओं और बीड़ी मजदूरों की बदहाली की सुधि कोई नहीं लेनेवाला और जब तक उन्हें उनका हक नहीं मिलेगा वे गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पायेंगे-बीड़ी के बड़े कारोबारी चाहते भी हैं कि यह चक्रव्यूह बना रहे ताकि कौड़ी के मोल मजदूर मिलते रहें।
होश की दुनिया का तमाशा
♦ अनुपमा
पिछले महीने निरमलिया की मौत हो गयी। भूखे-प्याासे आखिर कब तक वह मेहनत करती रहती? चिलचिलाती धूप में जंगल से लकड़ी काटना और फिर उसे बाज़ार में बेचना, उसकी दिनचर्या थी। इतनी कड़ी मेहनत के बाद भी निरमलिया अपने अर्धविक्षिउप्तम पति और पांच बच्चों का पेट कहां भर पाती थी। वह परिवार के अन्य सदस्योंे को तो कुछ खिला भी देती थी, पर खुद कई-कई दिनों तक भूखे रह जाती थी। आखिर यह सिलसिला कितने दिन चल सकता था… निरमलिया पलामू जिले के छतरपुर ब्लॉ क के सुशीगंज की रहनेवाली थी। दुर्भाग्यस यह है कि उसकी मौत, पलामू में भूख से हुई मौतों की फेहरिस्तर में भी शामिल नहीं हो पायी। क्यों कि ऐसा करते ही प्रसाशन के क्रिया-कलापों पर प्रश्न चिह्न लग जाता। जब हमने यह जानने की कोशिश की कि आखिर उसकी मौत कसे हुई है, तो ग्रामीणों ने बताया कि वह भूख से मरी है। उसके घर में अनाज का एक दाना भी नहीं था। परंतु उपायुक्त् डॉ अमिताभ कॉशल ने बताया कि मामले की जांच करायी गयी है और बीडीओ वहां गये थे। उनके अमुसार निरमलिया ने एक दिन पहले यानी की शनिवार 28 जून की रात को खाना खाया था। शव का पोस्ट मार्टम शायद घरवालों की इजाज़त न मिलने के कारण नहीं हो पाया हो। लेकिन यह हो भी जाता तो क्या् इसकी पुष्टि की जाती? शायद नहीं।
पलामू और सूखा का कुछ ऐसा मेल हो गया ह कि छुड़ाये नहीं छूट रहा। यह विडंबना ही है कि भूख से होनेवाली मौत के आगोश में समाने वाले 99 फीसदी लोग आदिवासी और दलित ही हैं। चाहे वह कोरबा जनजाति के हों, भूइंयां, बिरहोर या फिर अन्यआ। जब सरकार की 19 योजनाएं उनके उत्थायन के लिए चलायी जा रही हैं और सुखाड़ के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपये खर्च किये जा चुके हैं… फिर यह मौतें क्यों ? निरमलिया की मौत का काला सच भी शायद कभी सामने न आ पाये। गढ़वा की लेप्सीर की मौत भी कुछ इसी तरह हुई थी और प्रशासन ने उसे भूख से हुई मौत मानने से ही इनकार कर दिया था। परंतु मीडिया और कुछ प्रबुद्धजनों की कोशिशों के बाद उन्हेंौ यह मानना पड़ा था कि उसकी मौत भूख से ही हुई है। निरमलिया की मौत सिर्फ एक कॉलम की खबर बन पायी और शायद इसीलिए उसे इंसाफ नहीं मिल सका।
पलामू में इस बार फिर सुखाड़ ने दस्त क दी है। तभी तो सुखाड़ से खौफजदा किसान इच्छास मृत्युी के लिए हस्ता क्षर अभियान चला रहे हैं। 5000 किसानों ने तो हस्तादक्षर भी कर दिये हैं और 30,000 और किसान अर्जी भर रहे हैं। यह जानकर आश्चहर्य होगा कि प्रदेश की 38 लाख हेक्टेकयर कृषि योग्य0 भूमि में से आज भी केवल 1.57 लाख हेक्टेहयर जमीन पर ही सिंचाई की सुविधा उपलब्धि है। सवाल है कि आखिर क्योंक? शायद इसलिए कि अब तक किसानों और खेती के मूल तकनीकों पर न तो यहां कोई काम हुआ है और न ही सरकार की कोई मंशा ही रही है। यदि मंशा होती तो यकीनन तस्वी र कुछ और होती और जमीनों पर जो दरार दिख रही हैं, वहां फसल लहलहा रही होती।
पलामू में घुसते ही आपको यह एहसास होने लगेगा कि कसी विकट और त्रासद जिन्द गी जीने को विवश है यहां की जनता। सुखाड़ की स्िथति जानने और वहां के लोगों की जीवन शैली जानने की उत्कशट इच्छाा लिये पिछले साल अपने एक साथी के साथ मनातू, लमटी, लेस्ली गंज व चेड़ाबारा गांव जाना हुआ था। इन गांवों के लोग इतने अनुभवी हैं कि धरती और आकाश को देख कर ही बता दें कि इस बार अकाल-सुखाड़ पड़ने वाला है या फिर बारिश और खेती की कोई गुंजाइश शेष है। चेड़ाबारा गांव के एक किसान सुकुल ने बताया कि सुखाड़ और गरीबी हमारी नियती ही बन गयी है। इससे बचने के लिए सरकार की तरफ से जो पहल होनी चाहिए, वह नहीं हो रही। गांव के लोगों ने कई बार यह निवेदन भी किया था कि शिवपुर में यदि डैम बन जाता तो अच्छा होता और अगर यह नहीं हो सकता तो गांव में 20 फुट (20 फीट के कुएं) कुआं ही बन जाता, तो कुछ हल निकल आता। कुछ ऐसी ही सोच कोल्हुाआ टोली और महुआ टोली के लोगों की भी थी। उनका मानना है कि इतने भर से ही कम से कम पीने और थोड़ी खेती के लिए कुछ पानी तो मिल ही जाता। अनाज के अभाव में यहां के लोग महुआ, गेठी (एक कसला कंदमूल) और चकवढ़ साग (जंगली पौधा) खाने को विवश हैं।
चैनपुर के लमटी गांव की स्िथति तो और भी भयावह है। दूरस्थस और दुर्गम रास्तोंड की वजह से न तो मीडियाकर्मी यहां पहुंच पाते हैं, न अधिकारी और न ही प्रबुद्धजन। जब हम इस गांव की स्िथति जानने पहुंचे तो पता चला कि कितनी लेप्सीथ और निरमलिया यहां हर साल दम तोड़ती रहती हैं परंतु उनकी मौत की गूंज किसी शून्यि में समा जाती है। वह खबर भी नहीं बन पाती। आदिम जनजाति कोरबा लोग यहां रहते हैं। सुखाड़ के दिनों में सिर्फ गेठी ही इनका भोजन होता है। गेठी की कड़वाहट को चूना लगाकर बहते पानी में रात भर बांस के जालीनुमा पात्र में डाल दिया जाए तो दूर किया जा सकता है। परंतु जहां न पानी है और न चूना के लिए पैसा तो फिर ये क्या करें? इसी गांव की धनुआ कोरबाइन ने बताया कि इसकी कड़वाहट को कम करने के लिए वो इसे काटकर 3-4 दिनों तक मिट्टी के घड़े में डालकर रेत में दबा देती हैं और तब खाती हैं। हमने देखा कि कड़वाहट कुछ कम तो हो जाती है परंतु ऐसा भी नहीं कि इसे खाया जा सके। पर पेट के लिए तो सब करना ही पड़ता है। जीने की जिद और जज्बेी को देखना हो तो एक बार लमटी जरूर देखें।
खैर… हम बात कर रहे थे पलामू और सुखाड़ की। बचपन में पलामू के बारे में हम कई-कई किस्सेे सुना करते थे। उन्हींक में से एक था मनातू स्टे़ट का किस्साम। मनातू स्टेजट में जबरन लोगों को बंधुआ बना कर मजदूरी करवायी जाती थी। मना करने या आनाकानी करने पर स्टे ट के महाराजा अपने पालतू चीता के पिंजरे में मजदूर को फेंकवा देते थे। इस डर से लोग उनके द्वारा किया जानेवाला अत्यााचार चुपचाप सह लेते थे या फिर मौत को गले लगा लेते थे। परंतु अब न स्टेदट रहा और न ही महाराज। फिर भी लोग तड़प रहे हैं, भूख और त्रासदी के पिंजरे से निकलने को छटपटा रहे हैं। लेकिन निकल भी नहीं पा रहे। वे न तो सुकून से जी पा रहे हैं और न ही मर पा रहे हैं। सवाल है कि मौत के मुंह में धकेलनेवाला वह शख्स कौन ह? सरकार, प्रशासन या फिर हम स्वमयं… पर इतना जरूर है कि यह पिंजरा इतना मजबूत ह कि पीढ़ियां दम तोड़ दे रही हैं पर उबर नहीं पा रहीं। आखिर क्योंक?
सवाल यह भी है कि जिस साल पलामू में सामान्यी वर्षा होती है, तो वह तकरीबन 1200 मिमी तक होती है। लेकिन जब कम वर्षा होती है तो भी यह करीबन 600 मिमी तक होती है। पी साईंनाथ ने लिखा है कि कम वर्षा होने के बाद यदि ऐसे अन्यय क्षेत्रों का तुलनात्म क अध्यंयन किया जाए तो यह स्पतष्टा होता है कि इससे कम वर्षा वाले क्षेत्र में भी ऐसी तबाही नहीं होती जितनी कि पलामू में। क्योंा? कहीं यह होश की दुनिया के लोगों के द्वारा खड़ा किया गया तमाशा तो नहीं? क्योंू नहीं वे इसका हल ढूंढ पा रहे हैं?
सचमुच यह बड़ा सवाल है और जवाब हम सब को मिलकर खोजना है।
31 JULY 2009
पिछले महीने निरमलिया की मौत हो गयी। भूखे-प्याासे आखिर कब तक वह मेहनत करती रहती? चिलचिलाती धूप में जंगल से लकड़ी काटना और फिर उसे बाज़ार में बेचना, उसकी दिनचर्या थी। इतनी कड़ी मेहनत के बाद भी निरमलिया अपने अर्धविक्षिउप्तम पति और पांच बच्चों का पेट कहां भर पाती थी। वह परिवार के अन्य सदस्योंे को तो कुछ खिला भी देती थी, पर खुद कई-कई दिनों तक भूखे रह जाती थी। आखिर यह सिलसिला कितने दिन चल सकता था… निरमलिया पलामू जिले के छतरपुर ब्लॉ क के सुशीगंज की रहनेवाली थी। दुर्भाग्यस यह है कि उसकी मौत, पलामू में भूख से हुई मौतों की फेहरिस्तर में भी शामिल नहीं हो पायी। क्यों कि ऐसा करते ही प्रसाशन के क्रिया-कलापों पर प्रश्न चिह्न लग जाता। जब हमने यह जानने की कोशिश की कि आखिर उसकी मौत कसे हुई है, तो ग्रामीणों ने बताया कि वह भूख से मरी है। उसके घर में अनाज का एक दाना भी नहीं था। परंतु उपायुक्त् डॉ अमिताभ कॉशल ने बताया कि मामले की जांच करायी गयी है और बीडीओ वहां गये थे। उनके अमुसार निरमलिया ने एक दिन पहले यानी की शनिवार 28 जून की रात को खाना खाया था। शव का पोस्ट मार्टम शायद घरवालों की इजाज़त न मिलने के कारण नहीं हो पाया हो। लेकिन यह हो भी जाता तो क्या् इसकी पुष्टि की जाती? शायद नहीं।
पलामू और सूखा का कुछ ऐसा मेल हो गया ह कि छुड़ाये नहीं छूट रहा। यह विडंबना ही है कि भूख से होनेवाली मौत के आगोश में समाने वाले 99 फीसदी लोग आदिवासी और दलित ही हैं। चाहे वह कोरबा जनजाति के हों, भूइंयां, बिरहोर या फिर अन्यआ। जब सरकार की 19 योजनाएं उनके उत्थायन के लिए चलायी जा रही हैं और सुखाड़ के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपये खर्च किये जा चुके हैं… फिर यह मौतें क्यों ? निरमलिया की मौत का काला सच भी शायद कभी सामने न आ पाये। गढ़वा की लेप्सीर की मौत भी कुछ इसी तरह हुई थी और प्रशासन ने उसे भूख से हुई मौत मानने से ही इनकार कर दिया था। परंतु मीडिया और कुछ प्रबुद्धजनों की कोशिशों के बाद उन्हेंौ यह मानना पड़ा था कि उसकी मौत भूख से ही हुई है। निरमलिया की मौत सिर्फ एक कॉलम की खबर बन पायी और शायद इसीलिए उसे इंसाफ नहीं मिल सका।
पलामू में इस बार फिर सुखाड़ ने दस्त क दी है। तभी तो सुखाड़ से खौफजदा किसान इच्छास मृत्युी के लिए हस्ता क्षर अभियान चला रहे हैं। 5000 किसानों ने तो हस्तादक्षर भी कर दिये हैं और 30,000 और किसान अर्जी भर रहे हैं। यह जानकर आश्चहर्य होगा कि प्रदेश की 38 लाख हेक्टेकयर कृषि योग्य0 भूमि में से आज भी केवल 1.57 लाख हेक्टेहयर जमीन पर ही सिंचाई की सुविधा उपलब्धि है। सवाल है कि आखिर क्योंक? शायद इसलिए कि अब तक किसानों और खेती के मूल तकनीकों पर न तो यहां कोई काम हुआ है और न ही सरकार की कोई मंशा ही रही है। यदि मंशा होती तो यकीनन तस्वी र कुछ और होती और जमीनों पर जो दरार दिख रही हैं, वहां फसल लहलहा रही होती।
पलामू में घुसते ही आपको यह एहसास होने लगेगा कि कसी विकट और त्रासद जिन्द गी जीने को विवश है यहां की जनता। सुखाड़ की स्िथति जानने और वहां के लोगों की जीवन शैली जानने की उत्कशट इच्छाा लिये पिछले साल अपने एक साथी के साथ मनातू, लमटी, लेस्ली गंज व चेड़ाबारा गांव जाना हुआ था। इन गांवों के लोग इतने अनुभवी हैं कि धरती और आकाश को देख कर ही बता दें कि इस बार अकाल-सुखाड़ पड़ने वाला है या फिर बारिश और खेती की कोई गुंजाइश शेष है। चेड़ाबारा गांव के एक किसान सुकुल ने बताया कि सुखाड़ और गरीबी हमारी नियती ही बन गयी है। इससे बचने के लिए सरकार की तरफ से जो पहल होनी चाहिए, वह नहीं हो रही। गांव के लोगों ने कई बार यह निवेदन भी किया था कि शिवपुर में यदि डैम बन जाता तो अच्छा होता और अगर यह नहीं हो सकता तो गांव में 20 फुट (20 फीट के कुएं) कुआं ही बन जाता, तो कुछ हल निकल आता। कुछ ऐसी ही सोच कोल्हुाआ टोली और महुआ टोली के लोगों की भी थी। उनका मानना है कि इतने भर से ही कम से कम पीने और थोड़ी खेती के लिए कुछ पानी तो मिल ही जाता। अनाज के अभाव में यहां के लोग महुआ, गेठी (एक कसला कंदमूल) और चकवढ़ साग (जंगली पौधा) खाने को विवश हैं।
चैनपुर के लमटी गांव की स्िथति तो और भी भयावह है। दूरस्थस और दुर्गम रास्तोंड की वजह से न तो मीडियाकर्मी यहां पहुंच पाते हैं, न अधिकारी और न ही प्रबुद्धजन। जब हम इस गांव की स्िथति जानने पहुंचे तो पता चला कि कितनी लेप्सीथ और निरमलिया यहां हर साल दम तोड़ती रहती हैं परंतु उनकी मौत की गूंज किसी शून्यि में समा जाती है। वह खबर भी नहीं बन पाती। आदिम जनजाति कोरबा लोग यहां रहते हैं। सुखाड़ के दिनों में सिर्फ गेठी ही इनका भोजन होता है। गेठी की कड़वाहट को चूना लगाकर बहते पानी में रात भर बांस के जालीनुमा पात्र में डाल दिया जाए तो दूर किया जा सकता है। परंतु जहां न पानी है और न चूना के लिए पैसा तो फिर ये क्या करें? इसी गांव की धनुआ कोरबाइन ने बताया कि इसकी कड़वाहट को कम करने के लिए वो इसे काटकर 3-4 दिनों तक मिट्टी के घड़े में डालकर रेत में दबा देती हैं और तब खाती हैं। हमने देखा कि कड़वाहट कुछ कम तो हो जाती है परंतु ऐसा भी नहीं कि इसे खाया जा सके। पर पेट के लिए तो सब करना ही पड़ता है। जीने की जिद और जज्बेी को देखना हो तो एक बार लमटी जरूर देखें।
खैर… हम बात कर रहे थे पलामू और सुखाड़ की। बचपन में पलामू के बारे में हम कई-कई किस्सेे सुना करते थे। उन्हींक में से एक था मनातू स्टे़ट का किस्साम। मनातू स्टेजट में जबरन लोगों को बंधुआ बना कर मजदूरी करवायी जाती थी। मना करने या आनाकानी करने पर स्टे ट के महाराजा अपने पालतू चीता के पिंजरे में मजदूर को फेंकवा देते थे। इस डर से लोग उनके द्वारा किया जानेवाला अत्यााचार चुपचाप सह लेते थे या फिर मौत को गले लगा लेते थे। परंतु अब न स्टेदट रहा और न ही महाराज। फिर भी लोग तड़प रहे हैं, भूख और त्रासदी के पिंजरे से निकलने को छटपटा रहे हैं। लेकिन निकल भी नहीं पा रहे। वे न तो सुकून से जी पा रहे हैं और न ही मर पा रहे हैं। सवाल है कि मौत के मुंह में धकेलनेवाला वह शख्स कौन ह? सरकार, प्रशासन या फिर हम स्वमयं… पर इतना जरूर है कि यह पिंजरा इतना मजबूत ह कि पीढ़ियां दम तोड़ दे रही हैं पर उबर नहीं पा रहीं। आखिर क्योंक?
सवाल यह भी है कि जिस साल पलामू में सामान्यी वर्षा होती है, तो वह तकरीबन 1200 मिमी तक होती है। लेकिन जब कम वर्षा होती है तो भी यह करीबन 600 मिमी तक होती है। पी साईंनाथ ने लिखा है कि कम वर्षा होने के बाद यदि ऐसे अन्यय क्षेत्रों का तुलनात्म क अध्यंयन किया जाए तो यह स्पतष्टा होता है कि इससे कम वर्षा वाले क्षेत्र में भी ऐसी तबाही नहीं होती जितनी कि पलामू में। क्योंा? कहीं यह होश की दुनिया के लोगों के द्वारा खड़ा किया गया तमाशा तो नहीं? क्योंू नहीं वे इसका हल ढूंढ पा रहे हैं?
सचमुच यह बड़ा सवाल है और जवाब हम सब को मिलकर खोजना है।
31 JULY 2009
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