Monday, January 24, 2011

दूसरा दंतेवाड़ा


यह दंडकारण्य का वह दंतेवाड़ा तो नहीं, जहां के एक बड़े हिस्से में माओवादियों द्वारा पीपुल्स गवर्नमेंट का राज चलता है लेकिन एशिया का सबसे बड़ा साल जंगल सारंडा पिछले दस सालों में जिस मुहाने पर पहुंच चुका है, वहां उसे दूसरा दंतेवाड़ा ही कहा जा सकता है. 80 हजार हेक्टेयर में फैला यह विशालकाय क्षेत्र कभी अपनी खूबसूरती के लिए जाना जाता था अब यह माओवादियों और पुलिस के बीच मुठभेड़ होने की वजह से चरचे में आता है या फिर अवैध खनन के कारण. सितंबर माह के आखिरी दिनों में सारंडा फिर से गरमाहट में था. तीन दिनों तक करीबन चार हजार पुलिस बलों ने सारंडा के एक हिस्से में एंटी नक्सल आॅपरेशन चलाया. हासिल क्या हुआ, नहीं कहा जा सकता लेकिन सारंडा का सन्नाटा गोलियों से कुछ देर के लिए टूटा और फिर उसी सन्नाटे के आगोश में समा गया. सारंडा के जंगल से लौटकर वहां के हालात पर पेश है एक रिपोर्ट



बहादुर सिंह मुंडा एक-एक कर बातों को समझाते हैं. जब हम सारंडा के इलाके में प्रवेश करेंगे तो गाड़ी का हाॅर्न कुछ अंतराल पर लगातार बजते रहना चाहिए. गाड़ी में म्यूजिक सिस्टम दुरुस्त रखना होगा. तेज आवाज में गीत-संगीत बजते रहना चाहिए, वह कानफाड़ू ही क्यों न हो. और हां, गाड़ी की खिड़कियों के शीशे बंद करने की बिल्कुल जरूरत नहीं, खुले रहने चाहिए. यह सब इसलिए ताकि हर सौ कदम पर किसी न किसी रूप में मौजूद माओवादी कार्यकताओं को यह कतई न लगे कि कोई पुलिसवाला जा रहा है, जिसकी गाड़ी में म्यूजिक सिस्टम नहीं होता या उसने खिड़कियों को बंद रखा है या हाॅर्न बजाये बिना चुपके से निकलना चाह रहा हो. क्योंकि ऐसे संदेह होने पर इस बात की भी गुंजाइश बनती है कि औसतन हरेक किलोमीटर की दूरी पर बिछे लैंडमाईंस, केन बम की चपेट में आप आ जायें.
बहादुर के इन हिदायतों से सिहरन पैदा हो रही थी. रोंगटे खड़े हो रहे थे लेकिन यात्रा में खुद बहादुर साथ में चल रहे थे, इसलिए भय थोड़ा कम था. सब समझ लेने के बाद हम छोटानागरा इलाके के लिए निकलते हैं. छोटानागरा कभी धार्मिक पर्यटक स्थल के रूप में मशहूर था, बताया जाता है कि कभी यहां उड़िसा के क्योंझर राज ने मानव निर्मित खालों से दो नगाड़े बनवाये थे, जो अब आस्था के केंद्र के तौर पर विराजमान हैं. लेकिन अब छोटानागरा की नयी पहचान है. इस रूप कि वहीं से वह रास्ता शुरू होता है, जहां खून, बारूद, विस्फोट, वर्चस्व की भाषा ही अब मुख्यधारा की भाषा है. यानी माओवादियों और पुलिस के बीच मुठभेड़ का इलाका. कटे हुए रोड डरा रहे थे. कटे हुए रोड का एक सीधा मतलब होता है कि यहां लैंडमाइंस की आशंका है.
डर के इस माहौल में स्वभाव से संकोची- शर्मिले बहादुर खामोशी को तोड़ते हुए पहला सवाल करते हैं. आपलोग पत्रकार हैं तो यह एक बात मालूम होगा कि हमारे पुरखों ने जंगल-पहाड़ों की दुर्गमता से लड़ाई लड़ अपने रहने के लिए, अपनी खेती बारी के लिए जगह तैयार की. जानवरों की खोह में इंसानों के आने-जाने के अवसर उपलब्ध करायें लेकिन जब इसके एवज में वर्षों से पानी-बिजली की मांग करते रहे तो कोई सुनने को तैयार नहीं. बहाने लाख बने लेकिन हमारे ही गांव के बगल में जब कंपनियां आती है तो उनके लिए दस दिनों के अंदर ही बिजली-पानी-सड़क आदि का इंतजाम हो जाता है. ऐसा क्यों?
बहादुर अपनी बात जारी रखना चाहते हैं. अगला सवाल होता है- आप यह बतायें कि यदि कोई ग्रामीण एक शाम का खाना माओवादियों को मजबूरी मंे खिला देता है तो उसे नक्सली मददगार घोषित करते हुए मारा-पीटा जाता है, जेल भेजा जाता है लेकिन उद्योगपति, व्यवसायी, कारोबारी वर्षों से लाखों-करोड़ों की लेवी देते हैं, वे नक्सली मददगार क्यों नहीं घोषित होते. शर्मिले-संकोची बहादुर सिंह का स्वर मुखर होता है. अगला सवाल फिर- आपने कभी सोचा है कि नक्सलियों और पुलिसवालों को, दोनों को ही सारंडा से इतना मोह क्यों है?
हम भी इसी सवाल का जवाब तलाशने गये थे कि आखिर एशिया के सबसे बड़े साल जंगल में ही इतनी रुचि क्यों जबकि नक्सलियों का सारंडा से कोई कम खौफ झारखंड के और भी दूसरे इलाके में नहीं है. चतरा जिले में में तो माओवादियों ने प्रतापपुर के 40 से अधिक गांवों की जिंदगी को चार माह तक नाकेबंदी कर कैद कर रखा था लेकिन वहां कोई बड़ा आॅपरेशन नहीं चला. पलामू के भी गांवों में साल के आरंभिक माह में ही कई गांवों की जिंदगी माओवादी फरमान के कारण रूकी रही. लातेहार इलाके में जहां कई प्रखंड ऐसे हैं, जहां एक-एक पत्ता माओवादियों की मर्जी से ही खड़कता है. गुमला के इलाके में जहां पाट और पहाड़ी क्षेत्रों के बीच नक्सली संगठन अपना राज चलाते हैं लेकिन वहां कोई बड़ा आॅपरेशन होता नहीं दिखता. रांची से सटे बुंडू-तमाड़ के इलाके में तो विधायक रमेश सिंह की हत्या, इंसपेक्टर फ्रांसिस इंदवार की हत्या हुई, कई-कई बड़े लूट कांड हुए, माओवादी नेता कुंदन पाहन की इजाजत के बगैर इलाके के गांवों में कुछ नहीं होता तो वहां कोई इतना बड़ा आॅपरेशन कभी क्यों नहीं चलाया गया जबकि कुछ माह पूर्व वहां के 40 गांवों के ढाई हजार ग्रामीणों ने पुलिस को यह भरोसा दिलाया था कि यदि आरपार की लड़ाई लड़नी है, इलाके से नक्सलियों को खदेड़ना है तो दो-तीन माह तक सघन अभियान चलायें, हम साथ देंगे. लेकिन वैसा कुछ नहीं हो सका. तो फिर सारंडा में ही इतनी रुचि क्यों?
दरअसल, सारंडा के नाम पर जो गरमाहट पिछले दिनों हुई उससे फिर कई सवाल खड़े होते हैं. 24 से 27 सितंबर के बीच करीबन तीन से चार हजार पुलिसबलों ने सारंडा एरिया के थोलकोबाद, मनोहरपुर, छोटानागरा, जराईकेला, दीघा, भालूलता, बिमलागढ़, राउरकेला, किरीबुरू के रास्ते इलाके को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश की. दीघा, तिरिलपोसी जैसे गांवों में तीन दिनों तक जिंदगी ठहरी रही. कोबरा पुलिस के नेतृत्व में पहुंचे पुलिसबलों की इतनी संख्या के बावजूद माओवादियों ने 25 सितंबर को सात लैंडमाइंस विस्फोट कर दो जवानों को उड़ा दिया. कोबरा का भी एक जवान शहीद हुआ. कोबरा बटालियन के असिस्टेंट कमांडेंट नितेश कुमार घायल हो गये. इसके एवज में पुलिसवालो की ओर से द्वंद्व भरे बयान सामने आने लगे. कभी कहा गया कि दर्जन भर माओवादी मार दिये गये हैं, आधे दर्जन से अधिक कैंप ध्वस्त कर दिये गये हैं. फिर कभी कहा गया कि चार माओवादी मारे गये हैं. अचानक से आॅपरेशन को रोक दिया गया और सारे पुलिसवाले बीहड़़ से वापस आ गये तो एक लाश को दिखाया गया कि एक माओवादी की लाश हमारे हाथ लग सकी है, बाकि के लाश माओवादी उठा ले गये. लेकिन इस बात का खंडन करते हुए माओवादी प्रवक्ता समरजी का कहना है कि इस मुठभेड़ से उनके संगठन को कोई नुकसान नहीं हुआ. न ही कोई कैंप ध्वस्त हुआ, न ही कोई मारा गया, पुलिस गलत बयानी कर रही है. इस बाबत पूछे जाने पर चाईबासा जिला के एसपी अरुण कुमार कुछ भी बताने से इंकार करते हैं. वह कहते हैं िकइस संबंध में राज्य के वरीय पुलिस पदाधिकारी ही कुछ बता सकते हैं. वरीय पुलिस पदाधिकारियों में डीजीपी नेयाज अहमद कहते हैं कि हमने सफलता पायी है, अब फिर नये सिरे से बड़े स्तर पर आॅपरेशन की शुरुआत होगी. माओवादी प्रवक्ता समरजी या पुलिस पदाधिकारियों की बात को परे कर दे ंतो इलाके में अधिकांश लोग यह मानने को तैयार नहीं कि करीबन 72 घंटे तक इलाके को घेरकर अंधाधुंध फायरिंग आदि करने के बाद पुलिस ने कुछ हासिल किया. सिवाय इसके कि इलाका अशांत रहा. जैसा कि छोटानागरा में मिले प्रमोद सिंकू कहते हैं- पुलिस या तो आरपार की लड़ाई लड़े या हमें माओवादियों के भरोसे छोड़ दे. हमलोग तो दोनों के बीच पीस कर बर्बाद हो रहे हैं. न इधर के रहे हैं, न उधर के. यहां की नयी पीढ़ी दहशत और हिंसा के बीच पैदा हो रही है. उससे भविष्य में एक सभ्य, जिम्मेवार भारतीय नागरिक बनने की उम्मीद नहीं की जा सकती है.
सिंकू सच ही कहते हैं. सारंडा हमेशा से ही शिकारगाह बना रहा है. पहले यह सरायकेला इस्टेट का शिकारगाह हुआ करता था, अब बड़ी कंपनियों, दलालों, माओवादियों के लिए शिकारगाह है. इतिहास में जाये ंतो 19 दिसंबर 2001 को पुलिस ने इस इलाके में नक्सली ईश्वर महतो को मार गिराया था, जिसके बाद नक्सलियों ने एक का बदला सौ से लेने की बात कही थी. सौ तो नहीं लेकिन आधिकारिक तौर पर अब तक 70 का आंकड़ा सारंडा के इलाके में पहुंच चुका है. सुरक्षाबलों के लिए कब्रगाह बन चुके सारंडा में 19 दिसंबर 2002 को नक्सलियों ने बिटकलसोय में बम विस्फोट कर 12 पुलिसकर्मियों को मार गिराया था. ग्रामीण भी मारे गये थे और करीब 34 महत्वपूर्ण हथियार लूट लिये गये थे. उसके दो साल बाद ही बलिवा कांड हुआ, जिसमें करीब तीस पुलिसकर्मी शहीद हो गये. दो साल बाद 2006 में फिर नक्सलियों ने एक बड़े कांड को अंजाम दिया, जिसमें 12 पुलिसवालें शहीद हुए. पुलिसवालों की शहादत, गोली-बारूदों की आवाज ने शांत सारंडा को अशांत इलाके में तब्दील कर दिया गया.
प्रसिद्ध पर्यटन स्थल को खुंखार व जानलेवा जंगल में बदलने में सबसे बड़ी भूमिका नक्सलियों की रही और उतनी ही भूमिका राजनीति की भी. इसी इलाके से मधुकोड़ा जैसे नेता मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे लेकिन उन्हेांने खान-खदानों का जो खेल किया, सबने देखा. वर्तमान मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा भी सारंडा के पड़ोस के ही हैं. दूसरी ओर नक्सलियों का ट्रेंड देखें तो पता चलेगा कि वह किसी एक इलाके में बहुत दिनों तक डेरा नहीं डाले रखते लेकिन सारंडा एक ऐसी जगह है, जहां से नक्सली किसी भी कीमत पर नहीं जाना चाहते. सबसे बड़ा कारण है वहां से मिलनेवाली मोटी लेवी की रकम. खुफिया विभाग ने दो साल पहले पुलिस मुख्यालय को जो जानकारी दी थी, उसके अनुसार पश्चिमी सिंहभूम से ही सबसे ज्यादा लेवी की वसूली माओवादी करते हैं. एक आंकड़े के अनुसार यह रकम चार करोड़ 46 लाख 30 हजार रुपये सालाना है. हालांकि जानकार बताते हैं कि खुफिया विभाग की यह जानकारी सही नहीं बल्कि इस इलाके से लगभग एक करोड़ रुपये प्रतिमाह की लेवी दी जाती है. मनोहरपुर में मिले सामाजिक कार्यकर्ता और मानकी-मुंडा समिति के सलाहकार डाहंगा बताते हैं कि यह सब धीरे-धीरे हुआ. पहले यहां के लोग बहुत शांत थे, अब भी शांत हैं. लेकिन जब से खनन कंपनियों के साथ दलालों का आना शुरू हुआ, तब से पूरी व्यवस्था ही बदल गयी. यहां के नौजवानों को माओवादी संगठन यह फरेबियत दिखाने लगे कि यदि थोड़ी कोशिश करो तो पैसे की भरमार है. उसी पैसे के फेरे में नौजवान इसमें जुड़ते चले गये और अब तो जो हालात है, सामने है.
सारंडा के जंगलों में घूमते हुए रास्ते में आपको हाथियों के समूह, टेढ़े-मेढ़े रास्ते मिलेंगे, चारों ओर पहाड़ियां ही पहाड़ियां, तो लगता है कि सात सौ पहाड़ियों के इलाके में हैं लेकिन लगभग 80 हजार हेक्टेयर के क्षेत्रफल में फैले एशिया के सबसे बड़े जंगल में जितने किस्म के संकट हैं, उससे भयभित होना स्वाभाविक है. कई जगहों पर सड़क को ही खलिहान बने देखना साफ बताता है िकइस रास्ते कभी-कभार ही कोई आता-जाता होगा. कई जगहों पर उड़े सड़क बताते हैं कि यहां कभी विस्फोट हुआ है. अंदर के गांव जाने के रास्ते में पेंड़ पर स्थायी तौर पर लगे नक्सली पोस्टर बताते हैं कि यहां पोस्टर को हटानेवाला कोई नहीं. इन सबके बीच एक स्कूल में फुटबाॅल मैच खेलती लड़कियों को देख भय के आलम में रोमांच का अनुभव होता है. सारंडा तबाही और बर्बादी के उस मुहाने पर पहुंच चुका है जहां से वापस आने की उम्मीदें नहीं दिखती. माओवादियों के बारे में या पुलिसवालों के बारे में बच्चे तक कुछ नहीं बताना चाहते. लेकिन निराशा के गहरे गर्त में भी कहीं-कहीं टिमटिमाती उम्मीदें दिखती हैं. जैसा कि मनोहरपुर में मिले हितेंद्र कहते हैं- नक्सली कोई क्रांति न हीं कर रहे न ही उन्हें बदलाव आदि से कोई लेना-देना रह गया है. उनका मुख्य काम पैसे की उगाही है. जब वाकई उन्हें बदलाव से मतलब होता तो सारंडा का ही एक हिस्सा है बंदगांव का इलाका. जहां जंगल माफियाओं ने पिछले दस वर्षों से तबाही मचा रखी है. बच्चों से जंगल कटवाते हैं. ग्रामीणों का घर जला देते हैं. महिलाओं से दुष्कर्म करते हैं लेकिन कहां कभी किसी माओवादी नेता उन माफियाओं को सजा देने सामने आया. हितेंद्र आगे बताते हैं कि इसी सारंडा को ठेकेदारों ने लूटा, कहां माओवादी ठेकेदारों को मारते हैं. उन्हें तो सिर्फ पुलिसवालों से दुश्मनी है लेकिन यह भूल जाते हैं कि पुलिसवाले भी अपनी नौकरी करते हैं. हितेंद्र हमें माओवादियों और ठेकेदारों-बिचैलियों के रिश्ते को समझने के लिए गोइलकेरा जाने के लिए कहते हैं. रास्ते में बहादुर मुंडा बताते हैं कि इतना ही नहीं एक और खेल भी चलता है. ठेकेदारों और माओवादियों की दोस्ती इतनी गहरी होती है कि आप विश्वास नहीं कर सकते. ठेकेदार किसी पुल-पुलिया का निर्माण करवा रहे होते हैं तो माओवादियों से सेटिंग कर वे बीच में ही उसे उड़वा देते हैं. फायदा यह होता है कि ठेकेदार सरकारी फाइलों में यह दिखा देते हैं कि हमने तो 90 प्रतिशत कार्य पूरा करवा लिया था, माओवादी उड़ा दिये तो हम क्या करें. पेमेंट 90 प्रतिशत कार्य के आधार पर होता है, कार्य दस प्रतिशत ही हुआ रहता है. दिखावे के लिए या फिर जनता को जोड़े रखने के लिए नक्सलियों ने किरीबुरू के इलाके में किसानों को पंपिंग सेट वगैरह भी दिये हैं, जिससे वे खेती करते हैं.
मनोहरपुर से वापसी में हम गोइलकेरा में रूकते हैं. गोइलकेरा की एक चाय दुकान पर मिले वंशीधर समीकरण और सांठगांव को समझाते हैं. वह कहते हैं- आप यह सोच सकते हैं कि इतने घनघोर जंगल में पुलिस की इतनी मुस्तैदी के बीच माओवादियों को खाद्य सामग्री किस तरह पहुंचती होगी. उनके पास अत्याधुनिक चीजें कैसे पहुंच जाती है. उनके पास सारे लैटेस्ट इलेक्ट्राॅनिक इक्विपमेंट कैसे रहते हैं. कभी इस खेल में खुद शामिल रह चुके वंशीधर कहते हैं- माओवादियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए कई चैनल बने हुए हैं. सबसे बड़े चैनल ठेकेदार हैं जो निर्माण कार्य के लिए ले जायी जा रही सामग्री के बीच या मजदूरों को खिलाने-पिलाने के नाम पर सारी खाद्य सामग्री माओवादियों तक पहुंचा देते हैं. बाकी बची कसर रेल से पूरी की जाती है. सारंडा के इलाके में रेलगाड़ियों का परिचालन माओवादियों के इशारे पर ही होता है. वह जहां चाहते हैं गाड़ियां रूकती है, फिर उसमें सामग्री लोड की जाती है और निर्धारित पड़ाव पर उसकी डिलिवरी कर दी जाती है. रेल ड्राइवर या गार्ड कुछ नहीं कह पाते क्योंकि उन्हें पता है कि झारखंड से होकर 1500 किलोमीटर की रेल लाइन गुजरती है, जिसमें करीब 1300 किलोमीटर की यात्रा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से ही होती है. 292 रेलवे स्टेशनों में 168 उनके निशाने पर हैं.
खैर! इन सारी बातों के साथ बहादुर सिंह मुंडा के सवाल सारंडा यात्रा में बढ़ते जा रहे थे. बहादुर बताते हैं कि अभी तो कम भयावह है लेकिन कुछ वर्षों बाद यहां सिर्फ और सिर्फ खून की नदियां ही बहनी है. पुलिस हथियारों के बल पर नक्सलियों से पार पाना चाहती है, जो संभव नहीं. गांववालों को भरोसे में लेना होगा. विकास करना होगा. जब हम किरीबुरू के इलाके मंेज ा रहे होते हैं तो बीच में कहीं रूककर बहादुर किसी के घर से कागज का एक टुकड़ा लाते हैं. उसे बांचते हुए कहते हैं- आपको मालूम न कि यहां एक चीड़िया माइंस है, जहां एशिया की सर्वश्रेष्ठ कोटी के अयस्क मौजूद हैं. दुनिया में ऐसा उत्कृष्ट कोटी का लोहा सिर्फ अमेरिका में ही पाया जाता है. वह बताते हैं कि सारंडा खनन से खोखला हुआ है. 80 हजार हेक्टेयर वाले इलाके में फिलहाल 14022 हेक्टेयर माइनिंग से प्रभावित इलाका है. नये माइंस के लिए 37814 हेक्टेयर में प्रस्ताव मिला है. दोनों को मिला दे ंतो यह खेत्रफल 51836 हेक्टेयर पहुंचता है. इस तरह मात्र 28 164 हेक्टेयर इलाका ही वैसा बचेगा, जिसमें जंगल भी बचे रहेंगे, इंसानों को भी रहना होगा और जानवरों को भी.
गोइलकेरा से चक्रधरपुर आने के क्रम में कई-कई सवाल सामने होते हैं. हम चाईबासा जाते हैं जहां प्रसिद्ध प्राध्यापक प्रो अशोक सेन से मुलाकात होती है. प्रो सेन कहते हैं कि यह अभिशप्त इलाका है. अंग्रेजों के जमाने में यहां उनका जुल्म था, अब नये शासकों का जुल्म है. प्रो सेन कहते हैं कि पुलिस बार-बार तमाशा क्यों करती है. यदि कोई अभियान चलाना है तो गंभीरता से चलाओ या नहीं चलाओ. यह क्या है कि चलायें, इलाका मानसिक तौर पर तैयार हुआ तो बीच में रोक दिये. वह बताते हैं कि आप इसी से समझ सकते हैं कि चाईबासा कोल्हान का एक प्रमुख स्थान है. यहां से जमशेदपुर के बीच अंग्रेजों के जमाने में भी एक ही सवारी गाड़ी चलती थी, अब भी एक ही चलती रही. अभी हाल में आंदोलन के बाद एक और गाड़ी का ठहराव हुआ है. अंग्रेजों ने इसे मालगाड़ी के लिए बनाया था, अब के शासक भी इंसानों की बजाय माल को ही ज्यादा तरजीह देते हैं. विकास ही नहीं हुआ तो क्या होगा, विनाश तो तय है, चाहे जिस रूप में है. लेकिन मध्यप्रदेश कैडर केे पूर्व वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी और वर्तमान में केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के नक्सल मैनेजमेंट डिविजन के सदस्य डीएम जाॅन मित्रा कहते हैं कि माओवादियों को दमन से तो खत्म नहीं ही किया जा सकता लेकिन विकास से भी वे खत्म नहीं होंगे.राजनीतिक सक्रियता जरूरी है और असामनता की लकीर जो वर्षोें से खिंची गयी है, उसे धीरे-धीरे पाटना होगा. छल और फरेब सार्वजनिक संस्थानों ने भी किया है, उसे सुधारना होगा लेकिन लौंग टर्म प्लानिंग के तहत काम करना होगा.
सारंडा की खाक छानने के बाद हम चक्रधरपुर पहुंच चुके थे. वहां बहादुर सिंह मुंडा विदा लेते हैं. कहते हैं- सेवा समाप्त. अब यह भूलकर जायें कि हम और आप कभी मिले भी हैं. चक्रमधर में रात आठ बज गये थे. बहादुर समझाते हैं- आगे टैबोघाटी में भी वही फाॅर्मूला अनाइयेगा. वह भी सारंडा का ही हिस्सा है. तेज म्यूजिक, तेज और रूक-रूक कर लगातार हाॅर्न बजाना, खिड़कियों के शीशे को खोले रखना... टैबोघाटी यानी बंदगांव से टैबो थाना तक का वह इलाका, जो चाईबासा, चक्रधरपुर, सारंडा इलाके में जाने की मुख्य सड़क है. इन दोनों थाना क्षेत्रों के बीच करीब 30 किलोमीटर की यात्रा करनी होती है, जहां कोई मोबाइल काम नहीं करता. जो टावर लगाया जाता है,उड़ा दिया जाता है. रोड की हालत यह है कि आप 60 की स्पीड में भी नहीं चल सकते. बंदगांव की बंद गलियां और टैबो की टफ घाटी फिर से रांेगटे ख़ड़े करते हैं. भय के इस माहौल से निकलते यानी टैबोघाटी पार करते ही एक बार बहादुर सिंह मुंडा का फोन आता है- कहां पहुंचे? फिर बहादुर कहते हैं कि आप असल सारंडा तो जा ही नहीं सके, जिसके लिए यह कभी मशहूर रहा है. आप न तो कायदे से छोटानगरा का मंदिर देख सके, न दक्षिण कोयल नदी में सुवर्ण कणों को, न थोलकोबाद, जहां ज्वालामुखी फटने के अवशेष हैं, न टायबो जलप्रपात देखने गयें, जहां 116 प्रकार के प्रजाति के पौधे मौजूद हैं. फिर बहादुर कहते हैं, कोई बात नहीं- समीज आश्रम तो देख लिये न, जो शंकराचार्य द्वारा स्थापित है और जहां पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव भी आ चुके हैं. कम से कम आपने मनोहरपुर से सूर्यास्त होते तो देख लिया न, जिसे देखने के लिए दस साल पहले तक सैकड़ों की संख्या में उड़िसा, बंगाल, बिहार के पर्यटक पहुंचते थे.

Monday, January 17, 2011

नींद न परे राती एहो दैया, झुरत पलंग वैसी मने मन...

घासी की थांती पर फेरे हाथ

जिस तरह भारतवर्ष में हिंदी का महत्व है, कुछ वैसा ही महत्व झारखं डमें नागपुरी का है. 1859-1926 के कालखंड मंे रहने वाले झारखं डमें नागपुरी के एक महान कवि घासीराम ने कई ऐसी रचनाएं की, जो आज भी झारखंड के हर गांवों के अखरे में सुनाये जाते हैं. गाये जाते हैं. उनकी तुलना विद्यापति से की जाती है. घासीराम का रचना संसार बड़ा था, उन पर हुए शोधकार्य भी विस्तृत हैं लेकिन विडंबना यह है कि उनके परिजनों ने जिस एक स्मृति को संजोकर रखा है, वह भी अब आखिरी पड़ाव में है. घासीराम के परिजनों की पीड़ा क्या है, पढ़िए एक रिपोर्टः-


अनुपमा


घायल बिहरबान, थिर न रहत प्राण
निसु दिने रे दैया
दहत मदन तन छने-छन.
सिहरी उठति छाती
नींद न परे राती
एहो दैया, झुरत पलंग वैसी मने मन...
रांची से करीब 50 किलोमीटर की दूरी तय कर हम करकट गांव पहुंचे थे. रामेश्वर राम के दरवाजे पर हाजिर थे. लगभग आधे घंटे की प्रतिक्षा के बाद किसी तरह घिसटकर, पैरों और हाथों के बल चलकर घर की देहरी तक पहुंचते हंै रामेश्वर. लगभग पंद्रह मिनट तक शांत रहते है रामेश्वर राम और उसके बाद स्थूल पड़े लकवाग्रस्त शरीर की पूरी उर्जा समेट कर इस गीत को जब सुनाते हैं तो कुछ देर के लिए वहल अलग ही दुनिया रचाते-बसाते हैं. हम उनकी शारीरिक अस्वस्थता को देख उनसे विनम्र निवेदन करते हैं कि बस, दादा अब रहने दीजिए, आपने एक सुना दिया न! रामेश्वर बिना कुछ बोले दूसरे गीत को गाना शुरू कर देते हैं. दूसरे गीत को खत्म कर लेेने के बाद कहते हैं- जानते हंै आपने गीत सुनने की फरमाईश किससे की है! हुलास राम के बेटे से. फिर रामेश्वर कहते हैं- आपको मालूम कि हुलास कौन थे- घासीराम के बेटे. फिर रामेश्वर का सवाल होता है, आपको यह पता है कि घासीराम कौन थे! एक वाक्य बोलने में भी काफी परेशानियों से गुजरनेवाले रामेश्वर राम उस वक्त सवालों का अंतहीन सिलसिला शुरू करने जा रहे थे कि बीच में ही जबान लड़खड़ाने लगा. कुछ देर दम लेने के बाद एक वाक्य बोलते हैं- हम एक गीत नहीं गा सकते.थे जब भी गायेंगे जोड़ा ही गायेंगे, इसलिए आपने मना किया तो भी नहीं माना. और जब गीत गाना शुरू कर देंगे तो चाहे कुछ भी हो जाये, उसे आधे में नहीं छोड़ेंगे, पूरा कर के ही दम लेंगे.
रामेश्वर राम की आधी-अधूरी रह गयी बातों को देवकी किस अंदाज में पूरा करती हैं, उसकी बात करने से पहले यह जानते चलें कि घासीराम कौन थे? घासीराम झारखंड के जनमानस मंे बसे ऐसे कवि-गीतकार हैं, जिनके गीतो के बोल शायद ही छोटानागपुर का कोई गांव ऐसा हो, जहां सुनायी न पड़ते हो. घासीराम वह कवि थे, जिनकी किताब ‘नागपुरी फाग शत्तक‘ 1911 में ही मुंबई से प्रकाशित होकर आयी थी और झारखंड के गांव-गांव तक पहुंच गयी थी. घासीराम वह रचनाकार हैं, जिन्होंने दुर्गा सप्शति को नागपुरी गीतों-कविताओं में ढाल कर एक पुस्तक ही तैयार कर दी थी. जिन्होंने चंडीपुराण का नागपुरी गीतमय अनुवाद कर दिया था. घासीराम का रचना संसार यहीं खत्म नहीं होता, जब उनके किताबों का छपने का प्रबंध नहीं हुआ तो उन्होंने काॅपियों में ही किताब की शक्ल में लिखना शुरू किया और चंडीपुराण, रामजन्म, कृष्ण का जीवन, चैंतिसा, सुदामाचरित, उषा हरण, नागवंशावली जैसी पुस्तकों को रचा जो अप्रकाशित रह गये.
रामेश्वर राम की पत्नी और घासीराम की पौ़त्रवधु देवकी देवी कहती हैं- घासीराम सिर्फ इतने भर नहीं थे, उनके बारे में यह कहावत मशहूर है कि एक ढेला को हवा में उछालो और वह जब तक वापस जमीन पर आकर गिरेगा, उतने देर में घासीराम एक गीत की रचना कर देते थे. लेकिन इन सबके बीच विडंबना यह है कि झारखंड के इतने बडे़ रचनाकार की स्मृतियां अब उनके गांव में भी उस तरह नहीं बची हुई है. उनके नाम पर कहीं कोई एक सांस्कृतिक प्रतिमान तक खड़ा हो सका. करकट गांव में उस खपरैल मंदिर को दिखाते हुए रामेश्वर राम के बेटै देंवेंद्र कहते हैं- यह ीवह मंदिर है, जहां घासीराम रोज बैठा करते थे, रचना करते थे. हमने अपनी औकात के हिसाब से सारे पुराने घरों को तोड़ परिवारों के बंटवारे के हिसाब से नये घर बना लिये लेकिन यह मंदिर वैसे ही रहने दे रहे हैं. इस उम्मीद के साथ कि कभी न कभी तो कोई आयेगा, जो यह पूछेगा कि क्या घासीराम की कोई स्मृति यहां बची है तो यह मंदिर दिखा सकेंगे. बाकि के सारी थांति पर तो बड़े विद्वानों ने हाथ की सफाई कर दी. इसका आशय पूछने पर देवेंद्र कहते हैं कि कुछ साल पहले तक यहां तरह-तरह के बौद्धिक जमात के लोग आते थे. घासीराम के बारे में दो-चार बातें बताते थे. स्मारक, लाइब्रेरी आदि बनाने-बनवाने आदि की बातें कहते थे और दर्जनों की संख्या में उपलब्ध घासीराम जी की पांडुलिपियों में एकाध लेकर जाते थे. कुछेक इस आश्वासन के साथ भी कि इसे किताब की शक्ल में छपवा देंगे. लेकिन वे बौद्धिक फिर वापस नहीं आते थे, हर बार कोई नया ही चेहरा सामने होता था, नये अंदाज में और ऐसे ही नये-नये चेहरों ने एक-एक कर सारी पांडुलिपियां तक अपने पास रख ली, यहां तक कि उनकी कुछ प्रकाशित किताबें थीं, वह भी ले गये. बौद्धिक जमात की इस चैर्यकला पर कोई कुछ नहीं बोलता. हालांकि रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय भाषा विभाग के प्रमुख डाॅ गिरिधारी राम गौंझू कहते हैं- यह जिसने भी किया अच्छा नहीं किया लेकिन हम यह भी नहीं कह सकते कि घासीराम आज हाशिये पर चले गये हैं या उपेक्षित रहे हैं. गौंझू कहते हैं कि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को आधार बनाकर कई-कई शोध हुए हैं. डाॅ श्रवण कुमार गोस्वामी, डाॅ बीपी केशरी, डाॅ गोविंद साहू, कविवर नहन जैसे विद्वानों ने गहनता से अध्ययन किया है. उससे लोगों को वाकिफ कराने का काम किया है. लेखक व नागपुरी गीतों की दुनिया पर गहराई से काम करनेवाले नागपुरी संस्थान के प्रमुख प्रो बीपी केशरी कहते हैं-घासीराम की तुलना नागपुरी में विद्यापति से की जाती है, जिन्होंने कई-कई उत्कृष्ट रचनाओं से नागपुरी गीत व कविता संसार को समृद्ध किया. यह सच भी है कि घासीराम पर कई-कई महत्वपूर्ण शोध कार्य हुए हैं लेकिन इससे उनके परिजनों की टीस कम नहीं होती. जैसा कि देवेंद्र कहते हैं- हमें क्या मिला! हम किसी पैसे की मांग नहीं कर रहे. हम लालची नहीं हैं लेकिन यह उम्मीद तो कर ही सकते हैं कि उनकी स्मृति में कुछ तो हो जाये. देवेंद्र कहते हैं कि घासीराम के परिजनों ने उनकी विरासत को अपने स्तर से हर संभव संजोकर रखने की कोशिश की है. घासीराम के बेटे हुलास राम एक बड़े कवि हुए. उन्होंने शिव वंदना, फगुआ आदि पुस्तकों की रचना की. खुद बहुत बढ़ियां गाते भी थे. हुलास राम के बेटे यानि मेरे पिता रामेश्वर राम, जब तक स्वस्थ रहे, तब तक हर रोज सुबह-शाम घासीराम के गीतों को गाकर रियाज करते थे, कंठस्थ कर लिये हैं उनके गीतों को. और अब मैं, यानी घासीराम के परिवार की चैथी पीढ़ी भी उनके गीतों को गाने की कोशिश करता हूं लेकिन मेरे पास तो उनके गीत तक नहीं बचे हैं. जो ले गये हैं, यदि वे मेहरबानी कर लौटा दे ंतो हम उस विरासत को संभालकर रख सकेंगे, हमें भी सहेजने की कला आती है. इतना सब कहने के बाद देवेंद्र घर में जाते हैं. चिथड़े हो चुके कुछ काॅपियों को लाते हैं और उसमें से एक गीत अलाप लेकर गुनगुनाते हैं. एक को खत्म करने के बाद तुरंत दूसरे गीत को भी पूरा करते हैं. जोड़ा गीत परंपरा का निर्वाह करते हुए. चलते समय वह कहते हैं- हमारे परिवार वालों को अब भी घासीराम के कई गीत कंठस्थ है, आपलोग उसे प्रकाशित करवा सकते हैं. हम गीतों को उपलब्ध करवा सकते हैं, अपनी स्मृति के आधार पर. इतने छल के बावजूद घासीराम के परिजनों की उम्मीदें नहीं टूटी, यह गौर करनेवाली बात है.

Wednesday, November 3, 2010

भूखे-सूखे छतरपुर में टीबी की छतरी




♦ अनुपमा

यूं तो पलामू ही झारखंड का अभिशप्त इलाका है, उसमें भी उसका छतरपुर इलाका विचित्र विडंबनाओं से भरा हुआ है। उसे झारखंड का विदर्भ भी कहा जाता है। पिछले साल जब सुखाड़ और उससे उपजी भुखमरी के कारण वहां के 13,400 किसानों ने हस्ताक्षर कर सामूहिक रूप से इच्छामृत्यु का संकल्प लिया था, तो अचानक से यह इलाका सुर्खियों में आ गया था। हर साल यहां भूख से लोग मरते हैं। इतना ही नहीं, यहां लोग जान-पहचान वाली बीमारी से भी हमेशा मौत के आगोश में समाते रहते हैं, कहीं कोई चर्चा नहीं होती। छतरपुर के लुतियाहीटोला में पहुंचने पर ऐसी ही परिस्थितियों से हमारा सामना हुआ, जहां रोजमर्रा की जिंदगी में बेमौत मर जाना किसी को हैरत में नहीं डालता।

लुतियाहीटोला एक छोटा-सा गांव है। वहां करीब 100-200 मीटर की दूरी पर नौ क्रशर मशीनें लगी हुई हैं। बच्चों और महिलाओं की फौज दिन-रात वहां काम में लगी हुई रहती हैं। पत्थरों की पिसाई से निकले डस्ट उनकी जिंदगी को मौत की तरफ ले जाते हैं। पुरुष वहां काम न कर, बिहार के करवंदियों में पहाड़ों से पत्थर तोड़ने चले जाते हैं। करवंदिया क्रशरों के लिए मशहूर जगह है। जब करवंदिया से काम कर मर्द लौटते हैं, तो हाथ में थोड़ी सी रकम होती है और साथ में बड़ी बीमारी। एड्स जैसी बीमारी। कई बार तो इन्हें पता ही नहीं चलता बीमारी का, कुछेक को जब तक पता चलता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है या पता चलने पर भी समाज के डर से छुपा कर रखा जाता है।

लुतियाहीटोला के बगल में ही एक गांव है बरडीहा। वहां हमारी मुलाकात कई लोगों से होती है। बताया जाता है कि अभी हाल ही में सूरजदेव एड्स से मर गया है। एड्स का पता चलने से पहले वह टीबी की खुराक खा चुका था। उसी गांव का गोपी भी है। गोपी भी हमेशा खांसता रहता था। सामाजिक कार्यकर्ता सुनीता उसे जबर्दस्‍ती अस्‍पताल ले गयी, तो पता चला कि गोपी को टीबी है। टीबी का इलाज चला। ठीक नहीं हुआ तो सुनीता चंदा कर उसे जिला मुख्यालय डालटनगंज ले गयी। इलाज के लिए। वहां पता चला कि गोपी को एड्स है। फिलहाल गोपी टीबी सेनेटोरियम में भरती है। सूरजदेव की पत्नी कुंती की कहानी भी गोपी की तरह ही है। कुंती भी टीबी की दवा खाती रही। ठीक नहीं हुआ, प्राइवेट अस्पताल में गयी तो पता चला कि उसे भी एड्स है। इन दो गांवों की कहानी ऐसी ही है। या तो अधिकांश लोगों को टीबी है या एड्स।

यूं भी यहां जिस माहौल में लोग रहते हैं, टीबी की संभावना हमेशा बनी रहती है। प्रदूषण, डस्ट और कुपोषण के कारण टीबी का खतरा बढ़ा ही रहता है और वैसे में मजबूरी में क्रशर पर काम करते रहना जानलेवा साबित होता है। टीबी की मरीज मीना और महेश हमें क्रशर प्लांट में काम करते हुए ही मिले। वे कहते हैं कि हमें भी मालूम है कि टीबी है तो हमें यहां काम नहीं करना चाहिए लेकिन करें तो क्या करें!

छतरपुर के एक हिस्से के कई गांव ऐसी ही विडंबनाओं में घिरे हुए हैं। वह तो भला है कि सुनीता या उमेश जैसे सामाजिक कार्यकर्ता उनके बीच होते हैं। सुनीता या उमेश इस इलाके में घूम-घूमकर लोगों को डॉट् प्रोवाइड करवाते हैं। इलाज के लिए चंदा कर भी उनकी जांच करवाते हैं। लोगों को जागरूक करते हैं। जैसा कि परमेश्वर भुइयां बताते हैं – मेरा शरीर लगातार कमजोर होता जा रहा था। इलाज के लिए पैसा नहीं था… तब जाकर सुनीता जी और उमेश जी से मुलाकात हुई। इन लोगों ने न सिर्फ इलाज करवाया बल्कि घर लाकर दवा भी दे गये। कारू राम, सोनवा देवी भी ऐसी ही बात बताती हैं।

आगे बढ़ने पर एक गांव मिलता है हुटुकदाग। यहां मिलते हैं निरंजन मिस्त्री। जर्जर काया, सूखे होठ, निस्‍तेज आंखों वाले निरंजन हुटुकदाग में अपनी पत्नी के घर यानी ससुराल में रह रहे हैं। पिछले आठ माह से वे वहीं हैं। शादी के बाद इनकी तबीयत खराब हुई तो लोगों ने कहा कि जादू-टोना कर दिया गया है। कई माह तक झाड़-फूंक करवाने में ही लगे रहे। उमेश कहते हैं – काफी समझाने-बुझाने के बाद जांच के लिए तैयार हुए। जांच के बाद पता चला कि इन्हें टीबी है। तब जाकर इलाज शुरू हो सका। खैरादोहर, बरमनवा, तुकतुका, चेराई, डागरा, चुरुआ जैसे गांवों में भी हालात ऐसे ही हैं।

डॉट प्रोवाइडर मुनेश्वर सिंह बताते हैं कि प्राइवेट प्रैक्टिशनर डॉक्टर और झोलाछाप ओझा यह जानते हुए भी कि लोगों को टीबी की दवाएं मुफ्त में मिल जाती हैं, वहां तक नहीं पहुंचने देते। ग्रामीण जागरूकता के अभाव में इसे अपनी नियति मान बैठते हैं। फिजिशियन डॉक्टर मुकेश कुमार कहते हैं कि सरकार दवाई तो मुफ्त में दे रही है लेकिन जिन्हें इन दवाइयों की जरूरत है, उन्हें इसके बारे में अच्छे से मालूम ही नहीं है। जागरूकता अभियान को और तेज किये जाने की जरूरत है। उन गांवों में, जहां टीबी मरीजों की संख्या ज्यादा है, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर दवा उपलब्ध किये जाने की जरूरत है। डॉट प्रोवाइडर जहां नहीं हैं, वहां इसके लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

हालांकि दूसरी ओर स्टेट टीबी ऑफिसर राकेश दयाल कहते हैं – लोगों में जागरूकता आयी है। अस्पताल में मरीजों की संख्या बढ़ रही है। लोग सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए आने लगे हैं। यह अच्छा संकेत है। बेहतर परिणाम के लिए पारा मेडिकल और डॉक्टरों की ट्रेनिंग भी करायी जा रही है। सब ठीक रहा तो शीध्र ही अत्याधुनिक सुविधा भी झारखंड में उपलब्ध हो जाएगी। लेकिन डॉक्टर आइबी प्रसाद कहते हैं कि गरीबी का इस बीमारी से सीधा वास्ता है। यह तो बढ़ेगा ही। जरूरी है कि लोगों को बताया जाए कि जब आपको टीबी हो तो मुंह पर कपड़ा रखकर दूसरों से बात करे। और तमाम उपायों के बीच छतरपुर की सुनीता और उमेश जैसे लोगों की जरूरत हर इलाके में हैं। तभी इससे मुकाबला संभव है।

नापो को नापो तो जानें


♦ अनुपमा

यह असम का माजुली गांव नहीं है, जिसका अस्तित्व दांव पर लगा हुआ है और मिटता जा रहा है तो उस मिटते हुए गांव को, दांव पर लगी जिंदगियों को देखने हजारों सैलानी देश के कोने-कोने से पहुंचते हैं। यह एक झारखंडी गांव है, जिसका अस्तित्व दांव पर लगा हुआ है, जिंदगियां तिल-तिल मौत के आगोश में समा रही हैं लेकिन इस गुमनाम गांव को देखने-सुनने कोई नहीं आता। गांव का नाम है नापो। हजारीबाग जिले में पड़ता है। उसी हजारीबाग जिले में, जो मिथ और लोकमानस में हजार बागों के इलाके के रूप में मशहूर रहा है। अब इसकी नयी पहचान है। बाग की जगह यहां जानलेवा धुआं उगलती हुई चिमनियां दिखती हैं और इन चिमनियों ने हजारीबाग को राज्य में सबसे ज्यादा स्पंज आयरन फैक्ट्री वाले जिले के रूप पहचान दिलायी है।

इस जिले में करीबन 35 स्पंज आयरन फैक्ट्रियां हैं। इन्हीं में से दो फैक्ट्रियों के बीच नापो गांव पड़ता है। हेसालौंग पंचायत में। 40 घरों की बसावट और आबादी करीब 200, सारे हरिजन। अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी की हालत झारखंड के अन्य दर्जनों विवश गांव की तरह ही। बड़ा फर्क यह है कि यह गांव हर रोज, पल-पल काल के गाल में समा रहा है। औसत तौर पर देखें तो हर घर में टीबी के मरीज मिलेंगे।

गांव में पहुंचते ही सबसे पहला सामना होता है मैनवा देवी से। अपढ़ मैनवा के पास सवालों का ढेर है। वह पूछती हैं कि क्या देखने आये हैं यहां। देख लीजिए काली घास, काले पेड़, मरे हुए लोग, मुरझायी हुई जवानी, बीमार बचपन, बंजर जमीन, अंधकारमय भविष्य। मैनवा को टीबी है। वह डेढ़ साल से प्राइवेट डॉक्टरों से इलाज करवा रही हैं। पैसे का अभाव होता है तो इलाज छोड़ देती है। सरकार के डॉट्स प्रोग्राम की कोई जानकारी मैनवा को नहीं है। मैनवा से बातचीत के क्रम में ही वहां तिलवा देवी, दीना भुइयां, कमल भुइयां, किता भुइयां, सावित्री देवी, कुंती देवी, लछवा देवी, गोहरी देवी आदि की भीड़ जुटती है। यह संख्या देखते ही देखते 25 की हो जाती है। सब के सब टीबी मरीज। किसी ने आज तक सरकारी प्रोग्राम यानी डॉट्स, आरएनटीसीपी या एमडीआर के बारे नहीं जाना-सुना। न कभी कोई समझानेवाला आया, सरकारी दवा देने आया। ये वैसे मरीज हैं, जो खाने-पीने से थोड़ा पैसा बचा तो जान बचाने की ललक में टीबी की थोड़ी दवाई खरीद लाते हैं। थोड़ा ठीक महसूस हुआ तो फिर टीबी हब में काम करने निकल पड़ते हैं।

किता भुइयां कहते हैं, हमारी मजबूरी है कि हम चाहे मर जाएं, मिट जाएं, ज्यादा दिनों तक घर में नहीं रह सकते। हमें बच्चों का पेट भरने के लिए, खुद का पेट भरने के लिए कमाने जाना ही होगा। पहले तो खेती भी एक सहारा था लेकिन 2003-2004 के बाद से अनाज देनेवाले खेत, बंजर होकर बीमारियां ही देते हैं। इन 25 टीबी मरीजों में से मात्र दो ही ऐसे मिलें, जो यह मानते हैं कि सरकार दवाई तो देती है लेकिन उनका सवाल है कि यहां से सरकारी अस्पताल दस किलोमीटर की दूरी पर है। हम वहां हर खुराक लेने नहीं जा सकते। आवाजाही की परेशानियां, पैसे की किल्लत सबसे बड़ी समस्या है।

दरअसल इस गांव में 2003-04 के बाद से भविष्य पर ग्रहण लगना शुरू हुआ। उन वर्षों में दो स्पंज आयरन फैक्ट्रियां इस गांव के दोनों ओर महज डेढ़ किलोमीटर के फासले पर लगी जबकि सरकारी कायदे-कानून के अनुसार कम से कम दो फैक्ट्रियों के बीच पांच किलोमीटर की दूरी होनी चाहिए। फिर क्या था, धीरे-धीरे उपजाऊ जमीन भी लोगों को दाने-दाने के लिए तड़पाने लगा। स्पंज आयरन फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं, डस्ट खेत में पड़कर उसे बंजर बनाने लगे। लोगों ने खेती-बारी का काम-काज छोड़कर कोयले के अवैध कारोबार में कदम रखा। कारोबार नहीं, मजदूरी में। अहले सुबह ही यहां के लोग कई-कई किलोमीटर की यात्रा तय कर कोयला निकालते हैं और फिर इन्हीं फैक्ट्रियों तक कोयले को पहुंचाते हैं। एक बोरे में लगभग 180-200 किलो कोयला लाते हैं, और इस हाड़तोड़ काम के एवज में कीमत मिलती है 80 रुपये।

इसी गांव में मिले दशरथ अपनी पीड़ादायी कहानी को इस तरह बयां करते हैं, ‘मेरे पिता चौधरी भुइयां ने सारी जमीन बेच दी। कोई विकल्प नहीं।’ वहीं की मंजू देवी कहती हैं, पति की मौत हो गयी। छह बच्चे हैं, जमीन से कुछ होता नहीं, मुझे खुद टीबी है लेकिन मेरे पास मजदूरी के अलावा कोई विकल्प नहीं। जिस रोज टीबी की परेशानी की वजह से काम नहीं कर पाती, उस रोज बच्चों को भी भूखे पेट सोना पड़ता है।

जानकारों के अनुसार गरीबी और प्रदूषण, दोनों ने ही इस गांव को टीबी गांव के रूप में स्थापित किया है। इस गांव में इतने टीबी मरीज होने के बावजूद डॉट्स प्रोवाइडर का नहीं होना आश्चर्यचकित करता है। मजबूरी में ग्रामीणों को झोला छाप डॉक्टरों पर निर्भर रहना पड़ता है। कभी किसी गैर सरकारी संस्थानों ने भी नापो की सुध नहीं ली। गांव में कुछेक के पास लाल कार्ड है तो कुछेक के घर बिजली भी पहुंच गयी है लेकिन बिजली बिल भरने को पैसा नहीं, सो…! बांधनी कहती हैं कि यहां सिर्फ 25 लोगों ने स्वीकार किया कि टीबी है जबकि सच यह है कि यहां सबको खांसी है और यदि जांच हो तो हर घर में टीबी निकले। डॉ अरुण कहते हैं – यह हो सकता है क्योंकि टीबी के मरीजों के साथ रहने से इसका खतरा वैसे ही बढ़ा रहता है। टीबी का एक बड़ा कारण कुपोषण, गरीबी और भुखमरी तो है ही। हेसालौंग के रहनेवाले मानवाधिकार कार्यकर्ता कृष्णा कहते हैं – इस गांव के लोगों से तो जीने का भी अधिकार छीन लिया गया है।

यह कहानी सिर्फ नापो की नहीं है। झारखंड में कई-कई नापो हैं। स्वास्थ्य विभाग के यक्ष्मा नियंत्रण कार्यालय संभाग के अनुसार झारखंड में हर 35वें मिनट एक व्यक्ति की मौत टीबी से होती है। जबकि आश्चर्यजनक भी है कि झारखंड देश का एक ऐसा राज्य है, जहां सबसे अधिक एमडीआर के मामले सामने आये हैं। पूर्व जिला यक्ष्मा पदाधिकारी डॉ प्रसाद कहते हैं – राज्य में करीब 45 हजार मरीज ऐसे हैं, जिनका इलाज जिला यक्ष्मा नियंत्रण केंद्र में हो रहा है। सरकार अपने स्तर से हर संभव सुविधा उपलब्ध कराती है। लेकिन नापो को देखने, समझने के बाद स्पष्ट होता है कि डॉ प्रसाद की बात सैद्धांतिक तौर पर तो सही है, व्यावहारिक तौर पर यह हजम होनेवाली बात नहीं।

Friday, October 29, 2010

सुनिए बहलेनियों, भिनसरियों की व्‍यथा

♦ अनुपमा

झारखंड में एक जगह है तोरपा। वहीं की रहनेवाली है बहलेन कोनगाड़ी। बहलेन से पिछले दिनों इटकी टीबी अस्पताल में मुलाकात हुई। रांची से सटे इटकी का टीबी अस्पताल अंग्रेजों के जमाने से ही बड़ा मशहूर अस्पताल है। वहीं जेनरल वार्ड के एक बेड पर पड़ी हुई मिली बहलेन। पीला चेहरा, मरमराई हुई आंखें, खामोश बहलेन के चेहरे पर एक अजीब सी उदासी छायी हुई थी। बस यूं ही बातों-बातों में पूछा, कुछ उसके बारे में जानने के लिहाज से। एक बड़ी लड़की बहलेन, बच्‍चों की तरह सिसकने लगी। रोते-रोते उसने जो दास्तान सुनायी, वह बेहद दर्दनाक है। जिस रोज हम बहलेन से मिल रहे थे, ठीक उसके दो दिन पहले ही उसका छह माह का बच्‍चा अबॉर्ट हो गया था। डॉट्स की दवाई में जो गरमी होती है, उसके कारण गिर गया था बच्‍चा। वहां मिली एक नर्स बताती है कि यह दवा होती है इतनी गरमीवाली कि ऐसा होना स्वाभाविक था। पर बहलेन उस बच्‍चे को जन्‍म देना चाहती थी। उसे पालना चाहती थी। प्रेम के प्रतीक के रूप में रखना चाहती थी। वह प्रेम पूरी तरह से फ्रॉड ही था, फिर भी। लेकिन वह ऐसा कुछ भी न कर सकी।

बहलेन एक साल पहले दिल्‍ली गयी थी। झारखंड से जानेवाली और सैकड़ों लड़कियों की तरह। अपने परिवार की आर्थिक दशा को सुधारने के लिए, कुछ हसीन ख्‍वाबों के साथ। दलालों द्वारा दिखाये गये सुनहरे सपनों के साथ। बहलेन को अपने ही गांव का एक दलाल ले गया था। वहां उसे एक घर में दाई (मेड) का काम मिल गया। तय हुआ कि उसे तीन हजार रुपये हर माह मिलेंगे। पर रात-दिन खटने के बाद भी सारा पैसा दलाल ले उड़ा। दिल्‍ली के पश्चिम विहार में काम करने के दौरान ही उसे एक मुसलिम लड़के नासिर से प्‍यार हो गया। शादी का झांसा देकर वह उसका शारीरिक शोषण करता रहा। जब पता चला कि बहलेन पेट से है, तो वह भाग गया। बहलेन यह सब जानते हुए भी अपने बच्‍चे को जन्म देना चाहती थी, पर अब वह इसे नियति मान बैठी है। रात दिन खटने और ठीक से भोजन न मिलने के कारण बेहद कमजोर हो गयी। इसी बीच उसे टीबी हो गया। वह लौटकर अपने गांव आ गयी। लगातार खांसी होने पर गांव के लोगों ने उसे टीबी सेनेटोरियम में जांच के लिए भेजा तो पता चला कि उसे टीबी है। पिछले दो माह से उसका इलाज यहां चल रहा है और वह पहले से बेहतर महसूस कर रही है।

बहलेन से मिलने के बाद हम जैसे ही आगे बढ़े, हमारी नजर एक छोटी-सी बच्‍ची पर पड़ी। नाम है भिनसरिया कोरबा। भिनसरिया बिशुनपुर, गुमला की है। आज ही अस्पताल में भर्ती हुई है। पर हालत बिल्‍कुल गंभीर। पूछने पर कुछ भी नहीं बोलती। उसे अस्पताल में भर्ती करवाने के लिए लायी शिक्षिका बताती हैं कि वह अनाथ है और उसके माता-पिता (महाबीर कोरबा और चैती कोरबा) की मौत भी टीबी के कारण ही हो गयी थी। कोरबा प्रजाति विलुप्‍त होने के कगार पर है और उनके इलाज के लिए अब भी कोई विशेष उपाय नहीं किये गये हैं। सोमरी कच्‍छप भी इसी अस्पताल में भर्ती है। उसका पिछले चार महीनों से इलाज चल रहा है। इसके पहले उन्होंने दो महीने तक प्राइवेट में इलाज कराया था। लेकिन जब हालत बदतर हो गयी और इलाज के पैसे नहीं बचे, तो टीबी सेनेटोरियम में आयी है।

अस्पताल में ऐसे कुल 217 मरीज हैं और सबकी कहानी मार्मिक व बेहद संवेदनशील है। इसमें हर कटेगरी के मरीज शामिल हैं। इटकी सेनेटोरिम के अधीक्षक आरजेपी सिंह कहते हैं कि कटेगरी 1, 2 और 3 में सभी के मरीज आते हैं। अस्पताल में 415 लोगों के रखने की व्‍यवस्था है परंतु हमारी कोशिश होती है कि कॉम्‍प्‍लीकेटेड केसेज को छोड़कर बाकी मरीजों को उनके नजदीक के सेंटर पर इलाज के लिए भेज दिया जाए। रेसीस्टेंट केस को डॉट्स प्‍लस प्रोवाइड किया जाता है। झारखंड में एसटीडीसी और एलपीए की ट्रेनिंग हो चुकी है और बहुत जल्‍द ही यहां एडवांस टेस्ट की सुविधा भी उपलब्‍ध होगी। एसटीएस के रूप में काम करनेवाले हिमांशु कहते हैं कि इलाज का समय पूरा होने से पहले ही मरीज कभी-कभी दवा लेना छोड़ देते हैं। ऐसे में उन्हें काउंसलिंग देना और समझाना एक टेढ़ी खीर साबित होता है। आंगनबाड़ी सेविका या एएनएम भी इस काम में मदद करते हैं। पर पिछले वर्ष 2009 में 939 और इस वर्ष अब तक 600 लोगों का इलाज यहां हो चुका है। झारखंड में हर वर्ष टीबी मरिजों की संख्‍या बढ़ती जा रही है। यदि अस्पताल के मरिजों की संख्‍या देखें तो 2005 में जहां 659, 2006 में 683, 2007 में 815, 2008 में 879 मरीजों का इलाज सिर्फ इटकी टीबी सेनेटोरियम में हुआ। जो बाहर गये, उनकी बात अलग। प्राइवेट प्रैक्टिशनर के पास अलग। झारखंड अन्य कई चीजों का हब रहा है। अब टीबी का भी हब है। भारत में सबसे तेजी से टीबी मरीजों की संख्‍या यहां बढ़ रही हैं। इसमें धनबाद नंबर वन पर है। कोयले की कमाई में टीबी की बात कौन करेगा। सभी माइनिंग एरिया में कमोबेश स्थिति बदतर ही है।

Thursday, September 30, 2010

अपेक्षाओं और उपेक्षाओं की मायानगरी- ‘झॉलीवुड’

अनुपमा

मोरहाबादी मैदान के पास हम ऐक्शन, कैमरा, कट और शॉट जैसे शब्द सुनकर रुक जाते हैं. किसी गाने की शूटिंग चल रही है बिना किसी मेकअप रूम के. कोई एयरकंडीशनर नहीं, न ही कोई और ताम-झाम. मौजूद लोगों में से एक चिल्लाता है- जल्दी करो, ट्रैफिक का टाइम हो रहा है. तकनीक के नाम पर इनके पास सामान्य वीडियो कैमरे हैं और एडिटिंग के लिए भाड़े पर ली गई बुनियादी-सी मशीनें. स्टूडियो के नाम पर मुफ्त की पहाड़ियां, मैदान, नदियां और सड़कें.

आम-से वीडियो कैमरे से ‘बुद्धा वीप्स इन जादूगोड़ा’ सरीखी डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाकर राष्ट्रीय पुरस्कार पा चुके निर्माता-निर्देशक श्रीप्रकाश ने पहली बार झॉलीवुड के लिए फीचर फिल्म बनाई थी. नागपुरी और सादरी भाषा में बनी इस फिल्म का नाम था ‘बाहा’. झॉलीवुड की मायानगरी में संघर्ष कर रहे कलाकारों पर आधारित इस फिल्म ने झारखंड में बहुत नाम कमाया, लेकिन कमाई के नाम पर बस लाख-सवा लाख रुपए ही जुटा पाई जो इसकी लागत का एक मामूली-सा हिस्सा भर था. गौरतलब है कि यहां एक फिल्म करीब 6 से 7 लाख रुपए में बनती है, जो हिंदी फिल्मों के चरित्र कलाकार के मेहनताने से भी काफी कम है.

फिल्म निर्माता कमाई न कर पाने की दो मुख्य वजहें बताते हैं. एक- झारखंड के सारे सिनेमाहॉल बहुत बुरी हालत में हैं जहां कुछ गिने-चुने दर्शक ही जुटते हैं (कुछ हॉलवाले डिजिटल फिल्मों को दिखाने में आनाकानी भी करते हैं). टिकटों की कीमत छोटे शहरों में 8 से 14 रुपए और रांची जैसे शहरों में 20 से 60 रुपए तक है. रांची जैसे शहरों में इन फिल्मों को बस मॉर्निंग शो में ही दिखाते हैं, इसलिए व्यवसाय की ज्यादा गुंजाइश नहीं रह जाती. इसके अलावा ज्यादातर घरों में इन फिल्मों की पायरेटेड डीवीडी पहले-दूसरे दिन ही पहुंच जाती हैं
चूंकि झॉलीवुड कमाई के मामले में बहुत पीछे है लिहाजा इसके सितारे भी ज्यादा पैसा नहीं कमा पाते. झॉलीवुड के एंग्री यंग मैन दीपक लोहार के अलावा यहां कोई अन्य हीरो या हीरोइन आर्थिक दृष्टि से बहुत मजबूत नहीं हैं. ‘बाहा’ की 29 वर्षीया हीरोइन शीतल सुगंधिनी मुंडा समुदाय से हैं. एक इतनी नामी फिल्म में काम भी उनकी जिंदगी में कोई बड़ा बदलाव नहीं ला पाया है. वे एक एनजीओ में नौकरी करती हैं. ‘झारखंड का छैला’ के निर्देशक अनिल सिकदर के लाइटिंग इंजीनियर ऋषिकेश के मुताबिक इन फिल्मों में हीरो को तकरीबन 20 और हीरोइन को 15 हजार रुपए मिलते हैं. कुछ तो अपने घर का भी पैसा लगा देते हैं, इस उम्मीद में कि एक बार जम गए तो आगे उनकी पूछ बढ़ेगी. सपनों के बनने और बिखरने का खेल बॉलीवुड की तर्ज पर यहां भी कम नहीं होता.

एनएफडीसी (राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम) की जिम्मेदारी भले ही भारत की क्षेत्रीय बोलियों में बनने वाली फिल्मों को बढ़ावा देना है पर शायद झॉलीवुड उनकी नजरों के दायरे से बाहर की चीज है. यह बात और है कि इन फिल्मों को भी केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के उन्हीं मानकों पर परखा जाता है जिन पर अन्य स्थापित भारतीय फिल्म उद्योगों की फिल्मों का परीक्षण होता है. पर क्या सरकारी तंत्र इनके प्रति जरा भी जवाबदेह नहीं है?

फिल्म निर्माताओं का मानना है कि यदि सरकार उन्हें थोड़ी-सी टैक्स में सब्सिडी दे, सिनेमाहॉलों के लिए साल में छह सप्ताह इन क्षेत्रीय फिल्मों को दिखाना अनिवार्य कर दे और गांव-गुरबों के छोटे-छोटे सिनेमाहॉलों को बढ़ावा दे तो झॉलीवुड की भी किस्मत बदल जाएगी. 2008 में गठित अखिल भारतीय संथाली फिल्म समिति (एआईएसएफए) के अध्यक्ष रमेश हांसदा कहते हैं, ‘बिना किसी सरकारी सहयोग के हमने झारखंड में स्थानीय बोली और लोगों को लेकर फिल्में बनाई और दिखाई हैं. लोगों ने इन्हें खूब सराहा लेकिन सरकार हमें नजरअंदाज करती है, अगर वह हमारी ओर ध्यान दे तो कोई कारण नहीं कि हम अच्छा नहीं कर पाएं.’

हालांकि झॉलीवुड में बनने वाली ज्यादातर फिल्में डिजिटल कैमरों की सहायता से बनाई जाती हैं, मगर यहां अब तक 9 सेल्यूलाइड फिल्में भी बन चुकी हैं. समुदाय की आवाज को सेल्यूलाइड का माध्यम देने वाले ऐसे लोगोंं में करनडीह के रहने वाले दशरथ हांसदा (रमेश हांसदा के भाई) और प्रेम मार्डी का नाम पहले आता है. इन दो कलाकारों ने ही सबसे पहले 'चांदो लिखोन' (झारखंड की पहली जनजातीय फिल्म) बनाकर संथाली (आदिवासी) चलचित्र के सपने को साकार किया था. युगल किशोर मिश्र और रवि चौधरी ने भी कुछ सेल्यूलाइड फिल्में बनाई हैं. हालांकि महंगी होने की वजह से इन्हें वापस डिजिटल तकनीक का सहारा लेना पड़ रहा है.

‘अमू’ फिल्म को संगीत देने वाले और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पैठ बना चुके नंदलाल नायक भी अमेरिका छोड़-छाड़कर एक साल पहले झारखंड आ बसे हैं. वे एक महत्वाकांक्षी फिल्म बनाने में लगे हैं. यह फिल्म झारखंड से लड़कियों के पलायन और माओवाद के इर्द-गिर्द घूमती है. इसी तरह पत्रकार और संस्कृतिकर्मी मनोज चंचल भी पलायन को केंद्र में रखकर ‘बीरची’ नामक फिल्म बना रहे हैं. बिरसा मुंडा और आदिवासी आंदोलनों को केंद्र में रखकर भी कई फिल्में बनी हैं.

इसका यह मतलब कतई नहीं है कि यहां की फिल्में डॉक्यूमेंट्री फिल्मों कजैसी होती हैं. झॉलीवुड अपने दर्शकों की जरूरतों का पूरा खयाल रखता है. यहां की लगभग सभी फिल्मों में गाने, रोमांस, ऐक्शन और मार-धाड़ वाले दृश्यों का अच्छा तालमेल होता है.

अनिल सिकदर के मुताबिक झॉलीवुड का सालाना कारोबार दो से ढाई करोड़ रुपए का है और यह अब झारखंड के अलावा पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और बिहार तक फैलने लगा है. यहां की इकलौती इंफोटेनमेंट पत्रिका ‘जोहार सहिया’ के संपादक अश्विनी कुमार पंकज के मुताबिक आने वाले समय में झॉलीवुड में काफी संभावनाएं हैं.

त्रासदी यह है कि दर्शकों की अपेक्षाओं और सरकारी उपेक्षाओं के बीच फंसे झॉलीवुड की भिड़ंत उच्च तकनीक और तामझाम से लैस हिंदी फिल्मों से है, लेकिन झारखंड की मायानगरी अपने स्तर पर अपने अस्तित्व को बनाए रखने के संघर्ष में जुटी है और यह एक शुभ संकेत है

अजब कारनामों से भरे गजब प्रदेश में फिर सरकार

अनुपमा
और अंततः अजब कारनामों से भरे गजब प्रदेश झारखंड में फिर से सरकार बन ही गई. फिर वही गठबंधन, वही कुनबा, जो इसके पहले भी सरकार चला रहा था. भारतीय जनता पार्टी, आजसू और झारखंड मुक्ति मोर्चा. फर्क सिर्फ इतना रहा कि इस बार मुखिया बदला है, पहले शिबू सोरेन मुख्यमंत्री थे, अब अर्जुन मुंडा. सरकार कितने दिन चलेगी यह कोई नहीं बता सकता.

झारखंड में सरकारों के भविष्य को लेकर कोई कुछ बता भी नहीं सकता. इस मामले में यह अनोखा प्रदेश है. राज्य गठन के दसवें साल में है, आठवीं बार मुख्यमंत्री के पद पर शासक का बदलाव हो रहा है. किसी और की बात क्या की जाए, खुद झारखंड के सबसे बड़े नेता और इस सरकार की स्टीयरिंग अपने हाथ में रखने वाले पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन तहलका से बातचीत में कहते हैं, 'यहां कोई सरकार कभी अपना कार्यकाल पूरा नहींे कर सकती.' अब शिबू की बात मान लें तो इस सरकार का भी हश्र वैसा ही होने वाला है, जैसा कि पहले एक-एक कर सभी सरकारों का होता रहा है. शिबू की बात छोड़ भी दंे तो आजसू के दूसरे नंबर के नेता और फिर से मंत्री पद पर विराजमान होने की कतार में लगे चंद्रप्रकाश चौधरी भी सरकार के भविष्य पर बहुत विश्वास के साथ कुछ नहीं कहते. हंसते हुए कहते हैं, 'देखिए, पूरा होइए जाएगा कार्यकाल...!'

लगभग तीन माह पहले तक इसी गठबंधन के सहारे शिबू की सरकार चल रही थी. कथित मान-सम्मान और विश्वास को झटका लगने की दुहाई देते हुए भाजपा ने शिबू को दगाबाज, धोखेबाज नेता करार दिया जिसके बाद सरकार गिर गई. लेकिन अब अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनाने अथवा बनवाने के लिए 'पार्टी विद ए डिफरेंस' यानी भाजपा ने सारे नियम, आदर्श, सिद्धांत ताक पर रख दिए. भाजपा के कई दिग्गज दिल्ली में छटपटाते रहे लेकिन अध्यक्ष नितिन गडकरी ने विदेश से ही सरकार बनाने के लिए हरी झंडी दे दी. भाजपा संसदीय बोर्ड ने जिस शिबू के पाला बदलने के बाद उनकी सरकार को हटाने का निर्णय लिया था, उस संसदीय बोर्ड का फैसला धरा का धरा रह गया.

बकौल शिबू वे आज भी केंद्र में यूपीए के साथ हैं. केंद्र मंे यूपीए के साथ होने की बात कहने वाली पार्टी के साथ मिलकर राज्य में भाजपा द्वारा सरकार बनाने की हड़बड़ी ही वह अकेली चीज है जो इस बार की सरकार के लिए नई है. ऐसा क्यों, यह सवाल आजकल प्रदेश में अहम बना हुआ है. हर जगह एक ही चर्चा है कि यदि सरकार के लिए इन्हीं दलों का कॉकटेल बनना था तो फिर उस वक्त नौटंकी की जरूरत ही क्या थी! और फिर इस दरम्यान ऐसा क्या हो गया कि जिससे शिकायत थी, उसी से मोहब्बत हो गई.

राज्य के पहले मुख्यमंत्री और झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी कहते हैं, 'छह माह पहले भी इसी गठबंधन की सरकार बनी थी, चार माह तक ही चल सकी. ढाई माह से राष्ट्रपति शासन है. अब फिर वही गठजोड़ सत्ता में है. वह सरकार क्यों गिरी थी और ढाई माह में कैसे सारे मनमुटाव दूर हो गए, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.' मरांडी आगे कहते हैं कि औद्योगिक घरानों ने सरकार बनवाने में कीमत लगाई है, खरीद-फरोख्त की भी राजनीति हुई है. मैं खरीद-फरोख्त की राजनीति नहीं कर सकता था, इसलिए मौका आने पर भी 25 विधायकों के होते हुए भी मैंने सरकार बनाने की पहल नहीं की.

लेकिन राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के विधायक दल की नेता अन्नपूर्णा देवी इस सरकार के गठन के लिए मरांडी को ही कटघरे में खड़ा करती हैं. वे कहती हैं, 'कांग्रेस और झाविमो चाहते तो सरकार पहले ही बन सकती थी. यदि कांग्रेस के नेतृत्व में ही सरकार बन जाती तो क्या हो जाता? वे बाबूलाल पर परोक्ष तरीके से निशाना साधते हुए कहती हैं, ' कहने को तो यहां कुछ साफ-सुथरी छवि वाले नेता भी हैं लेकिन मौका मिलने पर सबका स्वार्थ नजर आने लगता है.'

जाहिर-सी बात है कि इस नए ढांचे को सरकार की बजाय अपने-अपने स्वार्थों और मजबूरियों में जुटी एक भीड़ कह सकते हैं. झारखंड सरकार के एक बड़े अधिकारी कहते हैं, 'चूंकि राष्ट्रपति शासन में काम तेजी से हो रहा था, भ्रष्टाचार पर शिकंजा कसने का सिलसिला शुरू हो चुका था और कई चीजें पटरी पर आने लगी थीं, इसलिए गैरकांग्रेसी दलों में छटपटाहट होना स्वाभाविक था. पूर्व मुख्यमंत्रियों की सुविधा का छिन जाना और विधायकों के फंड के उपयोग पर रोक लग जाना सभी को परेशान कर रहा था. ऐसे में दलगत भावनाओं से परे जाकर हर छटपटाता हुआ विधायक बस किसी तरह, किसी भी सरकार के बनने की बाट जोह रहा था. इसलिए इस बार अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में सरकार बनने में न कोई हंगामा हुआ, न विरोधी गुटों के नेताओं की ओर से ही रटे-रटाए वाक्य दुहराए गए. वरना तीन माह पहले तक झामुमो के नेता भाजपाइयों के खिलाफ आग उगल रहे थे तो भाजपा के नेता झामुमोवालों को पानी पी-पीकर कोस रहे थे.'

झामुमो से राजनीतिक जीवन की शुरुआत करके भाजपा में कद्दावर नेता बनने वाले अर्जुन मुंडा को चालाक नेता और शासक माना जाता है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रघुवर दास को किनारे लगाकर जब से अर्जुन मुंडा ने सरकार बनाने की कमान अपने हाथों में ली थी, तभी से यह तय माना जा रहा था कि सरकार बनेगी. अब यह भी माना जा रहा है कि अर्जुन मुंडा हैं तो वे इस भानुमति के कुनबे को चला भी लेंगे. लेकिन चुनौतियां इतनी हैं कि उनके लिए भी ऐसा करना आसान नहीं होने वाला है. इस अजीबोगरीब गठबंधन के पेंच उन्हें हर समय परेशान करते रहेंगे.

फिलहाल यह सरकार भाजपा के 18, जदयू के दो, झामुमो के 18, आजसू के पांच और दो निर्दलीय विधायकों के गणित से चलने को तैयार है. दूसरी ओर शासन की चुनौतियां सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी हैं. पूरा राज्य सूखे की चपेट में है. केंद्र से पैसा लेकर राहत कार्य सही ढंग से पहुंचवाना बड़ा काम माना जाएगा. राज्य में विकास योजनाओं पर ब्रेक लगा हुआ है. सालाना बजट की चौथाई राशि भी अब तक खर्च नहीं की जा सकी है जबकि वित्तीय वर्ष के छह माह गुजर चुके हैं. पेसा कानून के तहत पंचायत चुनाव करा लेना मुंडा के सामने बड़ी चुनौती है. इन सबके साथ नक्सलवाद शाश्वत समस्या के तौर पर रहेगा ही.

झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन के पुत्र और राज्य के नए उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कहते हैं कि हमारी प्राथमिकता पंचायत चुनाव कराने की ही है, हम इसे अच्छे से कराएंगे. इस सरकार के गठन पर हेमंत कहते हैं कि जनता नहीं चाहती कि एक बार फिर चुनाव का बोझ उसके माथे पर पड़े, इसके लिए सरकार का बनना बहुत जरूरी था. 'हम भाजपा के साथ फिर से सरकार बना रहे हैं तो इस पर बहुत सवाल उठाने की जरूरत नहीं क्योंकि हमारे लिए दोनों राष्ट्रीय दल यानी भाजपा और कांग्रेस एक ही तरह की पार्टी हैं' भाजपा के साथ मिलकर फिर से सरकार बनाने पर सोरेन कहते हैं.

चुनौतियों से निपटना और विकास को गति देना अलग मसला है. झारखंड में फिर से वही बड़ा सवाल सामने है कि बकरे की मां आखिर कब तक खैर मनाएगी. यानी कि सरकार कितने दिन और चलेगी?

सदन में विपक्षी नेता कांग्रेस के विधायक राजेंद्र सिंह कहते हैं कि अभी हम छह माह तक अविश्वास प्रस्ताव पेश नहीं कर सकते लेकिन इन दलों के गठबंधन में ही इतने कलह हैं कि इसका भविष्य बेहतर नहीं कहा जा सकता.

क्या होगा, यह आने वाला समय बताएगा, फिलहाल राज्य अपने स्थापना के दशक वर्ष में आठवें मुख्यमंत्री का आश्वासन सुनने को तैयार है, काम को परखने को तैयार है और बदलाव को देखने के लिए बेताब है